राजनीति (Politics) का अर्थ
राजनीति को लेकर अलग-अलग लोगों के अलग-अलग विचार होते है जैसे:-विद्वानों के अनुसार:- राजनीति एक संभावित कला है जहां सब कुछ संभव है
नेताओं के अनुसार:- राजनीति एक प्रकार की समाज सेवा है
राजनीति से संबंधित कुछ लोगाे के अनुसार (पत्रकार):- राजनीति एक प्रकार का दावपपेंच या समझौते की कला है
जनता के अनुसार:- घोटाला, भ्रष्टाचार और सत्ता का खेल ही राजनीति है
"राजनीति" को अंग्रेजी में “Politics” कहते हैं और “Politics” शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द “Polis” से हुई है अंतः प्राचीन यूनान मे “Polis” का अर्थ नगर राज्य था और इन्हीं नगर राज्य मे लोगों द्वारा की गई गतिविधियों को “Politics” कहा जाता था
यूनानी विचारक अरस्तू ने अपने ग्रंथ का नाम "पॉलिटिक्स" रखा था जिसमें उन्होंने सबसे पहले राज्य और शासन संबंधी विषयों पर चर्चा की थी इसलिए अरस्तू को "राजनीति का जनक” भी कहा है
सरल शब्दों मे राजनीति:- राजनीति दो शब्दों से मिलकर बना है राज+नीति (राज मतलब शासन और नीति मतलब उचित कार्य करने की कला) अर्थात् राज्य (सरकार/शासन) द्वारा शासन करना ही राजनीति है।
राजनीति (Politics) की परिभाषाएं
प्लेटो और अरस्तू के अनुसार:- प्रत्येक वह चीज जिससे समाज प्रभावित होता है वह राजनीतिक हैचाणक्य के अनुसार:- राजनीति अर्थशास्त्र (भूमि, रक्षा, उन्नति आदि से संबंधित शिक्षा) है
गार्नर के अनुसार:- राजनीति शास्त्र राज्य से आरम्भ होता है तथा राज्य पर समाप्त होता है।"
गेटल के अनुसार:- राजनीति राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन है।"
राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) का अर्थ
सिद्धांत का अर्थ:- सिद्धान्त शब्द की उत्पत्ति यूनानी शब्द “थ्योरियो” से हई है। “थ्योरियो” का अर्थ है मनन की अवस्था या चिन्तन की स्थिति। अंतः जब हम किसी भी तथ्य (topic) को समझने के लिए उस तथ्य पर मनन (विचार) करते हैं तो उसे सिद्धान्त कहा जाता है।राजनीतिक सिद्धांत "राजनीति" से संबंधित सिद्धांत है और यह राजनीतिक मुद्दों से संबंधित ज्ञान है क्योंकि इसमे राजनीतिक मुद्दों से संबंधित अध्ययन किया जाता है
राजनीतिक सिद्धांत मे राजनीतिक मुद्दों की तलाश (पहचान) की जाती है, उन मुद्दों का विश्लेषण (जाच-पड़ताल) करके उन से संबंधित सिद्धांत (solution) का निर्माण किया जाता है
आधुनिक समय मे राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ “सत्ता के लिए संघर्ष की गतिविधियां” से संबंधित है
राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य:- प्लमनाज के अनुसार राजनीतिक शब्द का विश्लेषण और स्पष्टीकरण ( explain करना राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य है
राजनीतिक सिद्धांत एक प्राचीन विषय है परंतु इसमें समय-समय पर बदलाव हुए हैं क्योंकि अनेक विचारकों ने अलग-अलग समय पर अपने-अपने समाज की राजनीतिक समस्याओं का समाधान करने के लिए अलग-अलग विचार दिए हैं
राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) की परिभाषा
1. सेबाइन के अनुसार:- राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ उन सब बातों से है जो राजनीति से संबंधित है2. बल्हम के अनुसार:- राजनीतिक सिद्धांत राजनीति के विषय वस्तु (topics) की व्याख्या है और आदमी के लिए संसार को समझने की एक वैचारिक संरचना है
3. हैल्ड के अनुसार:- राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक जीवन की अवधारणाओं और सिद्धांतों का बना हुआ जाल है
4. एनडू हेकर के अनुसार:- राजनीतिक सिद्धांत एक तरफ अच्छे समाज और राज्य से संबन्धित नियमों की खोज करता है दूसरी तरफ ये राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकता का ज्ञान है
5. जार्ज कैटलीन के अनुसार:- राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विज्ञान और राजनीतिक दर्शनशास्त्र दोनों का मिश्रण है
राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) का अध्ययन क्यों करना चाहिए ?
भविष्य मे एक नवीन विचार के लिए:- राजनीतिक सिद्धांत के विषय में विश्व के प्रसिद्ध विचारक अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग विचार प्रकट करते हैं जिससे भविष्य में नवीन (नए) विचारों का समावेश होगाराज्यो और समाज का क्रमबद्ध अध्ययन के लिए:- राजनीतिक सिद्धांत में प्लेटो और अरस्तू के समय से लेकर वर्तमान समय तक बहुत राज्य और सामाजिक का अध्ययन किया गया है जिससे राज्य और समाज के क्रमबद्ध अध्ययन मे बहुत सहायता मिली है
सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों एवं कर्तव्य की जानकारी के लिए:- राजनीतिक सिद्धांत समाज के नागरिकों को उसके सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों एवं कर्तव्याे से भी जागरूक करवाता है क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत में हमें स्वतंत्रता, समानता, संपत्ति, न्याय और राज्य के बारे में वर्णन देखने को मिलता है
उच्च कोटि के बौद्धिक प्रयास हेतु:- राजनीतिक सिद्धांत में समय-समय पर बुद्धिजीवियों ने अपने बुद्धि और ज्ञान का इस्तेमाल करके बहुत सारी सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान किया है जिसके कारण समय के अनुसार यह बौद्धिक प्रयास बढ़ता जाता है
स्वतंत्रता, समानता, सम्पत्ति, न्याय आदि की जानकारी के लिए:- राजनीतिक सिद्धांत में हमें केवल राज्य या समाज के बारे में जानकारी देखने को नहीं मिलती बल्कि स्वतंत्रता, समानता, संपत्ति, न्याय आदि जैसे मुद्दों पर भी हमें जानकारी देखने को मिलती है
राजनीतिक तर्क का निर्माण और परीक्षण के लिए:- राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक मुद्दों का तार्किक वर्णन और परीक्षण किया जाता है
सामाजिक और आर्थिक समस्याओ के समाधान के लिए:- राजनीतिक सिद्धांत में आर्थिक और सामाजिक समस्याएं जैसे गरीबी, बेरोजगारी, हिंसा, भ्रष्टाचार आदि के समाधान का भी वर्णन किया जाता है जिन्हें अपना कर कोई भी समाज इन सारी समस्याओं से छुटकारा पा सकता है
संकल्पनाओ का स्पष्टीकरण के लिए:- राजनीतिक सिद्धांत में लोकतंत्र, समानता, न्याय, नारीवाद, पितृसत्तात्मकता, मार्क्सवाद, उदारवाद, पूंजीवाद आदि संकल्पनाओं का स्पष्ट वर्णन किया गया है जिससे कोई भी व्यक्ति राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन से इन संकल्पनाओ का स्पष्ट अर्थ समझ सकता है
उदारवाद (Liberalism) का अर्थ / उदारवादी विचारधारा
उदारवाद या लिबरलिज्म एक विचारधारा है। जो स्वतंत्रता और समानता को प्रोत्साहित करके एक ऐसे समाज की रचना करना चाहता है जिसमें सभी लोग स्वतंत्र हो, बाजार मांग और पूर्ति के अनुसार कार्य करें और सरकार केवल लोगों के अधिकारों की रक्षा करें।उदारवाद को अंग्रेजी मे 'लिबेरलिस्म' कहा जाता है। और इस 'लिबेरलिस्म' शब्द की उत्पति लैटिन भाषा के शब्द ‘लिबर’ से हुई है। जिसका अर्थ स्वतंत्रता है।
उदारवादियो के अनुसार मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है जिसे अपने हित और अहित के बारे में पता होता है इसलिए हमें सभी मनुष्यों को स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए
हॉब्स उदारवादी विचारधारा के प्रथम विचारक थे परंतु जॉन लॉक को उदारवादी विचारधारा का जनक माना जाता है।
हॉब्स के अनुसार जनता ने ही राज्य को चुना है अब राज्य जो चाहे वो करें परन्तु जनता राज्य का विरोध नहीं कर सकती है।
जॉन लॉक के अनुसार जनता राज्य को इसलिए चुनती है ताकि राज्य लोगों के प्राकृतिक अधिकारों (जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार) की रक्षा करेगा और यदि राज्य इन अधिकारों की रक्षा नहीं करता तो जनता को अधिकार है कि वह राज्य को हटा सके। अंतः इसलिए जॉन लोग को उदारवाद का जनक माना गया।
प्रमुख विचारक:- बैंन्थल, जॉन स्टूअर्ट मिल, हरबर्ट स्पेसर, जेफरसन, लिंन्डसे, बार्कर और मैकीवर
उदारवाद (Liberalism) की परिभाषा
सतोरी के अनुसार:- उदारवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता, न्यायिक रक्षा और संवैधानिक राज्य का सिद्धांत और व्यवहार है।कोर्नर के अनुसार:- उदारवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता, व्यक्तिगत मानवाधिकारों और व्यक्तिगत मानव खुशी के आदर्शों के साथ शुरू और समाप्त होता है।
जे एस मिल के अनुसार:- उदारवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विचार की स्वतंत्रता और सरकारी हस्तक्षेप का न होना आदि बातो को बढ़ावा देता है। इसलिए व्यक्ति को स्वतंत्रता होना चाहिए परंतु वह दूसरों की स्वतंत्रता को हानि न पहुचाए।
आदम स्मिथ के अनुसार:- दारवाद नि:शुल्क व्यापार बढ़ावा को देता है, जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता होती है और व्यापार में सरकारी हस्तक्षेप कम होता है।
जॉन रॉल्स के अनुसार:- उदारवाद न्याय के माध्यम से, समानता और मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। यह उस समाज को बनाने का प्रयास करता है जहाँ सभी को समान अवसर मिलते है।
उदारवाद (Liberalism) की विशेषताएं
1. व्यक्ति का महत्व:- जॉन लॉक के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था में व्यक्ति ही प्रमुख केंद्र है जिसके चारों और हर चीज घूमती है इसलिए यह सिद्धांत यह कहता है कि हर व्यक्ति को अपने विचारों, धर्म, और जीवन शैली की स्वतंत्रता होनी चाहिए।2. राज्य कृत्रिम (artificial) संस्था:- उदारवादी राज्य तथा समाज को कृत्रिम संस्थाएँ मानते हैं क्योंकि समाज में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से जो संघर्ष होता है उसे रोकने के लिए ही राज्य की सृष्टि हुई है और इन्ही मौलिक जरूरतो ने राज्य नामक संस्था को जन्म दिया है।
जॉन लॉक ने तो यहाँ तक कह दिया है कि यदि राज्य मनुष्यों के कल्याण के लिए कार्य नहीं करता तो वे राज्य का विरोद्ध कर सकते हैं।
3.विचार की स्वतंत्रता:- उदारवाद स्वतंत्र विचारधारा को प्रोत्साहित करता है, जो नई विचारों, सोच, और प्रेरणा को स्वागत करती है।
यह विचारधारा विभिन्न विचारों और धार्मिक विचारधाराओं को सहित खुले मन, एकता, और विविधता को प्रोत्साहन करती है।
4. व्यक्ति साध्य और राज्य साधन:- उदारवाद की एक मान्यता यह भी है कि व्यक्ति साध्य है तथा राज्य साधन है। क्योंकि व्यक्ति ने समाज, राज्य तथा अन्य संस्थाएँ निर्मित की हैं, ताकि ये संस्थाएँ उसके विकास में सहायता करे।
उदारवादियों के अनुसार समाज व राज्य कृत्रिम संस्थाएँ है। इन सब संस्थाओं का अस्तित्व ही व्यक्ति के लिए है। यदि राज्य व समाज व्यक्ति का विकास नहीं करते हैं तो इनके अस्तित्व का कोई महत्व नहीं है।
5. प्राकृतिक अधिकारों की मान्यता:- उदारवादी जॉन लॉक के अनुसार जीवन, सम्पत्ति तथा स्वतंत्रता व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार हैं। और राज्य का निर्माण इन अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है। और क्योंकि ये अधिकार व्यक्ति को राज्य या समाज द्वारा नहीं दिए गए है इसलिए राज्य को इन्हें कम करने का कोई अधिकार नहीं है।
6. राज्य का सीमित कार्य क्षेत्र:- उदारवादी विचारक व्यक्ति की स्वतंत्रता को महान मनते हैं। उनके अनुसार एक व्यक्ति अपने हित तथा अहित को अच्छी तरह समझता है। इसलिए व्यक्ति को अपना विकास करने के लिए उसकी इच्छानुसार अवसर मिलना चाहिए। और राज्य को व्यक्ति के कार्यों में कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए।
उदारवादी विचारको के अनुसार सर्वोतम सरकार वह है जो सबसे कम शासन करती है।
7. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था:- उदारवादियों के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ही सर्वोच्च अर्थव्यवस्था होती है क्योंकि उदारवादियों का मानना है कि अर्थव्यवस्था या बाजार मांग और उत्पादन पर निर्भर करने चाहिए ना कि किसी राज्य पर।
8.. लोकतंत्र:- उदारवादी तानाशाह शासन का विरोध करते हैं और लोकतंत्र शासन को सर्वोच्च मानते हैं क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ होता है लोगों का, लोगों के लिए और लोगों द्वारा किया गया शासन।
9. कल्याणकारी राज्य:- उदारवादियों के अनुसार राज्य को केवल लोगों के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए ना कि उनकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना चाहिए।
10. स्वतंत्र व्यापार:- उदारवाद स्वतंत्र व्यापार को बढ़ावा देता है जहां राज्य का काम से कम हस्तक्षेप होता है और इसमें व्यापार को स्वतंत्रता, प्रतिस्पर्धा, और नवाचार समर्थन किया जाता है।
उदारवाद के अनुसार वस्तुओं का मूल्य राज्य द्वारा निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि मांग और पूर्ति (demand and supply) पर निर्भर करना चाहिए
उदारवादी (Liberalism) विचारधारा की आलोचना
मार्क्सवादियो ने उदारवाद की कुछ कमियां को उजागर किया है:-1. शासन में उद्योगपति का बोलबाला:- मार्क्सवादीयों ने आलोचना करते हुए कहा है कि उदारवाद मे जनता के शासन जैसी कुछ चीज नहीं है क्योंकि सरकार में उद्योगपति का बोलबाला होता है जो लोकतंत्र शासन के विरुद्ध है।
2. विचार की स्वतंत्रता जैसी कोई चीज नहीं:- मार्क्सवादीयों ने आलोचना करते हुए कहा है कि उदारवाद मे प्रचार साधनों पर भी पूंजीपतियों का प्रभुत्व पाया जाता है इसलिए विचार की स्वतंत्रता जैसी कोई चीज नहीं है।
3. बंधुआ मजदूरी:- मार्क्सवादीयों ने आलोचना करते हुए कहा है कि उदारवाद ने समाज में स्वतंत्रता के खिलाफ काम किया है क्योंकि उद्योगपति श्रमिक से कम पैसों मे ज्यादा से ज्यादा काम लेने की कोशिश करता है और कई उद्योगो मे काम करने का अनुकूल वातावरण भी नहीं होता है।
4. रंगभेद की नीति:- मार्क्सवादीयों ने आलोचना करते हुए कहा है कि उदारवाद मे कई बार, रंग, जाति, धर्म आदि के आधार पर समाज में भेदभाव होता है जो उदारवाद के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है।
5. साम्राज्यवादी मूल्य:- अक्सर उदारवादी व्यवस्था ने साम्राज्यवादी मूल्यों को प्रचारित (Promoted) किया जाता है जैसे अल्पविकसित देशों का शोषण और आर्थिक विभाजन को बढ़ावा देना। जिसके कारण एक विकसित देश अल्पविकसित एवं विकासशील देशों का शोषण करता है।
6. भुखमरी और गरीबी:- उदारवादी समाज में भूखमरी और गरीबी की समस्या बनी रहती है, जिसमें समाज के कुछ वर्ग अत्याधुनिकता के लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाते है।
7. गरीब व श्रमिक लोगों का शोषण:- उदारवादी विचारधारा ने समाज में गरीब और श्रमिक वर्गों के शोषण को देखा है, जहां उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है।
मार्क्सवाद (Marxism) का अर्थ / मार्क्सवादी विचारधारा
1818 में जर्मनी में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ था जिन्होंने तत्कालीन आर्थिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करके यह बताने की कोशिश करी कि समाज में दो वर्ग होते हैं एक अमीर वर्ग और दूसरा गरीब वर्ग। अमीर वर्ग हमेशा से गरीब वर्ग का शोषण करते हुए आए हैं। इसलिए इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है। जिससे समाज मे उदारवाद, पूंजीवाद और निजीकरण समाप्त हो जाएगा और समाज वर्गविहीन हो जाएगा।
कार्ल मार्क्स ने उदारवादी विचारधारा की आलोचना करते हुए अपने विचार दिए है अंतः इन्हीं विचारों के आधार पर मार्क्सवाद का विकास हुआ है।
कार्ल मार्क्स के विचारों को आगे बढ़ाते हुए, फ्रेडरिक एंगेल्स, स्टालिन, लेनिन जैसे विचारकों ने मार्क्सवाद का समर्थन करते हुए समाजवाद और कम्युनिस्ट आंदोलनों का मार्गदर्शन किया है।
मार्क्सवाद (Marxism) के मूल सिद्धांत
द्वंदात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism)हेगेल के अनुसार समाज में समस्याओं का समाधान करने के लिए वार्तालाप किए जाते हैं जिससे नए विचारों का उदय होता है परंतु हम दोबारा उन नए विचारों वाद-विवाद करते हैं यह वार्तालाप और वाद-विवाद तब तक चलते रहते हैं जब तक कि समस्या का सही समाधान नहीं निकल जाता है
मनुष्य अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक अपने विचारों से घिरा होता है इसलिए समाज में संघर्ष का मुख्य कारण जड़ तत्व (बुद्धि) ही है
ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) / इतिहास की आर्थिक व्यवस्था का सिद्धांत
कार्ल मार्क्स के अनुसार :-
> आदिम युग:- आदिम युग में सभी लोग बराबर थे क्योंकि न कोई अमीर था और न ही कोई गरीब था और समाज राज्य विहीन था और जनसंख्या भी बहुत कम थी
> दासता का युग:- आदिम युग के बाद धीरे-धीरे मनुष्य में बुद्धि का विकास हुआ और जनसंख्या में वृद्धि होती गई जिसके कारण मनुष्य ने संसाधनों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया था
अब जिस मनुष्य ने संसाधनों को इकट्ठा कर लिया था वह मालिक बन गए और जो मनुष्य संसाधन को इकट्ठा नहीं कर पाए वह दास बन गए जिससे दासता का युग शुरू हुआ
इसी युग में ही राज्य का उदय हुआ था
> सामंतवादी युग:- संसाधनों को इकट्ठा करने की होड़ में कुछ मनुष्य ने जमीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था जिससे धीरे-धीरे सामंतवादी युग का विकास हुआ
इस युग में जमींदार और किसान वर्ग थे अंतः जमींदार अपनी जमीनों पर किसानों से मजदूरी करवा कर उनका शोषण करते थे
> पूंजीवादी युग:- सामंतवादी युग में फसल के अधिक उत्पादन के कारण लोगों ने अतिरिक्त उत्पादन का व्यापार करना शुरू कर दिया जिससे पूंजीवादी युग का विकास हुआ
पूंजीवादी युग में उद्योगपति अपनी पूंजी का निवेश करके मजदूर वर्ग से अतिरिक्त काम करवा कर उनका शोषण करते थे
> समाजवादी युग:- पूंजीपतियों के शोषण के कारण समाजवादी युग की शुरुआत हुई क्योंकि कार्ल मार्क्स मजदूरों को एक होकर विद्रोह करने की सलाह देते हैं और समाज में समानता लाने की बात कहते हैं जिससे समाजवाद का विकास हुआ
सर्वप्रथम समाजवादी क्रांति 1917 में रूस में हुई थी जिसके बाद सोवियत संघ में समाजवाद को अपनाया गया था इसके बाद चीन, वियतनाम, उत्तरी कोरिया, क्यूबा जैसे देशों ने भी समाजवाद को अपनाया गया था
> साम्यवादी समाज:- समाजवादी क्रांति से आदिम युग की तरह समय आ जाएगा जिसे साम्यवादी समाज बोला जाता है
साम्यवादी समाज आदिम युग की तरह वर्ग विहीन और राज्य विहीन होगा और सभी मनुष्य को संसाधन उसकी आवश्यकता के अनुसार मिलेंगे
अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत
कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी युग में उद्योगपति मजदूर वर्ग से कम पैसों में ज्यादा से ज्यादा काम लेने की कोशिश करते थे और अतिरिक्त समय कम करने पर उन मजदूरों को कोई भी वेतन नहीं दिया जाता था
इसलिए कार्ल मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत दिया जिसके अनुसार मजदूर वर्ग को अतिरिक्त कार्य के करने का अतिरिक्त मूल्य मिलना चाहिए
मार्क्स ने अपने इस सिद्धांत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धारण का आधार माना है
सर्वहारा क्रांति
पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगपतियों द्वारा मजदूर वर्ग या शोषित वर्ग (सर्वहारा वर्ग) बहुत शोषण किया जाता है इसलिए कार्ल मार्क्स इन सर्वहारा वर्ग को पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक होकर क्रांति करने की सलाह देते हैं
इस कांति में सर्वहारा वर्ग को उद्योगपतियों के सारे संसाधन हड़प लेने चाहिए और उन संसाधनों को समान रूप से विभाजित कर देना चाहिए ताकि समाज में समानता आ जाए
वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत
कार्ल मार्क्स के अनुसार प्राचीन इतिहास से ही मनुष्य दो वर्गों में विभाजित है एक शोषक वर्ग और दूसरा शोषित वर्ग प्राचीन इतिहास से अब तक शोषक वर्ग शोषित वर्ग का शोषण और दमन करते आए हैं
अंतः कार्ल मार्क्स वर्ग विहीन समाज की स्थापना करने के लिए शोषित वर्ग को एक साथ होकर क्रांति करने की सलाह देते हैं जिससे समाज में समानता स्थापित हो जाएगी
साम्यवाद
पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध सर्वहारा क्रांति के कारण समाजवाद की स्थापना होगी, इस समाजवादी व्यवस्था में सभी लोग सामान होंगे और राज्य समाज की भलाई के लिए कार्य करेगा
अंतः जब पूंजीवादी व्यवस्था पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगी तो राज्य की व्यवस्था भी समाप्त कर दी जाएगी और लोग स्वयं शासन करेंगे जिसे साम्यवाद कहा जाता है
अलगाव की अवधारणा
कार्ल मार्क्स ने 1844 में अपनी एक पुस्तक "economic and philosophic manuscripts" लिखी थी जिसमें कार्ल मार्क्स ने बताया कि मनुष्य चार प्रकार से अलगाव (अलग) हो गया है:-
1 उत्पादन:- आज मनुष्य उत्पादन से अलग हो गया है क्योंकि पूंजीपति लोग मजदूर वर्ग से इतना काम लेते हैं कि मनुष्य वास्तु के समान होता जा रहा है
2 सहकर्मी:- कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीपतियों ने स्थिति को कुछ इस प्रकार का बना दिया है कि मजदूर वर्ग काम के दबाव में आकर अपने सहकर्मियों से अलग होता जा रहा है
3 प्रकृति:- आदिम युग में मनुष्य प्रकृति से जुड़ा हुआ था और उसके सभी कार्यों में प्रकृति का अंश सम्मिलित था परंतु समय बीतने के अनुसार मनुष्य प्रकृति से पूरी तरह अलग होता जा रहा है
4 अपने आप से:- आजकल मनुष्य अपने विचाराे में अपने आप के बजाय अपने माता-पिता, बहन-भाई, सहकर्मी या मित्र के बारे में सोचता है
2. मार्क्सवादीयों का दृष्टिकोण है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा आवश्यक है कितुं हिसां किसी भी स्थिति में सवर्मान्य (सही) नही हो सकती है।
3. मार्क्सवादी श्रमिको की तानाशाही की बात करते है जो तानाशाही शासको का एक विकृत (बड़ा) रूप है।
4. मार्क्सवाद समाजवादी लोकतंत्र के प्रति आस्था व्यक्त करते है। परंतु वास्तव में यह तानाशाही व्यवस्था का ही दूसरा रूप है। क्योंकि इस व्यवस्था में कोई दूसरा राजनीतिक दल नही होता है।
5. मार्क्स ने अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धारण का आधार माना है जो त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि मूल्य निर्धारण के लिये मांग, समय, स्थान आदि ऐसे कारण है जो वस्तु के मूल्य निर्धारण को प्रभावित करते है।
6 रूस, चीन, पोलैंड, हंगरी, युगोस्लाविया तथा क्यूबा आदि मार्क्सवादी देशों में धार्मिक स्वतंत्रता है परंतु वास्तव में इन देशों की नीति धर्म प्रचार के विरुद्ध है
7. मैकाइवर के अनुसार राज्य का निर्माण शोषण के लिए नहीं किया गया था बल्कि कबीलों में न्याय की भावना को देखते हुए राज्य का निर्माण किया गया था
8.प्लेटो और अरस्तू के अनुसार यदि राज्य नहीं होगा तो समाज में अराजकता फैल जाएगी और समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति पैदा हो जाएगी
इसलिए कार्ल मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत दिया जिसके अनुसार मजदूर वर्ग को अतिरिक्त कार्य के करने का अतिरिक्त मूल्य मिलना चाहिए
मार्क्स ने अपने इस सिद्धांत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धारण का आधार माना है
सर्वहारा क्रांति
पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योगपतियों द्वारा मजदूर वर्ग या शोषित वर्ग (सर्वहारा वर्ग) बहुत शोषण किया जाता है इसलिए कार्ल मार्क्स इन सर्वहारा वर्ग को पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक होकर क्रांति करने की सलाह देते हैं
इस कांति में सर्वहारा वर्ग को उद्योगपतियों के सारे संसाधन हड़प लेने चाहिए और उन संसाधनों को समान रूप से विभाजित कर देना चाहिए ताकि समाज में समानता आ जाए
वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत
कार्ल मार्क्स के अनुसार प्राचीन इतिहास से ही मनुष्य दो वर्गों में विभाजित है एक शोषक वर्ग और दूसरा शोषित वर्ग प्राचीन इतिहास से अब तक शोषक वर्ग शोषित वर्ग का शोषण और दमन करते आए हैं
अंतः कार्ल मार्क्स वर्ग विहीन समाज की स्थापना करने के लिए शोषित वर्ग को एक साथ होकर क्रांति करने की सलाह देते हैं जिससे समाज में समानता स्थापित हो जाएगी
साम्यवाद
पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध सर्वहारा क्रांति के कारण समाजवाद की स्थापना होगी, इस समाजवादी व्यवस्था में सभी लोग सामान होंगे और राज्य समाज की भलाई के लिए कार्य करेगा
अंतः जब पूंजीवादी व्यवस्था पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगी तो राज्य की व्यवस्था भी समाप्त कर दी जाएगी और लोग स्वयं शासन करेंगे जिसे साम्यवाद कहा जाता है
अलगाव की अवधारणा
कार्ल मार्क्स ने 1844 में अपनी एक पुस्तक "economic and philosophic manuscripts" लिखी थी जिसमें कार्ल मार्क्स ने बताया कि मनुष्य चार प्रकार से अलगाव (अलग) हो गया है:-
1 उत्पादन:- आज मनुष्य उत्पादन से अलग हो गया है क्योंकि पूंजीपति लोग मजदूर वर्ग से इतना काम लेते हैं कि मनुष्य वास्तु के समान होता जा रहा है
2 सहकर्मी:- कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीपतियों ने स्थिति को कुछ इस प्रकार का बना दिया है कि मजदूर वर्ग काम के दबाव में आकर अपने सहकर्मियों से अलग होता जा रहा है
3 प्रकृति:- आदिम युग में मनुष्य प्रकृति से जुड़ा हुआ था और उसके सभी कार्यों में प्रकृति का अंश सम्मिलित था परंतु समय बीतने के अनुसार मनुष्य प्रकृति से पूरी तरह अलग होता जा रहा है
4 अपने आप से:- आजकल मनुष्य अपने विचाराे में अपने आप के बजाय अपने माता-पिता, बहन-भाई, सहकर्मी या मित्र के बारे में सोचता है
मार्क्सवाद (Marxism) की आलोचना
1. मार्क्सवाद एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जो वर्ग विहीन और राज्य विहीन हो | इसका व्यावहारिक हल मार्क्सवादी देशो के पास भी नही है। इसलिए कार्ल कॉपर, कार्ल मार्क्स के मार्क्सवादी विचारों को काल्पनिक बताते हैं2. मार्क्सवादीयों का दृष्टिकोण है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा आवश्यक है कितुं हिसां किसी भी स्थिति में सवर्मान्य (सही) नही हो सकती है।
3. मार्क्सवादी श्रमिको की तानाशाही की बात करते है जो तानाशाही शासको का एक विकृत (बड़ा) रूप है।
4. मार्क्सवाद समाजवादी लोकतंत्र के प्रति आस्था व्यक्त करते है। परंतु वास्तव में यह तानाशाही व्यवस्था का ही दूसरा रूप है। क्योंकि इस व्यवस्था में कोई दूसरा राजनीतिक दल नही होता है।
5. मार्क्स ने अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत में केवल श्रम को ही वस्तु के मूल्य निर्धारण का आधार माना है जो त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि मूल्य निर्धारण के लिये मांग, समय, स्थान आदि ऐसे कारण है जो वस्तु के मूल्य निर्धारण को प्रभावित करते है।
6 रूस, चीन, पोलैंड, हंगरी, युगोस्लाविया तथा क्यूबा आदि मार्क्सवादी देशों में धार्मिक स्वतंत्रता है परंतु वास्तव में इन देशों की नीति धर्म प्रचार के विरुद्ध है
7. मैकाइवर के अनुसार राज्य का निर्माण शोषण के लिए नहीं किया गया था बल्कि कबीलों में न्याय की भावना को देखते हुए राज्य का निर्माण किया गया था
8.प्लेटो और अरस्तू के अनुसार यदि राज्य नहीं होगा तो समाज में अराजकता फैल जाएगी और समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति पैदा हो जाएगी
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राजनीति क्या है ? राजनीति की उदारवादी और माक्सवादी समझ की विवेचना कीजिए ।
OR/अथवा
2.Why is the study of politics important? What is its important role in society?
राजनीति का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है? समाज में इसकी अहम भूमिका क्या है?
OR/अथवा
3.What is politics? Discuss with reference to theorizing the political.
राजनीति क्या है? रानजीति के सैद्धांतिकरण के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
OR/अथवा
4.What is the meaning of politics? What is the broader perspective of politics?
राजनीति का अर्थ क्या है? राजनीति का व्यापक परिप्रेक्ष्य कैसा है?
OR/अथवा
5.What is politics? Why do we study it?
राजनीति क्या है? हम इसका अध्ययन क्यों करते हैं?
OR/अथवा
6."Politics brings about conciliation of interests." Explain this statement in reference to the meaning and nature of politics.
राजनीति हितों के समन्वय की प्रक्रिया है। " इस कथन को राजनीति के अर्थ एवं प्रकृति के संदर्भ में समझाइये।
OR/अथवा
7.What are the liberal and Marxist traditions of politics? What is the difference in their basic principles?
राजनीति की उदारवादी और माक्सवादी परंपराएँ क्या हैं? उनके मूल सिद्धांतों में अंतर क्या है?
