संवैधानिक मूल्य (Constitutional Values): न्याय(Justice), स्वतंत्रता(Liberty), समानता (Equality) और बंधुत्व (Brotherhood)

संवैधानिक मूल्य (Constitutional Values): न्याय(Justice), स्वतंत्रता(Liberty), समानता (Equality) और बंधुत्व (Brotherhood)

न्याय की (Justice) अवधारणा

न्याय अवधारणा को परिभाषित करना सरल नहीं है। क्योंकि भिन्न-भिन्न दार्शनिकों द्वारा समय और परिस्थितियों के अनुसार न्याय की अलग-अलग अवधारणा दी है।

न्याय के लिए अंग्रेजी में 'जस्टिस' (Justice) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो लैटिन भाषा के शब्द 'जस्टिशिया' (Justitia - बांधना ) और जस (Jus-संबंध) से लिया गया है।

किसी व्यवस्था को बनाए रखना ही न्याय है अत: हम कह सकते हैं कि न्याय उस व्यवस्था का नाम है जो व्यक्तियों तथा समुदायों को एक सूत्र में बाँधती है।

न्याय किसी भी समाज के लिए अनिवार्य होता है, क्योंकि यदि न्याय व्यवस्था न हो तो समाज मे अव्यवस्था, असुरक्षा एवं जिसकी लाठी उसकी भैंस की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएगी।


न्याय (Justice) की परिभाषा

1.मेरियम के अनुसार:- न्याय वह प्रक्रिया है जिनके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को वे सभी अधिकार तथा सुविधाएँ प्राप्त होती हैं जिन्हें समाज उचित मानता है।

2.मिल के अनुसार:- न्याय उन नियमों का नाम है जो मानव-कल्याण से सम्बन्धित है

3.रफल के अनुसार:- न्याय उस व्यवस्था का नाम है जिसके द्वारा व्यक्तिगत अधिकार की रक्षा होती है और समाज की मर्यादा भी बनी रहती है।

4.बेन तथा पीटर्स के अनुसार:- न्याय का अर्थ यह है कि जब तक भेदभाव किए जाने का कोई उचित कारण न हो, तब तक सभी व्यक्तियों से एक जैसा व्यवहार किया जाये।

5.प्लेटो के अनुसार:- व्यक्तियो द्वारा अपने कर्तव्यों का उचित पालन और दूसरों के काम में दखल ना करना ही न्याय है।


न्याय (Justice) के प्रकार

1. सामाजिक न्याय:- समाज में सभी व्यक्तियों के साथ समान व्‍यवहार करना ही समाजिक न्याय है, जिसमें आस्था, जाति, पंथ, रंग, लिंग या स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है।

समाज के किसी भी वर्ग को विशेषाधिकारों नहीं देना और पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी और ओबीसी) और महिलाओं के सुधार के लिए प्रावधान करना ही समाजिक न्याय है।

कुछ लोगों का तर्क है कि प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक हिस्से का उचित हिस्सा वटना सामाजिक न्याय है। दूसरों का तर्क है कि कानून और न्याय के आधार पर सामाजिक लाभों और अधिकारों का समान वितरण करना ही सामाजिक न्याय है।


2. राजनीतिक न्याय:- सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अधिकार और प्रशासन में भाग लेने के समान अवसर प्रदान करना ही राजनीतिक न्याय है।

नागरिकों को धर्म, जाति, वर्ग, पंथ, लिंग, जन्म स्थान या सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर भेदभाव के बिना मतदान करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए।

सभी मतदाताओं और सार्वजनिक पद के उम्मीदवारों को समान अवसर दिए जाने चाहिए। सभी के पास राजनीतिक कार्यालयों तक समान पहुंच होनी चाहिए और सरकारी प्रक्रियाओं में समान भागीदारी होनी चाहिए।

कानून को लोकप्रिय भावनाओं और राज्य की इच्छाओं द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। क्योंकि कानून बनाते समय शासकों की इच्छा को शासितों की इच्छा पर थोपा नहीं जाना चाहिए।

राजनीतिक न्याय का अर्थ है कि सभी लोगों को राजनीतिक अवसरों में भाग लेने के लिए, बिना किसी भेदभाव के समान, स्वतंत्र और निष्पक्ष अधिकार है।


3. आर्थिक न्याय:- आर्थिक न्याय और सामाजिक न्याय आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।

आर्थिक न्याय के लिए आवश्यक है कि सभी व्यक्तियों को आजीविका कमाने और उचित वेतन पाने के उपयुक्त अवसर मिलें, जिससे वे अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हों और साथ ही उनके विकास और उन्नति में भी सहायता करें।

यदि व्यक्ति बीमार या बुजुर्ग हैं या काम करने में असमर्थ हैं तो सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस दौरान उन्हें वित्तीय सुरक्षा मिले।

व्यक्तियों के बीच उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। और किसी को भी उसकी आर्थिक स्थिति के कारण किसी भी अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।


स्वतंत्रता (Liberty) की अवधारणा

स्वतंत्रता शब्द का अर्थ है आजादी। और स्वतंत्रता को अंग्रेजी में Liberty कहते हैं। अंतः स्वतंत्रता शब्द लैटिन शब्द “लिबर” से लिया गया है, जिसका अर्थ है “अवरोधों से मुक्ती”।

स्वतंत्रता में प्रतिबंधों का अभाव होता है जिससे कोई व्यक्ति बिना किसी बाधा के अपनी इच्छा से कुछ भी कर सकता है। परंतु स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी स्वतंत्रता के लिए दूसरे की स्वतंत्रता का हनन करे।

स्वतंत्रता का अर्थ जीवन में गैर-हस्तक्षेप भी है।

जैसे :- बोलने की स्वतंत्रता, घूमने-फिरने की स्वतंत्रता, मनपसंद कार्य करने की स्वतंत्रता, किसी भी धर्म को मानने और पसंद के धर्म का प्रचार फैलाने की स्वतंत्रता इत्यादि।


स्वतंत्रता (Liberty) की परिभाषा

1.हॉब्स के अनुसार:- बाहरी बाधाओं की अनुपस्थिति, जो बाधाएँ मनुष्य की किसी भी कार्य को करने की शक्ति को कम करती हैं।

2.हेगेल के अनुसार:- स्वतंत्रता कानून का पालन होता है।

3.रूसो के अनुसार:- स्वतंत्रता में सामान्य इच्छाशक्ति का पालन होता है।

4.जे. एस. मिल के अनुसार:- स्वतंत्रता एकमात्र साधन है जिसके तहत व्यक्ति अपने भले के लिए अपने तरीके से सब कुछ कर सकता है।

5.लास्की के अनुसार:- स्वतंत्रता “प्रतिबंध की अनुपस्थिति” है जो व्यक्तिगत खुशी की एक गारंटी है।


भारतीय संविधान मे स्वतंत्रता (Liberty) का अधिकार (अनुच्छेद 19, 20, 21 और 22)

> 6 अधिकारों का संरक्षण:

अनुच्छेद 19 सभी नागरिकों को स्वतंत्रता के छह अधिकारों की गारंटी देता है:-

1. वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:- यह प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दर्शाने, मत देने, विश्वास एवं अभियोग लगाने की मौखिक, लिखित, छपे हुए मामलों पर स्वतंत्रता देता है।

2. शांतिपूर्वक सम्मेलन में भाग लेने की स्वतंत्रता:- किसी भी नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक संगठित होने का अधिकार है। इसमें बैठकों में भाग लेने एवं प्रदर्शन शामिल होने का अधिकार भी है। अंतः यह स्वतंत्रता हिंसा, अव्यवस्था, गलत संगठन एवं सार्वजनिक शांति भंग करने के लिये नहीं है।

3. संघ बनाने का अधिकार:- इसमें राजनीतिक दल बनाने का अधिकार, कंपनी, साझा फर्म, समितियाँ, क्लब, संगठन, व्यापार संगठन या लोगों की अन्य इकाई बनाने का अधिकार शामिल है।

4. संचरण की स्वतंत्रता का अधिकार:- संचरण की स्वतंत्रता के दो भाग हैं- आंतरिक (देश में संचरण, अनुच्छेद 19) और बाहरी (देश के बाहर घूमने का अधिकार तथा देश में वापस आने का अधिकार, अनुच्छेद 21)।

5. निवास का अधिकार:- नागरिकों को देश मे कही भी निवास करने की स्वतंत्रता है परंतु जनजातीय क्षेत्रों में उनकी संस्कृति एवं रिवाज के आधार पर बाहर के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है।

6. व्यवसाय की स्वतंत्रता का अधिकार:- नागरिकों को कोई भी कार्य करने का अधिकार है परंतु इसमें कोई अनैतिक कार्य शामिल नहीं है जैसे- महिलाओं या बच्चों का दुरुपयोग या खतरनाक व्यवसाय।


> अपराध के लिए दोषसिद्धि में संरक्षण:

अनुच्छेद 20 दोषी व्यक्ति को अतिरिक्त दंड से संरक्षण प्रदान करता है। चाहे वह देश का नागरिक हो या विदेशी। इसमें तीन व्यवस्थाएँ की गई हैं:-

1. व्यक्ति को अपराध तब तक दोषी नहीं ठहराया जाएगा, जब तक वह किसी कानून का उल्लंघन नही करता है।
2. व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जाएगा।
3. अपराध के लिए व्यक्ति को अपने विरुद्ध साक्षी (Witness) होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।


> प्राण एवं दैहिक (शारीरिक) स्वतंत्रता:

अनुच्छेद 21 के अनुसार व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से कानून द्वारा प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिए है।


> शिक्षा का अधिकार:

अनुच्छेद 21(A) के अनुसार राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क (free) शिक्षा कराएगा।

यह प्रावधान 86वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत किया गया था। 86वें संशोधन से पहले भी संविधान में भाग IV के अनुच्छेद 45 के तहत बच्चों के लिये निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान था। अंतः यह प्रावधान केवल आवश्यक शिक्षा के मौलिक अधिकार मे आता है।


> गिरफ्तारी से संरक्षण:

अनुच्छेद 22 किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान करता है। गिरफ्तारी दो तरह की होती है:-

1. दंड विषयक गिरफ्तारी, एक व्यक्ति, जिसने अपराध स्वीकार कर लिया है और न्यायालय में उसे दोषी ठहराया जा चुका है, को दंड देती है।

2. निवारक गिरफ्तारी वह है, जिसमें बिना सुनवाई के न्यायालय में दोषी ठहराया जाए।

अनुच्छेद 22 भाग 1 साधारण कानून से संबंधित है:-
  • गिरफ्तार करने पर सूचना देने का अधिकार।
  • विधि व्यवसायी से परामर्श और प्रतिरक्षा करने का अधिकार।
  • दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) के सामने 24 घंटे के अंदर (यात्रा के समय को मिलाकर) पेश होने का अधिकार।
  • दंडाधिकारी द्वारा बिना अतिरिक्त गिरफ्तारी के 24 घंटे में रिहा करने का अधिकार।
अनुच्छेद 22 भाग 2 निवारक गिरफ्तारी से संबंधित है। इस अनुच्छेद में नागरिक एवं विदेशी के लिए सुरक्षा उपलब्ध है:-
  • किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की अवधि तीन महीने से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती, जब तक उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश इस बारे में कारण न बताएँ।
  • गिरफ्तारी का आधार व्यक्ति को बताया जाना चाहिये।
  • गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि गिरफ्तारी के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करें।

समानता (Equality) की अवधारणा

मौलिक अधिकार का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग- III में 12 से 35 अनुच्छेद में मिलता है और समानता के अधिकार का वर्णन अनुच्छेद 14 से 18 के बीच देखने को मिलता है

समानता का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है। और यह अधिकार नागरिकों को अलग-अलग क्षेत्रों में समानता का लाभ देता है। अंतः इसका उद्देश्य समाज में समानता, न्याय और सभी नागरिकों के विकास को बढ़ावा देना है।

समानता का अधिकार किसी भी व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म, जन्मस्थान, लिंग आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए समानता का अधिकार सभी नागरिकों को संविधानिक सुरक्षा और समानता की गारंटी देता है।



भारतीय संविधान मे समानता (Equality) के अधिकार

> विधि (कानून) के समक्ष समता:

अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि भारत के किसी क्षेत्र मे व्यक्ति को विधि (कानून) मे समानता से वंचित नहीं किया जाएगा। वह देश का नागरिक हो या विदेशी सब पर यह अधिकार लागू होता है।

इसके अतिरिक्त इसमे संवैधानिक निगम, कंपनियाँ, पंजीकृत समितियाँ या किसी भी अन्य प्रकार का समूह सम्मिलित है।

अपवाद: अनुच्छेद 361 के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पद अवधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्यवाही चालू नहीं की जा सकती है।

अनुच्छेद 361-A के अनुसार, कोई भी व्यक्ति यदि संसद या राज्य विधानसभा दोनों की सत्य कार्यवाही से संबंधित समाचार-पत्र प्रकाशन करता है तो उस पर किसी भी प्रकार का मुकदमा देश के किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकता है।

अनुच्छेद 105 के अनुसार, संसद या उसकी समिति में किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या मत के विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।

अनुच्छेद 194 के अनुसार, विधानमंडल या उसकी समिति में किसी सदस्य द्वारा कही गई बात या मत के विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।

विदेशी शासक, राजदूत एवं कूटनीतिज्ञ आदि मुकदमों से मुक्त होंगे।


> भेदभाव पर रोक:

अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य द्वारा किसी नागरिक के प्रति धर्म, वंश, जाति, लिंग या स्थान को लेकर भेदभाव नहीं किया जाएगा।

अपवाद: महिलाओं, बच्चों, पिछड़े लोगों या अनुसूचित जाति या जनजाति के विकास (जैसे- आरक्षण और मुफ्त शिक्षा तक पहुँच) के लिये कुछ प्रावधान किये जा सकते हैं।


> सार्वजनिक विषय में अवसर की समानता:

अनुच्छेद 16 के अनुसार, राज्य के किसी पद के लिए सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।

अपवाद: राज्य आरक्षण का प्रावधान करता है या पद को पिछड़े वर्ग के लिए बना सकता है जिसका समान प्रतिनिधित्व नहीं है।

इसके अतिरिक्त किसी संस्था या इसके कार्यकारी परिषद के सदस्य या किसी भी धार्मिक आधार पर व्यवस्था की जा सकती है।


> अस्पृश्यता का अंत:

अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता निषेध (ban) है। और अस्पृश्यता के अपराध मे व्यक्ति को संसद या विधानसभा के चुनाव के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है।

अपराध निम्नलिखित हैं:-
  • अस्पृश्यता का प्रचार करना।
  • व्यक्ति को किसी भी दुकान, होटल, सार्वजनिक पूजा स्थल और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान में प्रवेश करने से रोकना।
  • अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों या छात्रावासों में प्रवेश से रोकना।
  • अस्पृश्यता को उचित (सही) ठहराना।
  • अनुसूचित जाति का अपमान करना।

> उपाधियों का अंत:

अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत करता है और इस संबंध में चार प्रावधान करता है:-

  • राज्य सेना या शिक्षा संबंधी सम्मान के अलावा और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
  • भारत का कोई नागरिक विदेशी उपाधि प्राप्त नहीं करेगा।
  • कोई विदेशी, राज्य के किसी पद को धारण करने वाला विदेशी राज्य से कोई भी उपाधि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता है।
  • राज्य के पद धारण करने वाला व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से कोई भेंट, उपलब्धि या पद आदि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता है।


बंधुत्व (Brotherhood) की अवधारणा

बंधुत्व का अर्थ है- भाईचारे की भावना। इसलिए सभी नागरिकों को एक ही परिवार की तरह कार्य करना चाहिए। और किसी भी नागरिक के साथ अनादर का व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।

डॉ भीमराव आंबेडकर के अनुसार बंधुत्व सभी भारतीयों के बीच भाईचारे की भावना है और बंधुत्व के बिना समानता और स्वतंत्रता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है

प्रत्येक राज्य राष्ट्रीय एकता प्राप्त करने का प्रयास करता है। इसे लोगों की गरिमा को बनाए रखने और भाईचारे के माध्यम से पूरा किया जा सकता है।

भारतीयों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए संविधान की प्रस्तावना मे "अखंडता" शब्द को 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था।

भारत को संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को “राज्यों के संघ” के रूप में वर्णित किया गया है अंतः यह स्पष्ट करता है कि राज्यों के पास संघ से अलग होने की कोई शक्ति नहीं है

राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को मजबूत करने तथा बन्धुत्व की भावना विकसित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 29 एवं 30 में अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार दिये गये हैं।

यह अनुच्छेद 29 प्रबंधित संस्थानों में धर्म, जाति, लिंग, भाषा के आधार पर प्रवेश से संबंधित है। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक समुदाय को शैक्षणिक संस्थान का प्रबंधन और प्रशासन करने का अधिकार है

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32):- यह सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है क्योंकि यह नागरिकों को भाग III द्वारा अधिकारों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार प्रदान करता है।

उपरोक्त संवैधानिक मूल्यों को प्राप्त करने के लिए राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत के रूप में कई प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख किया गया है:-


राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व (DPSP)

भारतीय संविधान में राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व आयरलैंड गणराज्य के संविधान से लिए गए हैं जिन्हें भारतीय संविधान के भाग IV (अनुच्छेद 36-51) में रखा गया है

यदि मौलिक अधिकारों को लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है तो नीति-निर्देशक तत्त्वों को सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के रूप में देखा जाता है जो गरीबों एवं नीचे तबके के उत्थान के लिए आवश्यक है।

मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्त्वों को एक-दूसरे के पूरक बताया है न कि विरोधात्मक। इसलिए न्यायालय में नीति-निर्देशक तत्त्वों को चुनौती नहीं दी जा सकती है

नीति-निर्देशक तत्त्वों का वर्गीकरण: नीति-निर्देशक तत्त्वों को उनके वैचारिक और उद्देश्यों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।:-

1. समाजवादी सिद्धांत पर आधारित
2. गांधीवादी सिद्धांत पर आधारित
3. उदार और बौद्धिक सिद्धांत पर आधारित

> समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित निर्देश:

अनुच्छेद 38: राज्य न्याय, आय, स्थिति, सुविधा तथा अवसरों में समानताओं को सुनिश्चित करके लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 39: राज्य विशेष रूप से निम्नलिखित नीतियों को सुरक्षित करने में कार्य करेगा:-
  • सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध कराना।
  • संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण को जनता की भलाई के लिए व्यवस्थित करना।
  • कुछ ही व्यक्तियों के पास धन को संकेंद्रित होने से बचाना।
  • पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान कार्य के लिये समान वेतन दिलवाना।
  • श्रमिकों की शक्ति और स्वास्थ्य की सुरक्षा करना।
  • बच्चों के बचपन एवं युवाओं का शोषण न होने देना ।
अनुच्छेद 41: बेरोज़गारी, बुढ़ापा, बीमारी और विकलांगता में कार्य करने, शिक्षा पाने और सार्वजनिक सहायता पाने का अधिकार सुरक्षित करना।

अनुच्छेद 42: राज्य काम की न्यायसंगत परिस्थितियों को सुनिश्चित करने एवं मातृत्व राहत के लिए प्रावधान करेगा।

अनुच्छेद 43: राज्य सभी कामगारों के लिए निर्वाह योग्य मज़दूरी और एक उचित जीवन स्तर सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 43A:
राज्य उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगा।

अनुच्छेद 47: लोगों के पोषण और जीवन स्तर को ऊपर उठाना तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करना।


> गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित निर्देश:

अनुच्छेद 40: राज्य पंचायतों को स्वशासन की इकाइयों के रूप में संगठित करने के लिए कदम उठाएगा।

अनुच्छेद 43:
राज्य ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 43B:
राज्य सहकारी समितियों के गठन, कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देगा।

अनुच्छेद 46: राज्य कमज़ोर वर्गों, अनुसूचित जातियों (sc), अनुसूचित जनजातियों (st) और अन्य कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा।

अनुच्छेद 47: राज्य सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए कदम उठाएगा और हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगाएगा।

अनुच्छेद 48: राज्य गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाने तथा मवेशियों को पालने एवं उनकी नस्लों में सुधार करने के लिए प्रयास करेगा।


> उदार-बौद्धिक सिद्धांतों पर आधारित निर्देश:

अनुच्छेद 44:
नागरिकों के लिए एक समान संहिता (कानून) को सुरक्षित करने का प्रयास करना।

अनुच्छेद 45: सभी बच्चों को छह वर्ष की आयु पूरी करने तक देखभाल और शिक्षा प्रदान करना।

अनुच्छेद 48: कृषि और पशुपालन को आधुनिक एवं वैज्ञानिक आधार पर संगठित करना।

अनुच्छेद 48A:
पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना तथा वनों एवं वन्यजीवों की रक्षा करना।

अनुच्छेद 49:
राज्य की कलात्मक या ऐतिहासिक महत्त्व के स्मारक या स्थान की रक्षा करना।

अनुच्छेद 50: लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए कदम उठाना।

अनुच्छेद 51: राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा स्थापित करने का प्रयास करेगा:-
  • राष्ट्रों के साथ न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखेगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधि के लिए सम्मान को बढ़ावा देगा।
  • मध्यस्थता द्वारा अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निपटान करना।

Related Questions

1.What is freedom? Give a detailed account of the right to freedom under the Indian Constitution.
स्वतंत्रता क्या है? भारतीय संविधान के तहत स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तृत विवरण दीजिए।

2.What do you understand about constitutional values ​​of India?
भारत के संवैधानिक मूल्य से आप क्या समझते हैं?

3.Analyze political justice, social justice and economic justice under the Constitution of India.
भारत के संविधान के तहत राजनीतिक न्याय, सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय का विश्लेषण करे।

4.What do you understand by equality before law? How do they ensure justice in society?
कानून के समक्ष समानता से आप क्या समझते है? ये कैसे समाज में न्याय को सुनिश्चित करता हैं?


Full Explanation Video On Youtube (Shrivastav Classes)


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.