राजनीतिक बाध्यता (Political Compulsion) का अर्थ, ऐतिहासिक विकास, परिभाषाएं, हमें राज्य की आज्ञा क्यों माननी चाहिए?

राजनीतिक बाध्यता (Political Compulsion) का अर्थ, ऐतिहासिक विकास, परिभाषाएं, हमें राज्य की आज्ञा क्यों माननी चाहिए?

राजनीतिक बाध्यता (Political Compulsion) का अर्थ

राजनीतिक बाध्यता वह स्थिति है जिसमें कोई व्यक्ति, समूह या समाज किसी राजनीतिक प्रक्रिया, निर्णय, नीति या सरकारी पहलू को बदलने मे असमर्थ होता है। और यह सामाजिक या राजनीतिक प्रक्रियाओं में सहयोग न करने या उन प्रक्रियाओं के खिलाफ विरोध करने की अशक्ति को दर्शाता है।

इससे व्यक्ति या समूह की सामाजिक या आर्थिक उन्नति पर प्रतिबंध लग सकता है और वह सकारात्मक परिणामों तक पहुंचने में असमर्थ हो सकते हैं।


राजनीतिक बाध्यता (Political Compulsion) का ऐतिहासिक विकास

> प्राचीन काल:- प्राचीन काल में जब “सुकरात” को राज्य का विरोध करने के लिए मृत्युदंड दिया जा रहा था तब उन्होंने राज्य से संबंधित कुछ सिद्धांत दिए थे जिनका प्लेटो ने अपनी पुस्तक "क्रिटो" में वर्णन किया है:-

1 समझौता:- राज्य को हम लोगों ने बनाया है इसलिए राज्य और हमारा एक समझौता हुआ है अंतः हम इस समझौते का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं।

2 आभार:- हमारा जन्म, पालन-पोषण और विकास इसी राज्य में हुआ है अंतः हमें राज्य का आभार प्रकट करने के लिए राज्य का पालन करना चाहिए।

3 निष्पक्षता का सिद्धांत:- राज्य जो भी कानून बनता है उसमें जनता की सहमति होती है इसलिए हमे उन कानून का निष्पक्षता से पालन करना चाहिए।

4 उपयोगितावाद:- राज्य जनता के विकास के लिए वह सब करता है जो सर्वोच्च और उपयोगी होता है इसलिए हमें राज्य का पालन करना आवश्यक है।

> मध्यकाल:- मध्यकालीन यूरोप में राज्य के ऊपर चर्च का प्रभुत्व होता था और राज्य चर्च के अनुसार नियम बनाता था इसलिए चर्च के पादरियों ने इन नियमों का पालन करवाने के लिए एक देवीय सिद्धांत दिया।

इस देवीय सिद्धांत के अनुसार चर्च के पादरियों ने जनता को यह बताया कि राजा देव का प्रतिनिधित्व करते हैं और राजा जो भी कानून बनाते हैं वह एक देवीय आदेश होता है। अंतः यदि हम राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का पालन नहीं करते हैं तो हम अपने ईश्वर का अपमान करते हैं।

> सामाजिक समझौता और सहमति:- हॉब्स, जॉन लॉक और रूसो ने सामाजिक समझौता और सहमति का सिद्धांत दिया है जिसके अनुसार जब राज्य नहीं था तो समाज में युद्ध की स्थिति बनी रहती थी, इसी स्थिति से संरक्षण के लिए जनता ने आपस में समझौता और सहमति के द्वारा राज्य का निर्माण किया था अंतः हमें इस राज्य का पालन करना चाहिए।

हॉब्स के अनुसार:- राज्य को जनता ने बनाया है इसलिए अब उसे राज्य को हटाया नहीं जा सकता है।

जॉन लॉक के अनुसार:- जनता ने राज्य का निर्माण अपने प्राकृतिक अधिकारों (जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति) के संरक्षण के लिए किया है और यदि कोई राजा इन अधिकारों का संरक्षण नहीं कर पता है तो जनता को यह अधिकार है कि वह उसे राजा को हटाकर किसी दूसरे राजा का चुनाव कर सके।

रूसो के अनुसार:- जनता ने राज्य का निर्माण अपनी सामान्य इच्छा या जरूरत को पूर्ण करने के लिए किया है।

> परंपराओं के प्रति निष्ठा:- यह सिद्धांत बर्क, हीगल और ऑकशाट द्वारा प्रस्तुत की गई है जिसके अनुसार राज्य का पालन करने की परंपरा पुराने समय से चलती आ रही है इसलिए हमें आज भी बिना किसी सवाल के राज्य का पालन करना चाहिए।

> विवेकशील सिद्धांत:- यह सिद्धांत प्लेटो, अरस्तु, ग्रीन और बोसाके द्वारा प्रस्तुत किया गया है जिसके अनुसार एक व्यक्ति अपना संपूर्ण विकास राज्य के अधीन रहकर ही कर सकता है अंतः इसलिए हमें राज्य का पालन करना चाहिए।

> आधुनिककाल:- राज्य एक वैध संस्था है जिसे वैध सत्ता भी प्राप्त है और राज्य जो भी नियम बनाता हैं उसका आधार नैतिक होता है क्योंकि राज्य उन नियमों का पालन करवाना चाहता है ना कि डराने या धमकाने तक सीमित है।


हमें राज्य की आज्ञा क्यों माननी चाहिए?

1. जनता की सहमति:- राज्य के पास जनता की सहमति होती है क्योंकि जनता ही मतदान करके सत्ता की दौड़ में प्रतिनिधि को विजय करवाती है।

राज्य जनता का प्रतिनिधितव करता है और राज्य द्वारा बनाए गए नियमों को अप्रत्यक्ष रूप से जनता की सहमति होती है अंतः हमें राज्य की आज्ञा का पालन करते है।

2. सामाजिक कर्तव्य:- राज्य समाज का सर्वोच्च प्राधिकारी होता है सामाजिक के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि राज्य की आज्ञा का पालन करें। यदि किसी समाज में नागरिक राज्य के नियमों का पालन नहीं करते हैं तो वह समाज भ्रष्ट हो जाएगा।

3. वैध संस्था:- राज्य एक ऐसी संस्था है जिसे जनता की सहमति के साथ-साथ संवैधानिक दर्जा प्राप्त होता है इसलिए राज्य एक वैध संस्था है। यदि हम राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का पालन नहीं करते हैं तो हम अप्रत्यक्ष रूप से संविधान का अपमान भी करते हैं।

4. प्रभुसत्ता:- राज्य को संवैधानिक रूप से प्रभुसत्ता प्राप्त होती है ताकि विदेशी ताकतों का वर्चस्व हमारी स्वतंत्रता को हानि न पहुंचाएं। अंतः राज्य का यह कर्तव्य है कि वह जनता की सुरक्षा और स्वतंत्रता को बनाए रखें इसलिए हमें राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना आवश्यक है।

5. विदेशी ताकतों से संरक्षण:- जिस प्रकार 1947 से पहले हम भारतीयों पर शासन किया था इस प्रकार आज भी विदेशी ताकत हमारी स्वतंत्रता को हानि पहुंचा सकती है। अंतः हमें अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों के संरक्षण के लिए राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना आवश्यक है।

6. सामाजिक व्यवस्था:- राज्य के तीन प्रमुख तत्व न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिपालिका होते हैं इसलिए किसी भी लोकतंत्र समाज में सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए इन तीनों तत्वों की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

अंतः हम इस सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए राज्य या राज्य के इन तीनों तत्वों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करते हैं।


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1.Do we have a political obligation to obey the state? Discuss the scope of civil disobedience in a liberal democratic republic.
क्या राज्य का पालन करना हमारा राजनीतिक दायित्व है? उदार लोकतांत्रिक गणराज्य में सविनय अवज्ञा के दायरे की चर्चा कीजिए।

OR/अथवा

2.What is the meaning of political responsibility?
राजनीतिक दायित्व का क्या अर्थ है?

OR/अथवा

3.Is it our political responsibility to obey the state? Discuss the scope of civil disobedience in a liberal democratic republic.
क्या राज्य का पालन करना हमारा राजनीतिक दायित्व है? उदार लोकतांत्रिक गणराज्य में सविनय अवज्ञा के दायरे की चर्चा कीजिए।

OR/अथवा

4.Provide an account of the major debates on the question “why should we obey the state?”
“हमें राज्य की आज्ञा क्यों माननी चाहिए” के प्रश्न पर प्रमुख बहसों का विवरण प्रदान कीजिए।

OR/अथवा

5.Write a short note on the idea of ​​political responsibility towards the state.
राज्य के प्रति राजनीतिक दायित्व के विचार पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।


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