भारतीय संविधान (Indian Constitution): भारत के संविधान की मुख्य विशेषताएं और आलोचनाएं

भारतीय संविधान (Indian Constitution): भारत के संविधान की मुख्य विशेषताएं और आलोचनाएं

भारत का संविधान (Indian Constitution) : परिचय

संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जिसके द्वारा देश मे शासन व्यवस्था चलाई जाती है। इसमे नियम, कायदे, कानून, सरकार की शक्तियां, सरकार के अधिकार आदि के बारे मे विस्तार से लिखा होता है।

एक विश्लेषक का दावा है कि संविधान एक जीवित पाठ है जो देश की बदलती आवश्यकताओं और स्थितियों के जवाब में बदलता है।

भारत का संविधान जुलाई 1946 में लोगों द्वारा चुनी गई “संविधान सभा” के माध्यम से लिखा गया था। और इस संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी।

संविधान को लिखने में इस सभा लगभग 2 साल, 11 महीने, 18 दिन लगे। अंतः इसे 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को यह लागू किया गया था।

पिछले 74 सालों में भारतीय संविधान में 100 से ज्यादा संशोधन (सुधार) हो चुके हैं। हालाँकि इसका मौलिक स्वरूप नहीं बदला है

संविधान दो तरह के होते है:- लिखित और अलिखित। भारत का संविधान एक लिखित संविधान है और यह दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान भी है।


भारतीय संविधान (Indian Constitution) की मुख्य विशेषताएं

1. सबसे लंबा लिखित संविधान

ज्यादातर लोकतान्त्रिक देश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, चीन, जर्मनी की तरह भारत का भी एक लिखित संविधान है।

भारत का संविधान दुनिया का अब तक सभी लिखित संविधानों में सबसे लंबा है।

जब संविधान को पहली बार अपनाया गया था, तब इसमे 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियां और 22 भाग थे। लेकिन वर्तमान में भारतीय संविधान में 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां और 25 भाग हैं।

2. सफलतम संविधान

भारतीय संविधान दुनीया का सबसे सफल संविधान है। क्योंकि इसमे जरूरत पड़ने पर संशोधन (सुधार) किए गए है लेकिन इसे बदलने की जरूरत नहीं पड़ी। अंतः जब से यह बना है, तब से लेकर आज तक सफल तरीके से चलता आ रहा है।

3. न ज्यादा कठोर और न ज्यादा लचीला

भारतीय संविधान इतना कठोर नहीं है कि इसमे संशोधन न कर सके। जरूरत पड़ने पर इसमे संशोधन किया जा सकता है।

भारतीय संविधान इतना लचीला भी नहीं है कि इसमे आसानी से संशोधन किया जा सके। अंतः यह भारतीय संविधान की मुख्य विशेषता है जो इसे सबसे अच्छा बनती है।

4. मौलिक अधिकारों का प्रावधान

भारतीय संविधान मे हर एक व्यक्ति को मौलिक अधिकार दिए गए है और यह लोगों के विकास के लिए भी जरूरी है।

भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक मौलिक अधिकारों का प्रावधान(Provision) किया गया है और जरूरत पड़ने पर इसमे संशोधन भी किया जा सकता है।

मौलिक अधिकार

समता का अधिकार (समानता का अधिकार), (अनुच्छेद 14-18)
स्‍वतंत्रता का अधिकार, (अनुच्छेद 19-22)
शोषण के विरुद्ध अधिकार, (अनुच्छेद 23-24)
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, (अनुच्छेद 25-28)
संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार, (अनुच्छेद 29-30)
संवैधानिक उपचारों का अधिकार, (अनुच्छेद 32)

(नोट:- संपत्ति के अधिकार को 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकार से कानूनी अधिकार में बदल दिया गया था।)

5. मौलिक कर्तव्य

मूल संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान नहीं था। स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 1976 के 42वें संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्यों को हमारे संविधान में जोड़ा गया था।

उस समय दस मौलिक कर्तव्यों थे। बाद में, 2002 के 86वें संविधान संशोधन द्वारा एक और मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया। अंतः संविधान में कुल 11 मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है।

अधिकार लोगों को गारंटी के रूप में दिए जाते हैं, जबकि कर्त्तव्य ऐसी जिम्मेदारी हैं जिन्हें पूरा करने की उम्मीद हर एक नागरिक से की जाती है।

मौलिक कर्त्तव्यों की सूची

1. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्रीय गान का आदर करें।
2. स्वतंत्रता के लिये राष्ट्रीय आंदोलन को हृदय में संजोये रखें और उनका पालन करें।
3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें।
4. देश की रक्षा करें और जरूरत पड़ने पर राष्ट्र की सेवा करें।
5. सभी लोगों में समान भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा, लिंग या वर्ग के भेदभाव से परे हो
6. हमारी संस्कृति की परंपरा का महत्त्व समझें और उसकी रक्षा करें।
7. प्राकृतिक (वन, झील, नदी और वन्यजीव) की रक्षा करें तथा प्राणीयो के लिये दया भाव रखें।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानववाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करें।
9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों मे सतत् प्रयास करें जिससे राष्ट्र प्रगति की बढ़ेगी
11. 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना (इसे 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा जोड़ा गया)।

6. एकल नागरिकता

भारतीय संविधान में सिर्फ एक ही नागरिकता का प्रावधान है। इसका मतलब है कि हर एक भारतीय, भारत का नागरिक है, चाहे उसका निवास स्थान (रहने की जगह) या जन्म स्थान (पैदा होने की जगह) कुछ भी हो।

भारत के सभी नागरिक देश में कहीं भी रोजगार लेने के हकदार हैं और भारत के सभी हिस्सों में अपने सभी अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

एकल नागरिकता ने भारत के लोगों में एकता की भावना पैदा की है।

7. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार

भारतीय लोकतंत्र ‘एक व्यक्ति एक मत’ के आधार पर काम करता है।

भारत का हर एक नागरिक जो 18 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र का है और किसी भी जाति, लिंग, धर्म, अमीर या गरीब हो उसे चुनाव में वोट देने का अधिकार है।

भारत मे पहले वोट देने की उम्र 21 साल थी लेकिन बाद मे इसे 18 साल कर दिया गया था।

भारतीय संविधान सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से भारत में राजनीतिक समानता स्थापित करता है।

8. धर्मनिरपेक्षता

भारत एक धर्मनिरपेक्षता वाला राज्य है जिसमें सभी धर्मों को मानने वाले लोग रहते है है। उदाहरण के लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी।

भारत का संविधान भी एक धर्मनिरपेक्ष संविधान है। इसलिए, यह किसी विशेष धर्म का समर्थन नहीं करता है। जिसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 28 में भी देखने को मिलता है

भारतीय संविधान में “धर्मनिरपेक्षता” शब्द को 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है एवं इस शब्द को भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी शामिल किया गया है।

धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की मुख्य विशेषताएं इस तरह है:-

राज्य खुद को किसी धर्म के साथ नहीं जोड़ेगा या उसके द्वारा नियंत्रित नहीं होगा।

राज्य हर किसी को किसी भी धर्म का पालन करने का अधिकार देता है, यह उनमें से किसी को भी विशेष दर्जा नहीं देगा।

राज्य द्वारा किसी भी व्यक्ति के खिलाफ उसके धर्म या आस्था के आधार पर कोई भेदभाव नहीं दिखाया जाएगा।

इस विचार का उद्देश्य एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करना है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत धर्म विरोधी है। भारतीय संविधान सभी धर्मों को बराबर सम्मान देता है और सभी धर्मों की बराबर रक्षा करता है।

9. समाजवाद

भारतीय संविधान में कहीं भी “समाजवाद” शब्द देखने को नहीं मिलता है हालाँकि भारतीय संविधान भाग-IV में हम सामाजिक सिद्धांतों को देख सकते हैं क्योंकि भारतीय संविधान निर्माताओं का उद्देश्य था कि समाज में गरीब एवं पिछड़े वर्गों की स्थिति में सुधार करके एक प्रासंगिक व्यवस्था कायम की जाए।

इंदिरा गाँधी की सरकार द्वारा “समाजवाद” शब्द को भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा सम्मिलित किया गया था।

10. संघीय व्यवस्था / संघीय गणराज्य / शक्तियों का पृथक्करण


भारतीय संविधान में संघीय व्यवस्था कनाडा के संघीय व्यवस्था से ली गई है

भारत में सरकार की द्विस्तरीय व्यवस्था है जिसमें सरकार दो स्तरों पर कार्य करती है केन्द्र एवं राज्य| और इसका उल्लेख भारतीय संविधान की अनुसूची - VII में किया गया है। जिसमें मुख्यतः तीन सूचियाँ सम्मिलित हैं केन्द्र सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची।

भारतीय संविधान के द्वारा संवैधानिक संस्थाएँ जिनकी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जैसे वित्तीय आयोग, नीति आयोग, इनकी नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा ही की जाती है।

11. राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व

भारतीय संविधान में राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व आयरलैंड गणराज्य के संविधान से लिए गए हैं जिन्हें भारतीय संविधान के भाग IV में रखा गया है

यदि मौलिक अधिकारों को लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है तो नीति-निर्देशक तत्त्वों को सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के रूप में देखा जाता है जो गरीबों एवं नीचे तबके के उत्थान के लिए आवश्यक है।

न्यायालय में नीति-निर्देशक तत्त्वों को चुनौती नहीं दी जा सकती है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स केस 1980 और अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारतीय संघ केस में मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्त्वों को एक-दूसरे के पूरक बताया है न कि विरोधात्मक।

12. स्थानीय सरकार / स्वशासन

महात्मा गाँधी जिन्हें भारत का पिता भी कहा जाता है ने विकेन्द्रीकरण द्वारा ग्रामीण भारत को मजबूत करने का सपना देखा था।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में स्थानीय शासन की बात की गयी है एवं 1992 के 73वें - 74वें संशोधनों द्वारा त्रिस्तरीय स्थानीय सरकार और ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर गठित किया गया है।

यह विश्व की सबसे बड़ी स्वशासन सरकार है।


संघीय व्यवस्था / संघीय गणराज्य / शक्तियों का पृथक्करण

भारतीय संविधान में संघीय व्यवस्था कनाडा के संघीय व्यवस्था से ली गई है

भारत में सरकार की द्विस्तरीय व्यवस्था है जिसमें सरकार दो स्तरों पर कार्य करती है केन्द्र एवं राज्य| और इसका उल्लेख भारतीय संविधान की अनुसूची - VII में किया गया है। जिसमें मुख्यतः तीन सूचियाँ सम्मिलित हैं केन्द्र सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची।

भारतीय संविधान के द्वारा संवैधानिक संस्थाएँ जिनकी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जैसे वित्तीय आयोग, नीति आयोग, इनकी नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा ही की जाती है।


कानून का शासन

"कानून का शासन" का अर्थ है कि कानून सर्वोपरि (सबसे ऊपर) है।

यह फ्रांसीसी वाक्यांश "le Principe de la legalite" से लिया गया है, जो सरकार को कानून द्वारा निर्देशित करता है, ना कि व्यक्ति द्वारा।

इस वाक्यांश की अलग-अलग देशों में अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की गई है।

सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत ए. वी. डाइसी द्वारा प्रतिपादित किया गया था। यह सिद्धांत उनकी पुस्तक "द लॉ ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन" में दिया हुआ है। उनका सिद्धांत था कि सरकार को पुरुषों के बजाय कानून के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए"

ए. वी. डिके इसके तीन प्रमुख स्तंभों की व्याख्या करते है:-

1 कानून की सर्वोच्चता: यह देश के कानूनी प्रभुत्व और पूर्ण शक्ति को दर्शाता है। कानून यह सभी पर लागू होता है, उन लोगों पर भी जो नागरिक नहीं हैं।

डाइसी का मानना था कि अदालत में स्थापित कानून को बिना किसी अपवाद के पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए।

2 कानून के समक्ष समानता:
इसका मतलब है न्यायसंगत और निष्पक्ष तरीके से प्रत्येक व्यक्ति, चाहे उसकी स्थिति या रैंक कुछ भी हो, अदालत में कानून और प्रक्रिया सभी के लिए समान होनी चाहिए।

भारतीय संविधान में अनुच्छेद (14-18) के अंतर्गत समानता के अधिकार का उल्लेख है। कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण, जाति, रंग, पंथ, लिंग और धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध। समान अवसर, रोजगार की रक्षा, अस्पृश्यता का उन्मूलन, उपाधियों का उन्मूलन।

3 कानूनी की प्रबलता: डाइसी का मानना था कि केवल पिछले दो सिद्धांतों को स्थापित करना अपर्याप्त होगा और इस लिए एक तंत्र (व्यवस्था) होना चाहिए जो कानून को बनाए रखने का अधिकार हो।

इसलिए उन्होंने अदालतों को यह अधिकार देने की बात कही। उन्होंने एक निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका का प्रस्ताव रखा, जो कानून के शासन के कार्यान्वयन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा।



संप्रभुता

भारत इस अर्थ में संप्रभु है कि सत्ता (power) लोगों के पास है और वे लोग सर्वोच्च (सबसे ऊपर) हैं।

भले ही संविधान पर मतदान नहीं हुआ था परंतु 1951-52 के पहले आम चुनावों में लोगों ने संविधान सभा को अस्वीकार नहीं किया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी को सत्ता में लाने के लिए मतदान किया। क्योंकि इस पार्टी ने संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी

हर पांच साल में लोग लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए मतदान करते हैं। राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए हथकंडे अपनाते हैं। और यदि तत्कालीन सरकार विधायिका में बहुमत खो देती है, तो सरकार इस्तीफा दे देती है। अंतः नए सिरे से चुनाव कराने की घोषणा की जाती है।

भारत का संविधान लोकतांत्रिक है क्योंकि सरकार लोगों द्वारा बनाई जाती है। प्रस्तावना के प्रारंभिक शब्दों में कहा गया है "हम भारत के लोग" जो यह स्पष्ट करता है कि लोग सर्वोच्च हैं। यह स्पष्ट रूप से स्पष्ट है कि संविधान अपनी शक्ति लोगों से प्राप्त करता है।

भारत भी एक गणतंत्र है जहाँ देश का प्रमुख चुना जाता है जबकि ब्रिटेन जैसे कुछ देशों का प्रमुख वंशानुगत होता है।


लोकतंत्र

प्रस्तावना भारत को एक लोकतांत्रिक राज्य घोषित करती है।

लोकतंत्र से तात्पर्य केवल लोगों की सरकार और लोगों द्वारा सरकार से है, दूसरे शब्दों में, लोगों के पास राजनीतिक शक्ति में हिस्सेदारी होती है जिसे वे अपने द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रयोग करते हैं।

भारतीय संविधान में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाया गया है तथा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा राज्य सभा के सदस्यों के चुनाव में एकल संक्रमणीय मतदान प्रणाली को अपनाया गया है।

लोकसभा एवं विधान सभा चुनावों में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली को अपनाया गया है। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग का प्रावधान भी किया गया है, इस प्रकार 1952 से आज तक चुनावों के माध्यम से भारत में लोकतंत्र का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है।


धर्मनिरपेक्षता और सर्व धर्म सम भाव

भारत एक धर्मनिरपेक्षता वाला राज्य है जिसमें सभी धर्मों को मानने वाले लोग रहते है है। उदाहरण के लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी।

भारत का संविधान भी एक धर्मनिरपेक्ष संविधान है। इसलिए, यह किसी विशेष धर्म का समर्थन नहीं करता है। जिसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 28 में भी देखने को मिलता है

भारतीय संविधान में “धर्मनिरपेक्षता” शब्द को 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है एवं इस शब्द को भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी शामिल किया गया है।

धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की मुख्य विशेषताएं इस तरह है:-

राज्य खुद को किसी धर्म के साथ नहीं जोड़ेगा या उसके द्वारा नियंत्रित नहीं होगा।

राज्य हर किसी को किसी भी धर्म का पालन करने का अधिकार देता है, यह उनमें से किसी को भी विशेष दर्जा नहीं देगा।

राज्य द्वारा किसी भी व्यक्ति के खिलाफ उसके धर्म या आस्था के आधार पर कोई भेदभाव नहीं दिखाया जाएगा।

इस विचार का उद्देश्य एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करना है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत धर्म विरोधी है। भारतीय संविधान सभी धर्मों को बराबर सम्मान देता है और सभी धर्मों की बराबर रक्षा करता है।

सर्व धर्म सम भाव हिंदू धर्म की एक अवधारणा है जिसके अनुसार सभी धर्मों द्वारा अनुसरण किए जाने वाले मार्ग (रास्ते) भले ही अलग हो सकते हैं, लेकिन उनका लक्ष्य और नियत एक ही है। (सभी धर्म समान है)। इस अवधारणा को रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के अलावा महात्मा गांधी ने भी अपनाया था।


भारतीय संविधान (Indian Constitution) की आलोचना

1. भारतीय संविधान एक भीमकाय आकार का है। भारतीय संविधान में 395 अनुच्छेद हैं किंतु संशोधनों के द्वारा कई अनुच्छेदों को इसमें शामिल किया गया है जिन्हें मिलाकर अनुच्छेदों की संख्या 440 या उससे ऊपर है।

230 वर्षों में अमेरिकी संविधान में सिर्फ 29 बार ही संशोधन किए गए हैं जबकि 70 सालों में भारतीय संविधान में 100 से भी ज्यादा संशोधन किए जा चुके हैं।

2. उधार का संविधान मानने वाले आलोचकों का कहना है कि भारतीय संविधान में नया या मौलिक कुछ' भी नहीं है। वे इसे उधार का संविधान कहते हैं इसके पीछे तर्क यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, वायमर गणराज्य, सोवियत संघ आदि से कुछ-कुछ भाग ग्रहण किया गया है।

3. आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान अत्यंत विविधतापूर्ण और बहुत जटिल है जिसके कारण संविधान को नागरिकों द्वारा समझा नहीं जा सकता है।

4. आलोचकों का यह भी कहना है कि संविधान निर्माताओं ने बड़ी संख्या में भारत सरकार अधिनियम 1935 के प्रावधान भारत के संविधान में डाल दिए। जिससे संविधान 1935 की एक कामन कापी बनकर रह गया है।


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1.What do you understand by rule of law? Write a short note on its importance under the Indian Constitution.
कानून के शासन से आप क्या समझते है? भारतीय संविधान के तहत इसके महत्त्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

2.Introduce the Constitution of India.
भारत के संविधान का परिचय दीजिए।

3.Summarize the main features of the Indian Constitution and explain their importance.
भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं का सारांश कीजिए और उनका महत्व बताइए।

4.Give a detailed description of the Indian federal system.
भारतीय संघीय व्यवस्था का विस्तृत विवरण दीजिए।

5.Write a short note on secularism?
धर्मनिरपेक्षता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए?


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