अधिकार (Rights): अर्थ, जॉन लॉक का प्राकृतिक अधिकारो का सिद्धांत, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं, महत्व, मूल्यांकन या आलोचना

अधिकार (Rights): अर्थ, जॉन लॉक का प्राकृतिक अधिकारो का सिद्धांत,  परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं, महत्व, मूल्यांकन या आलोचना

अधिकार (Rights) का अर्थ

अधिकार उन सामाजिक दावों या मांगो को कहां जाता है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपना विकास कर सकता है। अत: जब व्यक्तियों द्वारा की गई मांगो को समाज तथा राज्य से मान्यता मिल जाती है तो वह मांग अधिकार बन जाती है।

अधिकार किसी वस्तु को प्राप्त करने या किसी कार्य को करने के लिए उपलब्ध एक दायेरा या सीमा है और ये दायेरा या सीमा हमे प्रकर्ति या समाज द्वारा दिया गया है।

अधिकार व्यक्ति के वे कार्य है जिन्हे वह स्वतंत्रतापूर्वक कर सकता है।

राज्य कभी भी अधिकार प्रदान नहीं करता, वह केवल उन्हें मान्यता देता हैं, सरकारें कभी भी अधिकार प्रदान नहीं करती, वे सिर्फ उन्हें संरक्षण देती हैं।

अधिकार लोगों को अपना विकास करने के लिए अवसर उपलब्ध कराने के अलावा राज्य की गतिविधियों पर कुछ महत्त्वपूर्ण सीमाएँ भी लगाते है।



अधिकार (Rights) की परिभाषाएँ

1. हॉब्स के अनुसार:- व्यक्ति की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली शक्ति को अधिकार कहते है।

2. हेराल्ड जे. लॉस्की के अनुसार:- अधिकार समाज की वह परिस्थितियाँ है जिनके बिना व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता है

3. बेंथम के अनुसार:- अधिकार ऐसे दावे है जिन्हें राज्य द्वारा मान्यता दी जाती है

4. बेन और पीटर्स के अनुसार:- अधिकारों की स्थापना कुछ नियमो द्वारा होती हैं जो किसी कानून या परंपरा द्वारा बनाए जाते है

5. अर्नेस्ट बार्कर के अनुसार:- अधिकार न्याय की उस सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है जिस पर राज्य और उनके कानून आधारित हैं।

6. बोसांके के अनुसार:- अधिकार वह दावा है जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है।

7. ग्रीन के अनुसार:- अधिकार वह शक्ति है जिसकी मांग और मान्यता लोक-कल्याण के लिए होती है।



अधिकारों (Rights) का ऐतिहासिक विकास

1. मैग्ना कार्टा (1215):- 1215 ई में इंग्लैण्ड मे सबसे पहला कानून जारी हुआ था जिसे मैग्ना कार्टा कहते है। इस कानून के तहत इंग्लैण्ड के राजा “जॉन” ने कुछ कानूनी प्रक्रियाओं के पालन का वचन दिया और स्वीकार किया कि उनकी इच्छा कानून के सीमा में बंधी रहेगी।

2. अधिकार की याचिका (1628):- 1628 की अधिकार याचिका इंग्लैंड के सबसे प्रसिद्ध संवैधानिक दस्तावेजों में से एक है। इसे संसद द्वारा राजा “चार्ल्स प्रथम” को आपत्ति के रूप में लिखा गया था। क्योंकि उनके शासनकाल के दौरान, अंग्रेजी नागरिकों ने अधिकारों पर एक बड़े उल्लंघन के रूप में देखा था।

3. अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा (1776):- एक राजनैतिक दस्तावेज है जिसके आधार पर उत्तर-अमेरिकी ने 4 जुलाई 1776 ई. को स्वयं को इंग्लैण्ड से स्वतंत्र घोषित कर लिया था। इसके बाद से 4 जुलाई को यूएसए में राष्ट्रीय अवकाश रहता है।

जेफ़रसन ने उपनिवेशों के लोगों की कठिनाइयों और आवश्यकताओं का ध्यान रखकर नहीं, अपितु मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों को ध्यान में रखकर यह घोषणापत्र तैयार किया था।

4. फ्रांसीसी क्रान्ति (1789-1799):- इस क्रान्ति के फलस्वरूप राजा को गद्दी से हटा दिया गया, एक गणतंत्र की स्थापना हुई और इस क्रान्ति ने अन्य यूरोपीय देशों में भी स्वतन्त्रता की ललक कायम की और अन्य देश भी राजशाही से मुक्ति के लिए संघर्ष करने लगे।

इस क्रांति के पश्चात समानता के अधिकार, स्वतंत्रता के अधिकार और बंधुत्व के अधिकार पर अधिक बल दिया गया

5. मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा (1948):- संयुक्त राष्ट्र के लोग यह विश्वास करते हैं कि कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते है जैसे मानव की गरिमा है और स्त्री-पुरुष के समान का अधिकार। इस घोषणा के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा की।

इस घोषणा से राष्ट्रों को प्रेरणा और मार्गदर्शन मिला कि वे इन अधिकारों को अपने संविधान के द्वारा मान्यता देने और क्रियान्वित करने के लिए अग्रसर हुए।



अधिकारों (Rights) को तीन पीढ़ियों में बांटा गया है:

1. पहली पीढ़ी (18वी सदी): इस पीढ़ी मे वो सरल अधिकार आते है जो मानवता के साथ जुड़े है। जैसे:- जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, सुरक्षा का अधिकार, नागरिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार, कानूनी अधिकार तथा समझौता करने, उन्हें लागू करने का अधिकार आदि अधिकार शामिल है।

2. दूसरी पीढ़ी (19वी सदी): इस युग में समृद्धि और आर्थिक कल्याणकारी अधिकारों की के साथ-साथ, नए अधिकार जैसे वोटिंग, शिक्षा, व्यवसायिक स्वतंत्रता आदि का विकास हुआ।

3. दूसरी पीढ़ी (20वी सदी): इसमें सांस्कृति, भाषा और परंपराओं की सुरक्षा के अधिकार के साथ-साथ, महिलाओं, अल्पसंख्यको, वृद्ध लोगों, और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए अधिकारों को महत्व दिया गया।



अधिकारो (Rights) का वर्गीकरण या प्रकार

1. प्राकृतिक अधिकार (Natural Rights): प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं जो मानव को अपने जीवन मे जन्म से ही प्राप्त होते हैं। जैसे जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार।

2. नैतिक अधिकार (Moral Rights): नैतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं जो हमारे मूल्यों पर आधारित होते हैं, लेकिन इन्हें कानून द्वारा स्थापित नहीं किया जाता है। ये अधिकार आपको उन्हीं कार्यों को करने की अनुमति देते हैं जो आपकी नैतिकता के अनुसार सही होते हैं।

उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति का नैतिक अधिकार हो सकता है कि वह अपने मित्र की मदद करें, चाहे वो किसी कानूनी या सामाजिक कर्तव्य का हिस्सा हो या न हो।

3. कानूनी अधिकार (Legal Rights): कानूनी अधिकार वे अधिकार होते हैं जो कानूनी प्रक्रिया द्वारा स्थापित और प्रमाणित होते हैं, और व्यक्तिगत या सामाजिक कानून के तहत मिलते हैं। जैसे:-
  • राजनीतिक अधिकार (Political Rights): राजनीतिक अधिकार नागरिकों को सरकार में प्रतिनिधित्व और भागीदारी का अधिकार प्रदान करते हैं, जैसे कि मतदान करने का अधिकार, उम्मीदवार बनने का अधिकार, और सरकारी पदों के लिए उम्मीदवार बनाने का अधिकार।
  • नागरिक अधिकार (Civil Rights): नागरिक अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा से संबंधित होते हैं, जैसे कि जीवन, स्वतंत्रता, और संपत्ति की सुरक्षा।
  • आर्थिक अधिकार (Economic Rights): आर्थिक अधिकार व्यक्तिगत और सामाजिक आर्थिक हितों के साथ संबंधित होते हैं, जैसे कि रोजगार के अधिकार, उचित मूल्य की गारंटी का अधिक।
4. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights): भारतीय संविधान के पारंपरिक और महत्वपूर्ण हिस्से हैं जो भारतीय नागरिकों को सामाजिक और न्यायिक समानता और स्वतंत्रता के अधिकार प्रदान करते हैं। ये मौलिक अधिकार इस प्रकार होते हैं:-
  • समानता के अधिकार (Rights to Equality): इस अधिकार के अंतर्गत, सभी भारतीय नागरिकों को कानूनी रूप से समान हक प्राप्त होते हैं। इसमें जाति, लिंग, धर्म, जन्मस्थान और काम के आधार पर किसी के साथ भेदभाव करने पर प्रतिबंध है।
  • स्वतंत्रता के अधिकार (Rights to Freedom): यह अधिकार भारतीय नागरिकों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कई पहलुओं का अधिकार प्रदान करता है, जैसे कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, भाषण और समाचार में स्वतंत्रता, और गोदी अभिवादन के अधिकार।
  • शोषण के खिलाफ अधिकार (Rights against Exploitation): यह अधिकार बाल मजदूरी और मानव व्यापार जैसे शोषण और अत्याचार के खिलाफ नागरिकों की सुरक्षा करते हैं।
  • धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (Rights to Religious Freedom): इसके तहत, सभी भारतीय नागरिकों को अपने धर्म को चुनने और अपने धर्मिक धाराओं का पालन करने का अधिकार होता है, और यह किसी धर्म के प्रति उनकी आवश्यकताओं के अनुसार होता है।
  • सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (Cultural and Educational Rights): इस अधिकार के तहत, भारतीय नागरिकों को अपने संस्कृति और शैक्षिक अधिकारों की सुरक्षा मिलती है, जिसमें भाषा, संस्कृति, और शैक्षिक स्वतंत्रता के अधिकार शामिल होते हैं।
  • संविधानिक उपाय के अधिकार (Rights to Constitutional Remedies): यह अधिकार भारतीय नागरिकों को संविधान के खिलाफ होने वाली किसी भी अत्याचार या उल्लंघन के खिलाफ संविधानिक उपाय खोजने का अधिकार प्रदान करता है।


अधिकारो (Rights) की प्रकृति एव विशेषताएँ

1. स्वतंत्रता: अधिकार स्वतंत्रता को सुनिश्चित करते हैं, जिससे व्यक्ति अपने विचारों और क्रियाओं में स्वतंत्र होता है।

2. समानता: वे सभी व्यक्तियों को समान रूप से अधिकारों की गरिमा प्रदान करते हैं, न केवल कठिनाइयों को हटाते हैं बल्कि समाज में समानता को सुनिश्चित करते हैं।

3. सीमितता: अधिकारों की सीमितता होती है, ताकि वे दूसरों के अधिकारों को हानि नहीं पहुंचा सकें।

4. जिम्मेदारी: अधिकार व्यक्तियों को जिम्मेदारियों के साथ संबंधित करते हैं, जैसे कि स्वतंत्रता के साथ सामाजिक दायित्व और संरक्षण के लिए।

5. न्याय: ये न्याय और उचितता को संरक्षित करने में मदद करते हैं, समाज में सभी को उचितीकरण और न्याय का अधिकार प्रदान करते हैं।

6. सामाजिक उपयोग: अधिकारों का उपयोग सामाजिक हितों के लिए किया जाता है, जो समृद्धि, समानता, और न्याय की दिशा में सहायक होता है।

7. समृद्धि: अधिकार समृद्धि और सामाजिक विकास को बढ़ावा देते हैं, जो समृद्ध समाज की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।

8. विकास: वे व्यक्ति और समाज के विकास को संवारते हैं, जो समृद्ध समाज की नींव रखता है।

9. मौलिकता: अधिकारों की मूल बात यही है कि वे मानव समाज में जन्म से ही होते हैं। ये मौलिक अधिकार हर व्यक्ति को उनकी मानवीय अस्तित्व का हिस्सा बनाते हैं।

10. संरक्षण: अधिकारों को संरक्षित किया जाता है ताकि व्यक्तियों और समाज के सभी सदस्यों को उनका उचित लाभ मिल सके।

11. धार्मिकता: अधिकार व्यक्तिगत और सामाजिक धार्मिकता को समर्थन करते हैं और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को प्रोत्साहित करते हैं।


अधिकारों (Rights) की सुरक्षा के लिए उपाय

1. कानूनी संरक्षण: सरकारें और संविधानों के माध्यम से अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। कानूनों के प्रयोग और सम्पादन से सुरक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है।

2. जागरूकता: लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक बनाना महत्त्वपूर्ण है। जब लोग अपने अधिकारों को जानते हैं, तो उनकी सुरक्षा और संरक्षण में मदद मिलती है।

3. संगठन और अधिकार संरक्षण: संगठनों, मानवाधिकार संगठनों और समाज सेवा संगठनों की भूमिका अहम है। वे अधिकारों की रक्षा करने और सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं।

4. न्यायपालिका: न्यायपालिका अधिकारों की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण होती है। अधिकारों के उल्लंघन पर न्याय और विचाराधीनता के माध्यम से सुरक्षा प्रदान की जा सकती है।

5. सामाजिक संघर्ष: समाजिक आंदोलन और जन आंदोलन अधिकारों की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब लोग साथ आते हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं, तो सुरक्षा की गारंटी मिलती है।

6. शिक्षा और संचार: शिक्षा और सही संचार के माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी और जागरूकता मिलती है। इससे उनकी सुरक्षा में सुधार होता है।

7. अनुशासनिक नियंत्रण: शासन और सरकार के द्वारा अधिकारों के उल्लंघन पर अनुशासनिक नियंत्रण लगाना महत्त्वपूर्ण होता है। ऐसे कार्रवाई से अधिकारों की सुरक्षा मिलती है।

8. मजबूत विपक्षी दल: एक मजबूत विपक्ष जो सरकार को अधिकारों की सुरक्षा में संवेदनशील रखने के लिए प्रेरित कर सकता है।

9. लोकतांत्रिक सरकार: एक समर्थ और जनप्रिय सरकार, जो अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण में निरंतर समर्थ हो।

10. शक्तियों का पृथक्करण: विभिन्न शाखाओं और संस्थाओं के बीच शक्तियों का स्पष्ट और स्पष्ट पृथक्करण, ताकि अधिकारों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी स्पष्ट हो।



प्राकृतिक अधिकारो (Natural Rights) का सिद्धांत

जीवन, स्वतंत्रता तथा संपत्ति का अधिकार प्राकृतिक अधिकारो मे आते है और इस सिद्धांत के समर्थको का मानना है कि राज्य को इन अधिकारो की रक्षा करनी चाहिए। और सिद्धांत को 17वी और 18वी शताब्दी में अमेरिका और फ्रांस मे बहुत महत्त्व दिया गया था

प्राकृतिक अधिकार के संदर्भ में सबसे प्रभावशाली विचार जॉन लॉक ने अपनी पुस्तक में अभिव्यक्त किया है। परंतु लॉक से पहले हॉब्स ने प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत प्रस्तुत किया था।

हॉब्स के अनुसार जनता ने ही राज्य को चुना है अब राज्य जो चाहे वो करें परन्तु जनता राज्य का विरोध नहीं कर सकती है।

लॉक के अनुसार मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है। इसलिए लॉक ने एक ऐसी अवस्था की कल्पना की है जिसमें सभी व्यक्ति शांति से राज्य के बिना ही रहते हैं। लॉक इसे प्राकृतिक अवस्था कहता है। जो राजनीतिक समाज से पूर्व की अवस्था है।

इस प्राकृतिक अवस्था मे सभी प्रकृति के कानून के अनुसार काम करते है। इन प्राकृतिक कानूनों द्वारा ही व्यक्ति को कुछ प्राकृतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। अंतः लॉक ने जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के अधिकार को प्राकृतिक अधिकार माना है।

लॉक की मान्यता है कि व्यक्ति के ये अधिकार उसके पैदायशी अधिकार हैं। और लोगों ने इन अधिकारों को अधिक प्रभावशाली, सुरक्षित और इनके प्रयोग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए राज्य बनाया है।

लॉक के अनुसार हर व्यक्ति के पास कुछ प्राकृतिक, कभी न छोड़े जाने वाले, मूलभूत अधिकार होते हैं, जिन्हें कोई छू नहीं सकता, चाहे वह राज्य हो या समाज या कोई अन्य व्यक्ति। ये तीन अधिकार हैं:-

1. जीवन का अधिकार:- मनुष्य को जीवन का अधिकार प्राकृति से प्राप्त होता है। लॉक की धारणा है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सुरक्षित रखने का निरंतर प्रयास करता है। आत्मरक्षा को हॉब्स मानव की सर्वोत्तम प्रेरणा मानता है, उसी प्रकार लॉक का मानना है कि जीवन का अधिकार जन्मसिद्ध अधिकार है। व्यक्ति न तो अपने जीवन का स्वयं अन्त कर सकता है और न ही वह अन्य किसी व्यक्ति को इसकी अनुमति दे सकता है।

2. स्वतन्त्रता का अधिकार:- लॉक के अनुसार क्योंकि सभी मनुष्य एक ही सृष्टि की कृति हैं, इसलिए वे सब समान और स्वतन्त्र हैं। "इस कानून के अनुसार वह किसी अन्य व्यक्ति के अधीन नहीं होते तथा स्वतन्त्रतापूर्वक स्वेच्छा से कार्य करते हैं।" व्यक्ति की यह स्वतन्त्रता प्राकृतिक कानून की सीमाओं के अन्दर होती है। अतः यह मनमानी स्वतन्त्रता नहीं है। मानव सुखी और शान्त जीवन व्यतीत करते थे क्योंकि सभी स्वतन्त्र और समान थे। वे एक-दूसरे को हानि नहीं पहुँचाते थे। इसलिए प्रत्येक स्वतन्त्रता का पूर्ण आनन्द लेता था।

3. सम्पति का अधिकार:- लॉक ने सम्पत्ति के अधिकार को एक महत्त्वपूर्ण अधिकार माना है। लॉक के अनुसार सम्पत्ति की सुरक्षा का विचार ही मनुष्यों को यह प्रेरणा देता है कि वे प्राकृतिक दशा का त्याग करके समाज की स्थापना करें। लॉक ने सम्पत्ति के अधिकार को प्राकृतिक अधिकार माना है। अपनी रचना “द्वितीय निबन्ध” में लॉक ने इस अधिकार की व्याख्या की है।

लॉक ने इस अधिकार को जीवन तथा स्वतन्त्रता के अधिकार से भी महत्त्वपूर्ण माना है। लॉक ने सम्पति के अधिकार का विस्तार से प्रतिपादन किया है। संकुचित अर्थ में लॉक ने केवल निजी सम्पत्ति के अधिकार की ही व्याख्या की है। व्यापक अर्थ में लॉक ने जीवन तथा स्वतन्त्रता के अधिकारों को भी सम्पत्ति के अधिकार में शामिल किया है।



प्राकृतिक अधिकारों (Natural Rights) के सिद्धान्त की आलोचना

1. लॉक का यह कथन कि “अधिकार, राज्य या समाज से पहले उत्पन्न हुए” इतिहास, तर्क या सामान्य बुद्धि के विपरीत है। लॉक की दृष्टि में अधिकारों का स्रोत प्रकृति है। परन्तु अधिकारों का स्रोत समाज होता है और उसकी रक्षा के लिए राज्य का होना अनिवार्य है।

2. लॉक ने सम्पत्ति के अधिकार पर तो विस्तार से लिखा है लेकिन जीवन तथा स्वतन्त्रता के अधिकार पर ज्यादा नहीं कहा।

3. लॉक के प्राकृतिक अधिकारों परस्पर विरोधाभास है। लॉक एक तरफ तो उन्हें प्राकृतिक मानते है और दूसरी तरफ श्रम को सम्पत्ति के अधिकार का आधार मानता है। यदि प्राकृतिक अधिकार जन्मजात व स्वाभाविक हैं तो उसके अर्जन की क्या जरूरत है।

4. लॉक का प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त पूंजीवाद का रक्षक है। श्रम-सि‌द्धान्त को परिभाषित करते हुए लॉक ने कहा है- "जिस घास को मेरे घोड़े ने खाया है, मेरे नौकर ने काटा है, और मैंने छीला है; वह मेरी सम्पत्ति है और उस पर किसी दूसरे का अधिकार नहीं है।" अतः लॉक का यह सिद्धान्त पूंजीवाद का समर्थक है।

5. लॉक ने स्वतन्त्रता पर जोर दिया है, समानता पर नहीं। जबकि आधुनिक युग में समानता के अभाव में स्वतन्त्रता अधूरी है।

6. लॉक के अधिकारों का क्षेत्र सीमित है। आधुनिक युग में शिक्षा, धर्म संस्कृति के अधिकार भी बहुत महत्त्वपूर्ण अधिकार हैं।

7. लॉक किसी व्यक्ति के बिना श्रम किये उत्तराधिकार द्वारा दूसरे की सम्पत्ति प्राप्त करने के नियम का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता।

8. लॉक आर्थिक असमानता की तो बात करता है लेकिन उसे दूर करने के उपाय नहीं बताता।

9. लॉक आवश्यकता से अधिक सम्पति संचित करने पर सम्पत्ति को जनहित में छीनने की बात तो करता है लेकिन सम्पत्ति छीनने की प्रक्रिया पर मौन है।



प्राकृतिक अधिकारों (Natural Rights) के सि‌द्धान्त का प्रभाव

1. लॉक का यह सि‌द्धान्त मौलिक अधिकारों का जनक है। आज के सभी प्रजातन्त्रीय देशों में लॉक के इन सिद्धान्तों को अपनाया गया है। अमेरिका के संविधान पर तो लॉक का गहरा प्रभाव है। अमेरिकन संविधान का चौदहवाँ संशोधन घोषणा करता है कि "कानून की उचित प्रक्रिया के बिना राज्य किसी भी व्यक्ति को जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति से वंचित नहीं कर सकता।"

2. इस सिद्धान्त का संयुक्त राष्ट्र संघ पर भी स्पष्ट प्रभाव है। इसके चार्टर में मानवीय अधिकारों के महत्व को स्वीकार करते हुए मानवाधिकारों को शामिल किया गया है। वे अधिकार लॉक की देन है।

3. इस सिद्धान्त का कार्ल मार्क्स के 'अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त' पर भी स्पष्ट प्रभाव है। मार्क्स भी श्रम को ही महत्त्व देकर अपने सि‌द्धान्त की व्याख्या करता है।

4. लॉक की सबसे महत्त्वपूर्ण इस देन का प्रभाव 18 वीं तथा 19 वीं शताब्दी के उदारवादी विचारकों पर भी पड़ा।

अतः निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि अपनी अनेक आलोचनाओं के बावजूद भी लॉक का प्राकृतिक अधिकारों का सि‌द्धान्त राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में एक बहुत महत्त्वपूर्ण देन है। डनिंग ने कहा है- "राजनीतिक दर्शन को लॉक का सर्वाधिक विशिष्ट योगदान प्राकृतिक अधिकारों का सि‌द्धान्त है।" लॉक ने एडम स्मिथ जैसे अर्थशास्त्रियों पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है। प्राकृतिक अधिकारों के रूप में लॉक की यह देन उत्कृष्ट है।


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अधिकार को परिभाषित कीजिये। अधिकार के विभिन्न सिद्धांतों की विस्तार व्याख्या कीजिये।

OR/अथवा

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3.Discuss the three generations of rights.
अधिकारों की तीन पीढ़ियों की विवेचना कीजिये।

OR/अथवा

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7.What is right? Define rights in your own words.
अधिकार क्या होता है? अपने शब्दों में अधिकार की परिभाषा दीजिए।

OR/अथवा

8.Write an essay on the evolution of three generations of rights. Give suitable examples to support your answer.
अधिकारों की तीन पीढ़ियों के विकास पर एक निबंध लिखिए। अपने उत्तर के समर्थन में उचित उदाहरण दीजिए।



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