समानता (Equality): जटिल समानता, सकारात्मक कार्रवाई अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं, मान्यताएं, महत्व, बहुल समाज मे जटिल समानता

समानता (Equality):  जटिल समानता, सकारात्मक कार्रवाई  अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएं, मान्यताएं, महत्व, बहुल समाज मे जटिल समानता

समानता (Equality) की अवधारणा

समानता का अर्थ समान व्यवहार करना या समान पुरस्कार देना नहीं होता है। क्योंकि सभी लोग आवश्यकताओं और क्षमताओं से भिन्न होते है।

जब सभी मनुष्य की आवश्यकता और क्षमता में असमानता है तथा प्रकृति ने भी सभी मनुष्य को रंग-रूप, बल बुद्धि आदि में असामान बनाया है तो सभी व्यक्ति के साथ सामान बर्ताव करना समानता नहीं हो सकता है। अंतः समानता का सही अर्थ है कि एक जैसे व्यक्ति के साथ एक समान बर्ताव किया जाए।

लास्की के अनुसार, 'यदि एक गणितज्ञ और ईंटें ढोने वाले को समान समझ लिया जाए तो समाज के सारे उद्देश्यों का बंटाधार हो जाएगा।' इसलिए विशेषाधिकारों का अभाव और अवसरों की उपस्थिति होना चाहिए। ताकि प्रत्येक व्यक्ति को अपने विकास का समान अवसर मिल सके।

जटिल समानता:- जटिल समानता एक सामाजिक स्थिति है जिसमें समानता को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग चुनौतियों के अनुसार लोगों को अवसर या सुविधाए दी जाती है। जटिल समानता विभिन्न वर्ग, जाति, धर्म, लिंग आदि वाले सामाज मे समानता प्राप्त करने के लिए उपयोगी होती है।

जटिल समानता न्याय का एक सिद्धांत है जिसे माइकल वाल्ज़र ने 1983 मे अपनी किताब “स्फ़ेयर्स ऑफ़ जस्टिस” में रेखांकित किया है।



समानता (Equality) की परिभाषा

1 लास्की के अनुसार:- समानता का अर्थ यह नहीं होता कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए क्योंकि इससे समाज के उद्देश्य ही नष्ट हो जाएंगे।

2 अरस्तु के अनुसार:- न्याय ही समानता है।

3 बार्कर के अनुसार:- बार्कर ने अपनी पुस्तक में वर्णन किया कि मौलिक समानता, अवसरों की समानता, परिस्थितियों की समानता और परिणामों की समानता होनी चाहिए।

4 लेनिन के अनुसार:- जब तक एक वर्ग का दूसरे वर्ग द्वारा शोषण किए जाने की सारी संभावनाएं बिल्कुल नष्ट नहीं कर दी जाती है तब तक वास्तविक समानता नहीं हो सकती है।



समानता (Equality) की विशेषताएं / मान्यताएं / महत्व / बहुल समाज मे जटिल समानता

1. विशेषाधिकार न होना:- बहुल समाज मे समानता स्थापित करने के लिए विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति का होना बहुत आवश्यक है और विशेषाधिकार केवल समाज के पिछड़े वर्ग का विकास करने के लिए ही होना चाहिए।

2. अन्याय का समाधान:- कई बहुल समाजों में भेदभाव या उत्पीड़न के अन्य रूपों का इतिहास रहा है जिसके कारण उस समाज मे संसाधनों और शक्ति का असमान वितरण हुआ है। इसलिए उस समाज मे समानता प्राप्त करने के लिए अन्यायों को पहचानना और उनका समाधान करना महत्वपूर्ण है।

3 अवसर की समानता:- बहुल समाज में बिना किसी धर्म, जाति, वंश, लिंग व जन्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए और समान व्यक्तियों को अपना विकास करने के लिए समान अवसर मिलने चाहिए।

4. समान अधिकारों का प्रावधान:- किसी बहुल समाज में समानता तभी स्थापित हो पाएगी जब उस समाज के सभी नागरिकों को समान रूप से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी अधिकार मिलते हो।

5. आर्थिक असमानताएँ:- बहुल समाज मे अक्सर विभिन्न समुदायों के बीच आर्थिक असमानता होती हैं। जटिल समानता नीतियों के माध्यम से इन असमानताओं को दूर करने का प्रयास करती है।

6. वर्ग या श्रेणी की अनुपस्थिति:-
आजकल बहुल समाज में अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब होते जा रहे हैं इसलिए वास्तविक सामानता तभी स्थापित होगी जब यह अमीर और गरीब का फासला कम होगा।

7. आधारभूत सुविधाओं की पूर्ति:- किसी बहुल समाज में तभी समानता स्थापित हो पाएगी जब उस समाज का राज्य सभी नागरिकों के लिए आधारभूत सुविधा की पूर्ति करेगा।

8. शैक्षिक समानता:- बहुल समाजों में शैक्षिक अवसर और परिणाम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इसलिए जटिल समानता इन विसंगतियों को दूर करती हैं और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देती हैं।

9. आरक्षण का प्रावधान:- समाज के पिछड़े वर्गों का विकास करने के लिए और समाज में वास्तविक समानता स्थापित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान होना आवश्यक है।



समानता (Equality) के प्रकार या आयाम

1. प्राकृतिक सामानता:- प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य को अलग-अलग बनाया है इसलिए सभी मनुष्य में अलग-अलग गुण और दोष पाए जाते हैं परंतु प्रकृति सभी मनुष्यों को जन्म से ही कुछ समान अधिकार देती है जैसे जीवन का अधिकार।


2. राजनीतिक समानता:- राजनीतिक समानता का अर्थ है कि सभी नागरिकों को शासन में समान रूप से भाग लेने का अवसर प्राप्त होना चाहिए। और सभी को मत देने, पद के लिए उम्मीदवार होने और सरकारी पद आदि को प्राप्त करने का समान अधिकार होना चाहिए।

सभी लोगों को धर्म, रंग, जाति, जन्म आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से राजनीतिक अधिकार मिलना चाहिए और अपराधी, बच्चे, पागल एवं दिवालिया लोगों को छोड़कर सभी को समान रूप से मतदान करने का अधिकार होना चाहिए।
 

3. सामाजिक समानता:- सामाजिक समानता का अर्थ है कि समाज में सभी व्यक्ति को समान समझा जाए तथा धर्म, जाति, वंश, लिंग व जन्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव न किया जाए।

सार्वजनिक भोजनालय, सिनेमा हॉल, तालाब, कुआं, दुकान तथा मंदिर आदि के प्रयोग से किसी नागरिक को वंचित नहीं किया जाना चाहिए और किसी को भी विशेषाधिकार प्राप्त न हो और प्रत्येक मनुष्य को अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति को बनाए रखने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए।
 

4. आर्थिक समानता:- आर्थिक समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी के पास बराबर धन हो। बल्कि इसका अर्थ यह है कि सम्पत्ति और धन का वितरण समाज के सभी लोगों में समान होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति भूख से न मरे तथा कोई भी व्यक्ति इतना अधिक धन न जमा कर ले कि वह दूसरों का शोषण करने लगे जाए।

पुरुषों व महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए

प्रत्येक व्यक्ति को जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति का अवसर प्राप्त हो और रोजगार के उचित अवसर उपलब्ध हों। लोगों को बेरोजगार, अपंग होने एवं वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान की जाए।

समाजवादी के अनुसार उद्योगों पर राज्य का अधिकार तथा सामाजिक सुरक्षा की योजना लागू होनी चाहिए और उदारवादियों के अनुसार बाजारी अर्थव्यवस्था होनी चाहिए, प्रौद्योगिकी तथा व्यापार पर ध्यान देना चाहिए

आर्थिक समानता अन्य समस्त समानताओं का आधार है। आर्थिक समानता के अभाव में राजनीतिक, नागरिक व सामाजिक समानता अर्थहीन है।


5. नागरिक / औपचारिक / कानूनी समानता:- कानूनी समानता आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों की एक विशेष अवधारणा है। क्योंकि कानूनी समानता के माध्यम से ही सामाजिक विषमताओं का अंत किया जा सकता है।

कानूनी समानता से तात्पर्य यह है कि कानून की नजर में सभी लोग समान होते हैं, जिसके कारण कानूनी कार्यवाही के समय कानून को सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए।

सभी सरकारी विभागों में किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति, रंग, निवास स्थान आदि के आधार पर प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए।

एक जैसे लोगों से कानून का एक जैसा व्यवहार अर्थात् सभी के लिए समान कानून, समान न्यायालय व एक जैसे गुनाह पर समान दण्ड देना। भारतीय संविधान द्वारा इसी सिद्धान्त को अपनाया गया है।


6. अवसर की समानता:- अवसर की समानता से अभिप्राय है कि राज्य अपने सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के विकास के लिए समान अवसर प्रदान करेगा। और समान अवसरों को प्रदान करने में राज्य जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, नस्ल आदि के आधार पर कोई भेदभाव भी नहीं करेगा।

सभी नागरिकों को शिक्षा, नौकरी एवं अन्य क्षेत्रों में समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। इसलिए भारतीय संविधान द्वारा सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्रदान की गयी है तथा शिक्षा को मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों में भी सम्मिलित किया गया है।

उन सभी अवरोधों को दूर किया जाए जिनके कारण व्यक्तिगत विकास में बाधा उत्पन्न होती है। और पेशे या व्यवसाय व्यक्ति के लिए खुले होने चाहिए तथा विकास व उपलब्धियाँ योग्यता के आधार पर होनी चाहिए।

सामाजिक स्थिति, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक पृष्ठभूमि व ऐसे ही अन्य कारकों का हस्तक्षेप नहीं होने देना चाहिए।

सभी व्यक्ति एक समान जगह से जीवन शुरू करें। फिर चाहे परिणाम बिल्कुल भी समान न हो। अंतः चूँकि हर व्यक्ति ने समान रूप से शुरुआत की है इसलिए असमान परिणाम वैध सिद्ध होते हैं।


7. परिणामों की समानता:-
परिणाम की सामान्य से अभिप्राय है कि राज्य अपने नागरिकों सभी संसाधन समान रूप से हस्तांतरण करें ताकि समाज में सभी व्यक्तियों का विकास हो सके।

मार्क्सवादी इस अवधारणा के तहत संसाधनों का समान रूप से वितरण की मांग करते है ताकि समाज में सभी व्यक्तियों के लिए समान परिणाम हो और समाज वर्ग विहीन बन जाए।

मार्क्सवादी विचार देते हैं कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में समानता का अधिकार पक्षपात के सिवा और कुछ नहीं हो सकता इसलिए संपूर्ण सामाजिक समानता तभी स्थापित होगी जब पूंजीवाद या निजी संपत्ति समाप्त हो जाए।

आलोचकों का मानना है कि इस प्रकार की समानता अन्याय और बुरी से बुरी स्थिति का रास्ता दिखलायेगी क्योंकि व्यक्ति की गरिमा और आत्मसम्मान को गुप्त रूप से क्षति पहुंचेगी।

उदाहरण:- मनुष्य भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि से संबंध रखते हैं। और योग्य बनने के लिए कठिन परिश्रम और त्याग करते हैं। जब सबको एक ही फल मिलेगा तो कोई किसी के लिए इतना त्याग क्यों करेगा।

जब किसी को कोई पुरस्कार या सम्मान नहीं मिलेगा तो कोई इतना परिश्रम क्यों करेगा? और जब लोग परिश्रम नहीं करेंगे तो सामाजिक वस्तुओं की उत्कृष्टता (Excellence) का स्तर नीचे गिर जाएगा।

सुयोग्य और परिश्रमी लोगों के साथ अन्याय होगा और प्रोत्साहन की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। और पूरा समाज भी निर्धन हो सकता है।



सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण) / Affirmative Action

सकारात्मक कार्रवाई का अर्थ होता है कि वह कार्रवाई जिसमें लोगों को नियुक्ति, पदोन्नति या शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश, इत्यादि प्रदान करते समय किसी पिछड़े हुए समूह को (जैसे कि स्त्रियों, अश्वेत लोगों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों को ) विशेष रियायत (Concession) दी जाती है।

सकारात्मक कार्रवाई की परिकल्पना गणतंत्र की स्थापना के समय की गई थी। यह भारत जैसे देश में न्याय के सिद्धांत को प्रतिपादित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। अंतः आरक्षण के प्रावधान भारतीय लोकतंत्र की सफलता में से एक हैं, लेकिन इसने कई समस्याओं को भी जन्म दिया है।

> आरक्षण की आवश्यकता

  • देश में पिछड़ी जातियों द्वारा झेले जा रहे ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिये।
  • पिछड़े वर्गों के लिये उपयुक्त अवसर प्रदान करने हेतु क्योंकि वे उन लोगों के साथ प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकते हैं जिनके पास सदियों से संसाधनों की पहुँच उपलब्ध है।
  • राज्य की सेवाओं में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये।
  • पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिये।
  • योग्यता के आधार पर समानता सुनिश्चित करने के लिये अर्थात् सभी लोगों को पहले एकसमान स्तर पर लाना और फिर योग्यता के आधार पर उनका मूल्यांकन करना।

> वर्तमान आरक्षण की समस्याएँ

समता का न होना: राज्य के राजनीतिक और सार्वजनिक संस्थानों में आरक्षण से यह सोचा गया था कि अब तक जो लोग उत्पीड़न और अपमान का सामना कर रहे थे अंतः सत्ता और निर्णय-निर्माण में अपनी हिस्सेदारी पाने में सक्षम होंगे। परंतु समाज में अभी भी कई समूहों के लिए अवसरों की समानता सफल नहीं हुई है।

वस्तुकरण की समस्या: रोहिणी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पिछड़े वर्ग के लिये केंद्र सरकार की नौकरियों में नियुक्तियों और केंद्रीय उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश में पिछले पाँच वर्षों के आँकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि केंद्रीय ओबीसी कोटा का 97% लाभ इस वर्ग की केवल 25% जातियों को प्राप्त होता है।

आँकड़ों की कमी: रोहिणी आयोग के आँकड़े केवल उन संस्थानों पर आधारित हैं जो केंद्र सरकार के दायरे में आते हैं। परंतु स्थानीय स्तरों पर विभिन्न समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर स्पष्ट आँकड़ो का अभाव है।

लाभ उठाने में असमर्थ: अभी भी जातियाँ आय के अधिक पारंपरिक स्रोतों से ही जुड़ी हुई हैं और अर्थव्यवस्था के खुलने से उत्पन्न हुए अवसरों का लाभ उठाने में असमर्थ हैं।

समान अवसर आयोग (2008): ने अल्पसंख्यक मामले मे मंत्रालय को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कई सिफारिशें की थीं। परंतु इस संबंध में बहुत कम प्रगति हुई है। क्योंकि सरकारें हमेशा से ही राजनीतिक लाभ के दृष्टिकोण से आगे बढ़ी हैं।

हाशिये वर्गों की माँगें: आराक्षण के लाभ से वंचित रहे हाशिये वर्गों की ओर से माँग उठ रही है कि ऐसे विकल्पों पर विचार किया जाए जो आरक्षण की प्रणाली को पूरकता प्रदान कर सके।

आरक्षण का असमान वितरण: आरक्षण के असमान वितरण ने निम्न जाति समूहों के बीच एकजुटता को भी बाधित किया है।



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