मार्क्सवाद (Marxism) का अर्थ, परिभाषाएं, उदय, विशेषताएं , आलोचना, मूल सिद्धांत


मार्क्सवाद (Marxism) का अर्थ, परिभाषाएं, उदय, विशेषताएं , आलोचना, मूल सिद्धांत

मार्क्सवाद (Marxism)

1818 में जर्मनी में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ था जिन्होंने तत्कालीन आर्थिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करके यह बताने की कोशिश करी कि समाज में दो वर्ग होते हैं एक अमीर वर्ग और दूसरा गरीब वर्ग।

अमीर वर्ग हमेशा से गरीब वर्ग का शोषण करते हुए आए हैं। इसलिए इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है। जिससे समाज मे उदारवाद, पूंजीवाद और निजीकरण समाप्त हो जाएगा और समाज वर्गविहीन हो जाएगा।

कार्ल मार्क्स ने उदारवादी विचारधारा की आलोचना करते हुए अपने विचार दिए है अंतः इन्हीं विचारों के आधार पर मार्क्सवाद का विकास हुआ है।

कार्ल मार्क्स के विचारों को आगे बढ़ाते हुए, फ्रेडरिक एंगेल्स, स्टालिन, लेनिन जैसे विचारकों ने मार्क्सवाद का समर्थन करते हुए समाजवाद और कम्युनिस्ट आंदोलनों का मार्गदर्शन किया है।

मार्क्सवाद (Marxism) का उदय

1750 से 1850 ई के बीच विश्व में औद्योगिक क्रांति हुई इसलिए जो काम पहले हाथों से हुआ करता था वह अब मशीनों द्वारा किया जाने लगा था।

इस समय उद्योगपतियों ने मजदूर और गरीब वर्ग से कम पैसों में ज्यादा से ज्यादा काम करवाया जिसके कारण अमीर ओर अमीर होते गए और गरीब ओर गरीब होते गए।

इसलिए कार्ल मार्क्स ने गरीब और मजदूर लोगों को सलाह दी कि उन्हें इस शोषण के खिलाफ एक होकर विद्रोह करना चाहिए। इस विद्रोह से पूंजीवाद नष्ट हो जाएगा और संसाधनों को सभी लोगों में समान रूप से बांट दिया जाएगा जिससे समाज में समानता आ जाएगी।

आगे कार्ल मार्क्स कहते हैं कि हमें समाज में राज्य को भी नष्ट कर देना चाहिए क्योंकि राज्य पूंजीपतियों के अनुसार कार्य करता है अंतः कार्ल मार्क्स ने मजदूर और गरीब वर्ग के लोगों को स्वयं शासन करने की सलाह दी। इसके लिए कार्ल मार्क्स ने कहा कि हमें पूंजीवाद को नष्ट करके समाजवाद को अपनाना चाहिए और जब मजदूर और गरीब लोग स्वयं शासन करना सीख जाएंगे तो राज्य को भी खत्म कर देना चाहिए।

कार्ल मार्क्स ने अपने इन विचारों को अपनी पुस्तक “Communist Manifesto” और “दास केपिटल” मे दिए थे अंतः इन्ही विचारों को मार्क्सवाद के नाम से जाना जाता है।

> मार्क्सवाद के उदय के कारण

1. उदारवाद का उदय
2. बदता हुआ शोषण
3. समाज में पूँजीपतियों का प्रभुत्व
4. औद्योगिक क्रांति
5. राज्य पर पूंजीपतियों का प्रभुत्व

मार्क्सवाद (Marxism) के मूल सिद्धांत

द्वंदात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism)

हेगेल के अनुसार समाज में समस्याओं का समाधान करने के लिए वार्तालाप किए जाते हैं जिससे नए विचारों का उदय होता है परंतु हम दोबारा उन नए विचारों वाद-विवाद करते हैं यह वार्तालाप और वाद-विवाद तब तक चलते रहते हैं जब तक कि समस्या का सही समाधान नहीं निकल जाता है

मनुष्य अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक अपने विचारों से घिरा होता है इसलिए समाज में संघर्ष का मुख्य कारण जड़ तत्व (बुद्धि) ही है


ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) / इतिहास की आर्थिक व्यवस्था का सिद्धांत

कार्ल मार्क्स के अनुसार :-

> आदिम युग:- आदिम युग में सभी लोग बराबर थे क्योंकि न कोई अमीर था और न ही कोई गरीब था और समाज राज्य विहीन था और जनसंख्या भी बहुत कम थी

> दासता का युग:- आदिम युग के बाद धीरे-धीरे मनुष्य में बुद्धि का विकास हुआ और जनसंख्या में वृद्धि होती गई जिसके कारण मनुष्य ने संसाधनों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया था

अब जिस मनुष्य ने संसाधनों को इकट्ठा कर लिया था वह मालिक बन गए और जो मनुष्य संसाधन को इकट्ठा नहीं कर पाए वह दास बन गए जिससे दासता का युग शुरू हुआ

इसी युग में ही राज्य का उदय हुआ था

> सामंतवादी युग:- संसाधनों को इकट्ठा करने की होड़ में कुछ मनुष्य ने जमीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था जिससे धीरे-धीरे सामंतवादी युग का विकास हुआ

इस युग में जमींदार और किसान वर्ग थे अंतः जमींदार अपनी जमीनों पर किसानों से मजदूरी करवा कर उनका शोषण करते थे

> पूंजीवादी युग:- सामंतवादी युग में फसल के अधिक उत्पादन के कारण लोगों ने अतिरिक्त उत्पादन का व्यापार करना शुरू कर दिया जिससे पूंजीवादी युग का विकास हुआ

पूंजीवादी युग में उद्योगपति अपनी पूंजी का निवेश करके मजदूर वर्ग से अतिरिक्त काम करवा कर उनका शोषण करते थे

> समाजवादी युग:- पूंजीपतियों के शोषण के कारण समाजवादी युग की शुरुआत हुई क्योंकि कार्ल मार्क्स मजदूरों को एक होकर विद्रोह करने की सलाह देते हैं और समाज में समानता लाने की बात कहते हैं जिससे समाजवाद का विकास हुआ

सर्वप्रथम समाजवादी क्रांति 1917 में रूस में हुई थी जिसके बाद सोवियत संघ में समाजवाद को अपनाया गया था इसके बाद चीन, वियतनाम, उत्तरी कोरिया, क्यूबा जैसे देशों ने भी समाजवाद को अपनाया गया था

> साम्यवादी समाज:- समाजवादी क्रांति से आदिम युग की तरह समय आ जाएगा जिसे साम्यवादी समाज बोला जाता है

साम्यवादी समाज आदिम युग की तरह वर्ग विहीन और राज्य विहीन होगा और सभी मनुष्य को संसाधन उसकी आवश्यकता के अनुसार मिलेंगे

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत

कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी युग में उद्योगपति मजदूर वर्ग से कम पैसों में ज्यादा से ज्यादा काम लेने की कोशिश करते थे और अतिरिक्त समय कम करने पर उन मजदूरों को कोई भी वेतन नहीं दिया जाता था

इसलिए कार्ल मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत दिया जिसके अनुसार मजदूर वर्ग को अतिरिक्त कार्य के करने का अतिरिक्त मूल्य मिलना चाहिए

मार्क्स ने अपने इस सिद्धांत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धारण का आधार माना है

सर्वहारा क्रांति

पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगपतियों द्वारा मजदूर वर्ग या शोषित वर्ग (सर्वहारा वर्ग) बहुत शोषण किया जाता है इसलिए कार्ल मार्क्स इन सर्वहारा वर्ग को पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक होकर क्रांति करने की सलाह देते हैं

इस कांति में सर्वहारा वर्ग को उद्योगपतियों के सारे संसाधन हड़प लेने चाहिए और उन संसाधनों को समान रूप से विभाजित कर देना चाहिए ताकि समाज में समानता आ जाए

वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत

कार्ल मार्क्स के अनुसार प्राचीन इतिहास से ही मनुष्य दो वर्गों में विभाजित है एक शोषक वर्ग और दूसरा शोषित वर्ग प्राचीन इतिहास से अब तक शोषक वर्ग शोषित वर्ग का शोषण और दमन करते आए हैं

अंतः कार्ल मार्क्स वर्ग विहीन समाज की स्थापना करने के लिए शोषित वर्ग को एक साथ होकर क्रांति करने की सलाह देते हैं जिससे समाज में समानता स्थापित हो जाएगी

साम्यवाद

पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध सर्वहारा क्रांति के कारण समाजवाद की स्थापना होगी, इस समाजवादी व्यवस्था में सभी लोग सामान होंगे और राज्य समाज की भलाई के लिए कार्य करेगा

अंतः जब पूंजीवादी व्यवस्था पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगी तो राज्य की व्यवस्था भी समाप्त कर दी जाएगी और लोग स्वयं शासन करेंगे जिसे साम्यवाद कहा जाता है

अलगाव की अवधारणा

कार्ल मार्क्स ने 1844 में अपनी एक पुस्तक "economic and philosophic manuscripts" लिखी थी जिसमें कार्ल मार्क्स ने बताया कि मनुष्य चार प्रकार से अलगाव (अलग) हो गया है:-

1 उत्पादन:- आज मनुष्य उत्पादन से अलग हो गया है क्योंकि पूंजीपति लोग मजदूर वर्ग से इतना काम लेते हैं कि मनुष्य वास्तु के समान होता जा रहा है

2 सहकर्मी:- कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीपतियों ने स्थिति को कुछ इस प्रकार का बना दिया है कि मजदूर वर्ग काम के दबाव में आकर अपने सहकर्मियों से अलग होता जा रहा है

3 प्रकृति:- आदिम युग में मनुष्य प्रकृति से जुड़ा हुआ था और उसके सभी कार्यों में प्रकृति का अंश सम्मिलित था परंतु समय बीतने के अनुसार मनुष्य प्रकृति से पूरी तरह अलग होता जा रहा है

4 अपने आप से:- आजकल मनुष्य अपने विचाराे में अपने आप के बजाय अपने माता-पिता, बहन-भाई, सहकर्मी या मित्र के बारे में सोचता है

मार्क्सवाद (Marxism) की आलोचना या मूल्यांकन

1. मार्क्सवाद एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जो वर्ग विहीन और राज्य विहीन हो | इसका व्यावहारिक हल मार्क्सवादी देशो के पास भी नही है। इसलिए कार्ल कॉपर, कार्ल मार्क्स के मार्क्सवादी विचारों को काल्पनिक बताते हैं

2. मार्क्सवादीयों का दृष्टिकोण है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा आवश्यक है कितुं हिसां किसी भी स्थिति में सवर्मान्य (सही) नही हो सकती है।

3. मार्क्सवादी श्रमिको की तानाशाही की बात करते है जो तानाशाही शासको का एक विकृत (बड़ा) रूप है।

4. मार्क्सवाद समाजवादी लोकतंत्र के प्रति आस्था व्यक्त करते है। परंतु वास्तव में यह तानाशाही व्यवस्था का ही दूसरा रूप है। क्योंकि इस व्यवस्था में कोई दूसरा राजनीतिक दल नही होता है।

5. मार्क्स ने अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धारण का आधार माना है जो त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि मूल्य निर्धारण के लिये मांग, समय, स्थान आदि ऐसे कारण है जो वस्तु के मूल्य निर्धारण को प्रभावित करते है।

6 रूस, चीन, पोलैंड, हंगरी, युगोस्लाविया तथा क्यूबा आदि मार्क्सवादी देशों में धार्मिक स्वतंत्रता है परंतु वास्तव में इन देशों की नीति धर्म प्रचार के विरुद्ध है

7. मैकाइवर के अनुसार राज्य का निर्माण शोषण के लिए नहीं किया गया था बल्कि कबीलों में न्याय की भावना को देखते हुए राज्य का निर्माण किया गया था

8.प्लेटो और अरस्तू के अनुसार यदि राज्य नहीं होगा तो समाज में अराजकता फैल जाएगी और समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति पैदा हो जाएगी


Related Questions

1.Which values ​​of liberalism were challenged by Marxist ideas? Do you agree with those challenges?
उदारवाद के किन मूल्यों को मार्क्सवादी विचारों ने चुनौती दी। क्या आप उन चुनौतीयों से सहमत है?

OR/अथवा

2.Discuss Marx's views on the subject of alienation. Are these ideas still relevant today? Give reasons.
अलगाव के विषय पर मार्क्स के विचारों की विवेचना कीजिए। क्या ये विचार आज भी प्रासंगिक है ? तर्क दीजिए।

OR/अथवा

3.Do you believe that Marx's idea of ​​alienation is relevant to our own world?
क्या आप यह मानते हैं कि मार्क्स का अलगाव या परायापन का विचार हमारी अपनी दुनिया के लिए प्रासंगिक है ?

OR/अथवा

4.Is Marxism relevant in contemporary times? Give a reason.
समकालीन समय में क्या मार्क्सवाद प्रासंगिक है। कारण बताइये।

OR/अथवा

5.Critically examine the main principles of communication.
संवाद के मुख्य सिद्धांतों का अलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

OR/अथवा

6.Discuss the political ideology of Marx in the context of class struggle.
वर्ग संघर्ष के संदर्भ में मार्क्स के राजनीतिक विचारधारा की विवेचना कीजिए।

OR/अथवा

7.Discuss Marx's theory of alienation. Do you believe that for the contemporary world What is the relevance of this principle?
मार्क्स के परायापन या अलगाव के सिद्धांत की विवेचना कीजिये। क्या आप मानते हैं कि समकालीन दुनियां के लिए इस सिद्धांत की प्रासंगिकता है


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