अराजकतावाद (Anarchism) का अर्थ, परिभाषाएं, विशेषताएं , मूल सिद्धांत, आलोचना , विकास



अराजकतावाद का अर्थ

अराजकतावाद शब्द की उत्पति ग्रीक शब्द "अनार्किया" से हुई है, जिसका मतलब होता है "किसी शासक का न होना”।

अराजकतावाद का मूल सिद्धांत यह है कि मनुष्य आपसी सहयोग से न्यायपूर्ण समाज की स्थापना कर सकता है। इसलिए समाज में न्याय की स्थापना तब होगी, जब सरकार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जायेगा। अंतः अराजकतावाद का उद्देश्य राज्य और सभी प्रकार की राजनीतिक सत्ता को समाप्त करना है।

अराजकतावादी राज्य को वास्तविक बुराई के रूप मे देखते हैं, और मानवीय स्वाभाव को अच्छा और समाज को प्राकृतिक संस्था बताते हैं।

अराजकतावाद एक ऐसा सिद्धांत है जो मानव के सभी समस्याओं को दूर करने के लिए राज्य को खत्म करने की बात करता है और राज्य को कृत्रिम मानता है जिसे मनुष्य ने बनाया है।

अराजकतावाद स्वतंत्रता, समानता, और सामाजिक न्याय की प्रेरणा देता है, और इसका मानना है कि समृद्धि और समाज में सुधार का मार्ग राजनीतिक शक्तियों से नहीं, बल्कि सामाजिक सामंजस्य से होता है।

अराजकतावादी विचारक

एपिकुरेंस और स्यनिक्स:- यह प्राचीन विश्व में अराजकतावादी विचारधारक थे। क्योंकि यह राजनीतिक से हटकर शांति को स्थापित करने के लिए मनुष्य के स्वनियंत्रण को महत्त्वपूर्ण मानते थे।

विलियम गोडविन:- यह पहले आधुनिक अराजकतावादी थे इन्होंने 1793 में अपनी पुस्तक “राजनीतिक न्याय का अन्वेषण” में लिखा था कि “समाज तो मनुष्य के लिए वरदान है परंतु सरकार मनुष्य के लिए अभिशाप है”

पी. जे. प्रूदो:- पी. जे. प्रौन्धों पहले ऐसे विचारक थे, जिन्होंने स्वयं को अराजकतावादी पुकारा था। प्रौन्धों ने 1840 में अपनी पुस्तक “what is property” मे लिखा था कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत और सरकार का अंत एक ही बात है

मिखाइल बकुानिन:- मिखाइल बुकानिन हिंसात्मक संघर्षों और आतंकी कार्यक्रमों के जरिये सभी राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक संस्थाओं को तुरंत खत्म करके स्वतंत्र संघ का निर्माण करने पर जोर देते हैं। क्योंकि इन स्वतंत्र संघों से सभी को समान अधिकार होगा।


अराजकतावाद की मान्यताएँ / मूल सिद्धांत / प्रासंगिकता / महत्त्व / विशेषताएं

1. राज्य विरोधी:- हर प्रकार की शासन व्यवस्था अपने आप में समस्यापूर्ण है। क्योंकि अराजकतावादियों का मानना है कि सभी शासन प्रणालियाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता को अवरोधित करती हैं। राज्य इसके लिए अपनी सत्ता का इस्तेमाल करता है और व्यक्ति पर नियंत्रण बनाए रखता है। इसलिए ‘प्रतिनिधित्व व्यवस्था’ (चुनाव / लोकतंत्र) केवल अभिजात वर्ग के अस्तित्व को बनाए रखने का एक तरीका है।

स्टीनर के अनुसार सभी राज्य तानाशाह होते है। क्योंकि राज्य अपने उद्देश्यों के लिए व्यक्ति पर नियंत्रण, प्रतिबंध या दमन करता है।

प्रौन्धों के नज़रिये में 'लोकतंत्र कुछ और नहीं केवल संवैधानिक तानाशाह है।

2. पदसोपनीयता का विरोध:- अराजकतावादियों के अनुसार मानव स्वभाव से नैतिक होते हैं। इसलिए मानव शासक और नेता के बिना शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते है। अंतः अराजकतावादी मुख्य रूप से पदसोपनीय व्यवस्था का विरोध करते है। क्योंकि वे एक ऐसे राज्यविहीन समाज की कल्पना करते है जहाँ मानव आपसी सहयोग से कार्य कर सके।

कुछ चिंतकों ने राज्य की इस पदसोपनीयता को शोषणकारी माना है, जिसमें राज्य कर के माध्यम से व्यक्ति की संपत्ति में हिस्से की दावेदारी पेश करता है।

3. केन्द्रीकरण का विरोध:- अराजकतावादियों ने केन्द्रीकरण के स्थान पर विकेन्द्रीकरण का समर्थन किया है। विकेन्द्रीकृत व्यवस्था को स्वतन्त्रता का परिचायक मानते हुए उसे लागू करने के लिए समाज में स्वतन्त्र संघों की स्थापना पर बल दिया है। जिससे सत्ता का बाज़ारीकरण रोका जा सके और सामाजिक समानता को बढ़ावा मिल सके।

4. धर्म का विरोध:- अराजकतावादियों ने सम्पत्ति, राज्य, धर्म आदि सभी का विरोध किया है। उनका मानना है चाहे राज्य की सत्ता हो या ईश्वर की सत्ता सब का उद्देश्य स्वयं का हित करना है इसके लिए वे तानाशाही को भी अपनाते हैं जिससे सामान्य जनता का शोषण होता है।

धर्म तो वैसे भी अन्धविश्वास और ईश्वरीय कल्पनाओं पर आधारित है। धर्म किसी तार्किक धारणाओं पर आधारित नहीं है। इसमे वे ही लोग आस्था रखते हैं जो मूर्ख है, कायर है और आडम्बरों में विश्वास रखते हैं। ईश्वर में विश्वास करना पाखण्ड को बढ़ावा देना है। अंतः धार्मिक सत्ता पर आसीन व्यक्ति अपने को ईश्वर का उत्तराधिकारी बताकर सामान्य जन का शोषण करते हैं।

5. पूँजीवाद का विरोध:- जिस प्रकार से अराजकतावादी राज्य के प्रबल विरोधी हैं उसी प्रकार वे पूँजीवादी व्यवस्था के भी विरोधी हैं क्योंकि इसमें समाज शोषक व शोषणकर्त्ता जैसे दो वर्गों में विभक्त हो जाता है। अतः ऐसी व्यवस्था का अन्त करना चाहिए जिसमें निर्धनों का शोषण होता हो।

अराजकतावादी धन के वितरण पर भी सवाल उठाते है। वे समाज में विभाजन को रोकने के लिए पूंजीवाद के खिलाफ हैं जिससे निर्धन और धनवानों के बीच की दीवारें गिर सकें।

6. लोकतन्त्र एवं प्रतिनिधि शासन का विरोध:- अराजकतावादियों ने किसी भी प्रकार के शासन को अच्छा नहीं माना है फिर चाहे वह लोकतन्त्र हो या निरंकुश तन्त्र। उनका कहना है निरंकुश तन्त्र तो दबाव पर आधारित व्यवस्था है ही लेकिन लोकतन्त्र भी केवल एक दिखावा मात्र है। क्योंकि यह जनता का प्रतिनिधियात्मक शासन नहीं है बल्कि जनता के साथ केवल छल मात्र है। क्योंकि सत्ता का लाभ प्राप्त करने के लिए भोली-भाली जनता को चुनाव के समय में जो दृश्य दिखाया जाता है वह सच नहीं होता है।

7. व्यक्तिगत सम्पत्ति (private property) का विरोध:-
अराजकतावादियों ने निजी सम्पत्ति को हर प्रकार की बुराई की जड़ माना है। क्योंकि समाज इससे शोषक व शोषणकर्त्ता दो वर्गों में विभक्त हो जाता है। एक पूँजीपति वर्ग होता है जो निर्धनों का शोषण करके उनका मालिक बन जाता है जिसके पास धन की कोई सीमा नहीं होती है और दूसरा ऐसा निर्धन वर्ग होता है जिसके पास अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी धन नहीं होता है।

8. समाज में समानता:- अराजकतावादी विचारधारा समाज में समानता की बात करती है। आजकल कई समाजों में जाति, लिंग, धर्म आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव का समापन करने की मांग है।

अराजकतावाद की आलोचना

(1) अराजकतावाद ने राज्य को एक अनावश्यक बुराई माना है और इसकी आलोचना की है। परन्तु यह पूर्णतया गलत है क्योंकि आज राज्य एक कल्याणकारी संस्था बन गया है

(2) अराजकतावादियों का मानव स्वभाव को लेकर अंध विश्वास है। क्योंकि अधिकांश लोग स्वार्थी होते हैं और उन्हें समाज के हितों की कोई परवाह नहीं होती है

(3) अराजकतावादियों का मानना ​​है कि राज्यविहीन एवं वर्गहीन समाज में अपराधों का अंत हो जायेगा तथा सभी कार्य आपसी सहयोग के आधार पर किये जायेंगे, परन्तु यह व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता है

(4) अराजकतावादी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हिंसक साधन अपनाने के पक्षधर हैं, जिसकी निंदा की जानी चाहिए

(5) राज्य की समाप्ति के बाद अराजकतावादियों ने स्वैच्छिक संस्थाओं को बहुत महत्व दिया है, परंतु वे राज्य के सभी कार्यों को कुशलतापूर्वक नहीं कर सकेंगी

(6) राज्य के उन्मूलन से सभी समस्याओं का समाधान नहीं होगा; इसके विपरीत, कई नई समस्याएँ सामने आएँगी

(7) अराजकतावादियों का यह दृष्टिकोण गलत है कि प्रत्येक कानून व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया जाता है। आधुनिक युग में मजदूरों के कल्याण के लिए अनेक कानून बनाये गये हैं


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1.What do you understand about the theory of anarchism? What is the relevance of anarchist ideas in today's times?
अराजकतावाद के सिद्धांत से आप क्या समझते है? आज के दौर में अराजकतावादी विचारों की क्या प्रासंगिकता है?

OR/अथवा

2.Criticize the anarchist idea of ​​the state.
राज्य के अराजकतावादी विचार की आलोचना कीजिए।

OR/अथवा

3.How do the principles of anarchism differ from those of social order? Discuss this.
अराजकतावाद के सिद्धांतों और सामाजिक व्यवस्था में कैसे अंतर होता है? इस पर चर्चा कीजिए।

OR/अथवा

4.What is the relevance of anarchism in today's times? Explain its importance and impact in detail.
आज के समय में अराजकतावाद की प्रासंगिकता क्या है? इसका महत्त्व और प्रभाव विस्तारपूर्वक बताएं।

OR/अथवा

5.Give examples of anarchist ideas of the state. What impact do these ideas have on society and government policies?
राज्य के अराजकतावादी विचारों के उदाहरण दीजिए। इन विचारों का समाज और सरकारी नीतियों पर कैसा प्रभाव होता है?

OR/अथवा

6.Consider the relationship of anarchism to the political system and society.
राजनीतिक प्रणाली और समाज में अराजकतावाद के संबंध पर विचार कीजिए।

OR/अथवा

7.Consider the challenges and solutions to anarchism.
अराजकतावाद के विरुद्ध चुनौतियों और समाधानों पर विचार करें।


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