नारीवाद (Feminism) का अर्थ, परिभाषाएं, विशेषताएं , ऐतिहासिक विकास, चुनौतियाँ, प्रकार, भारत में नारीवाद

नारीवाद (Feminism) का अर्थ, परिभाषाएं, विशेषताएं , ऐतिहासिक विकास, चुनौतियाँ, प्रकार, भारत में नारीवाद

नारीवाद (Feminism) का अर्थ और ऐतिहासिक विकास

नारीवाद एक नारी संबंधी विचारधारा है जो समाज में उसकी असमानता और पिछड़ेपन पर ना सिर्फ प्रश्न उठाता है, बल्कि उसको बदलने की कोशिश भी करता है।

यह एक ऐसा सिद्धांत भी है, जो सभी क्षेत्रों में लैंगिक समानता की बात करता है। ईसका उद्देश्य ही है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था मे पुरुष प्रभुत्व को समाप्त किया जाए और महिलाओं को बढ़ावा दिया जाए (विक्टोरिया ब्राऊन, 2019)।

1405 मे इटली की “क्रिस्टीन द पिसान” ने अपनी पुस्तक "बुक ऑफ द सिटी ऑफ लेडीज़' में महिलाओं के अधिकारों का वर्णन किया था। फिर इंग्लैंड, फ्रांस व जर्मनी के द्वारा नारीत्व विचारों को अधिक तीव्र किया गया।

विक्टोरिया ब्राऊन (2019 ) जो कि नारीवाद के ऐतिहासिक विकास को जाँचती हैं, उनका मानना है कि मैरी वॉल्सटॉनक्राफ्ट (Mary Wollstonecraft) को नारीवाद की जननी माना जाता है। क्योंकि आधुनिक नारीवाद पर पहली पुस्तक मेरी वॉलस्टोनक्रास्ट ने "विन्डीकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमैन" लिखी इसमें फ्रांस की क्रांति के बारे में लिखा है।

विक्टोरिया ब्राऊन बताती हैं कि नारीवाद का इतिहास काफी पुराना है इसकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी, जब संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 1848 में प्रसिद्ध "सेनेका फाल्स" सम्मेलन हुआ था जिसमे सर्वप्रथम महिलाओं के लिए राइट टू वोट (मताधिकार) की बात की थी इसी को नारीवादी आंदोलन की पहली लहर माना जाता है।

इसकी दूसरी लहर 1960 और 1970 के दशकों में यूरोप और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में स्त्री स्वतंत्रता आंदोलनों के रूप में आई। इसके बाद नारी के बारे में विचार एक चिंगारी की तरह पूरे विश्व में फैल गया।

भारत में नारीवाद पर विचार “समाज सुधारक आन्दोलन” से शुरू हुए, जिसने सती प्रथा, बाल विवाह जैसे कार्यों की बुराई की।

सर्वप्रथम फ्रांसीसी नारियों ने यह माँग की कि 'जब तक महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं होगा तब तक लिंग आधारित भेदभाव रहेगा'।

1893 में न्यूजीलैण्ड में सर्व प्रथम महिलाओं को चुनाव में वोट डालने का अधिकार प्राप्त हुआ। और 1903 में एमीलिन पंकहर्स्टन ने यूनाइटेड किंगडम (UK) में नारियों के समाजिक व राजनीतिक दल की शुरूआत की थी।


सेक्स और जेंडर से समाज विभाजन

नारीवाद को समझने के लिए यह जान लेना जरूरी है कि सेक्स और जेंडर एक नहीं हैं, बल्कि दोनों अलग-अलग है। क्योंकि सेक्स को जैविक अर्थ में समझ सकते हैं, और जेंडर को सामाजिक अर्थ में समझ सकते हैं।

इसमें एक तरीका तो प्राकृतिक है, जबकि दूसरा मानव निर्मित।

पुरुष प्रधान व्यवस्था जैविक तरीके का भी इस्तेमाल अपने वर्चस्व को बढ़ावा देने के लिए करता है। इसके द्वारा ही पुरुष अपनी इस चालाकी से दुनिया का मालिक बना हुआ है और औरत उसकी नौकर।

निवेदिता मेनन का भी मानना है कि जैविक निर्धारण सदियों से महिलाओं के दमन का सबसे बड़ा यन्त्र बना हुआ है। क्योंकि इस प्रकार के निर्धारण ने ही महिलाओं को हीन स्थिति में पहुँचाया है।

इसको और बढ़िया से जानने के लिए Simone De Beauvior (सिमोन दी बुआ ) की रचना The Second Sex (1949) से उस कथन को जाँचना होगा जिसमें वह कहती हैं कि “कोई औरत पैदा नहीं होती, बल्कि औरत बन जाती है” (One is not born but, rather becomes a woman ) |

औरत समाज द्वारा बनाई जाती है क्योंकि जन्म से ही लड़की और लड़के की परवरिश में अंतर रखा जाता है हम देख सकते हैं कि लड़का और लड़की के लिए खिलौने, कपड़े, रंगों से लेकर उनके व्यवहार तक को भी अलग तरह से निर्धारित किया जाता है।

उदाहरण के तौर पर लड़कियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि वह इधर- उधर नहीं घूमती दिन दलने पर बाहर नहीं निकलती, जबकि लड़कों को सिखाया जाता है कि लड़के रोते नहीं हैं, लड़के किसी से डरते नहीं हैं।

लड़के को निडर और लड़की को नाजुक बनाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि दोनों मैं अंतर बना रहे और दोनों के दायरों को अलग किया जा सके। जहाँ एक लड़के का दायरा बृहद होता है, वही एक लड़की का दायरा बस घर तक सीमित होता है।

पुरुष प्रधानता को बनाए रखने के पीछे जेंडर निधार्रण भी अहम भूमिका निभाती है। कुछ मामलों में सेक्स आधारित अंतर का प्रयोग करके समाज में जेंडर आधारित अंतरों का निर्माण किया और उसके अनुसार सामाजिक भूमिका तय की है।

उदाहरण के लिए बच्चे को जन्म देना, उसका स्तनपान कराना सेक्स आधारित अंतर है जो एक महिला करा सकती है, पुरुष नहीं। जबकि बच्चे का ख्याल रखना उसको पालना उसका पोषण करना जेंडर आधारित अंतर है, जो एक पुरुष भी कर सकता है लेकिन जेंडर की भूमिका के तहत यह काम महिलाओं पर थोपा गया है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जेंडर आधारित अंतर समाज द्वारा थोपे जाते हैं। मानव किसी भी प्राकृतिक नियम को तो नहीं बदल सकता लेकिन उन नियमों को जरूर बदल सकता है, जो खुद उसने समाज में रहकर बनाए हों या संस्कृति के नाम पर बनाए हों। इसीलिए नारीवादी हमेशा जेंडर की आलोचना करते हैं। क्योंकि यही सब कारण है जो महिलाओं को अधीनता की स्थिति में रखते हैं।

सिमोन दी बुआ का मानना है जेंडर समाज निर्मित है इसलिए इसे खत्म किया जाना चाहिए। जबकि नैंसी फ्रेसर भी जेंडर के विनिर्माण की बात करती हैं।


नारीवाद (Feminism) के प्रकार

1. उदारवादी नारीवाद

उदार नारीवाद, नारीवाद से जुड़ी आरंभिक विचारधारा है यह विचारधारा क्रांति के जगह क्रमिक (step by step) और कानूनी सुधार को अच्छा मानती है। और इससे जुड़े विचारक समानता का समर्थन करते हैं।

उदारवादी नारीवाद का मुख्य विचार यह है कि सब मनुष्य ईश्वर द्वारा एक समान बनाए गए है । इसलिए उदारवादी नारीवादी लोगो ने महिलाओं और पुरुषों की समानता पर जोर दिया है।

उनके अनुसार महिलाओं के शोषण का मुख्य कारण सामाजिक तौर-तरीके हैं जो पुरुषों द्वारा निर्मित और पुरुषों के फायदे के लिए हैं।

उदारवादी नारीवादियों के अनुसार महिलाओं और पुरुषों में एक समान क्षमता होती है इसलिए उन्हें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में समान अवसर दिये जाने चाहिए।

समाज द्वारा हमेशा उनके कंधों पर अतिरिक्त बोझ डालकर उनकी क्षमता को कम किया गया और महिलाओं को अपने निर्णय लेने की इजाजत नहीं थी। वे दूसरों के निर्देशों पर चलती रही।

उदारवादी नारीवादियों ने महिलाओं के समान अधिकारों की मांग की। अंतः इनके प्रयासों द्वारा ही महिलाओं को मताधिकार मिला।

मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट, जे. एस. मिल, बेट्टी फ्रीडन, कैरोल पेटमैन प्रमुख उदारवादी नारीवादी विचारक हैं।


2. समाजवादी / मार्क्सवादी नारीवाद

मार्क्स और एंगेल्स ने अपने शुरुआती वर्षों में महिलाओं के प्रश्न पर बहुत कम बात की है। क्योंकि मार्क्स को यह लगता था कि समाजवाद मे महिलाएँ स्वतंत्र होंगी।

एंगेल्स ने मार्क्स के इन विचारों का विकास अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'द ओरिजन ऑफ द फैमिली प्राइवेट प्रॉपटी एण्ड द स्टेट' (1884) में किया।

अपनी इस पुस्तक में एंगेल्स यह चित्रण करते है कि महिलाओं को शारीरिक और लैंगिक श्रम, संतान उत्पति, परिवार और निजी सम्पत्ति की देखभाल के लिए सही माना जाता है। हाँलाकि उनका दमन प्राकृतिक रूप से नहीं है बल्कि पितृसत्ता के कारण होता है।

निजी सम्पत्ति के उदय और पुरुषों के हाथ में सम्पत्ति ने महिलाओं की पहचान को अंधेरे में धकेल दिया है।

समाजवादी / मार्क्सवादी नारीवाद यह सोचते हैं कि पूंजीवाद महिलाओं के उत्पीड़न का मूल कारण है। इसलिए वे महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को खात्म करने के लिए आंदोलन की बात करते हैं।

इस विचारधारा को मानने वाले मानते है कि स्त्रियों की समस्या राजनीतिक और कानूनी रूप से समाप्त नहीं हो सकती है। उनके अनुसार स्त्री-पुरुष की असमानता का मूल कारण सामाजिक-आर्थिक संरचना है जो एक सामाजिक क्रांति के द्वारा ही समाप्त की जा सकती है।

समाजवादी / मार्क्सवादी नारीवाद जीववैज्ञानिक नियम, पुरुष-प्रधान समाज और पूंजीवादी व्यवस्था को स्त्रियों के शोषण का कारण मानते हैं। अतः लिंगीय भेदभावों को समाप्त करने से पहले इसके प्रति जागरूकता लाने की जरूरत है। क्योंकि जब तक समाज का प्रत्येक वर्ग और व्यक्ति लिंगीय भेदभाव को समाप्त करने आगे नहीं आएगा तब तक भेदभाव रहेगा।

इस विचारधारा के प्रमुख विचारक चार्ल्स फ्यूरिए, फ्रेडरिक एंगेल्स और शीला रोबाथम हैं।

फ्रेडरिक एंगेल्स का मानना है कि स्त्रियों का दमन परिवार से आरंभ होता है क्योंकि परिवार की संरचना पितृसत्तात्मक होती है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपनी पुस्तक में यह तर्क दिया है कि समाजवाद के आने से निजी संपत्ति का अंत हो जाएगा जिससे स्त्रियों को घर के कार्य से मुक्ति मिल जाएगी और समानता स्थापित होगी।

3. कट्टरपंथी नारीवाद

कट्टरपंथी नारीवाद, जिसे संक्षिप्त रूप मे "रेडफेम" भी कहा जाता है और इसे “आमूलपरिवर्तनवादी” नारिवाद के नाम से भी जाना जाता है

इस विचारधारा की शुरुआत मुख्य रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई है। यह विचारधारा सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन की मांग करती है। जिसमें सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पुरुष वर्चस्व समाप्त हो जाता है

यह विचारधारा निजी जीवन में महिला की समानता का समर्थक करती है। और यह समाज को एक पितृसत्ता के रूप में देखते हैं जिसमें पुरुष महिलाओं पर हावी होते हैं और उन पर अत्याचार करते हैं।

कट्टरपंथी नारीवादी सामाज मे महिलाओं को मुक्त करने के लिए संघर्ष द्वारा पितृसत्ता को खत्म करना चाहते हैं। साथ ही साथ इस संघर्ष के द्वारा महिलाओं के यौन वस्तुकरण, बलात्कार और अन्य हिंसा जैसे मुद्दों को चुनोती देना चाहते है

कट्टरपंथी नारीवादियों का मानना ​​है कि पुरुष महिलाओं को दबाने के लिए सामाजिक व्यवस्था और नियंत्रण के अन्य तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।

इस विचारधारा के प्रमुख विचारक सिमोन द बुआ , शुलामिथ फायरस्टोन, केट मिलेट, वर्जीनिया वूल्फ, एलस्टीन, आयरिश मेरियम यंग हैं।

फ्रांसीसी नारीवादी लेखिका सिमोन द बुआ ने अपनी पुस्तक ‛द सेकंड सेक्स’ (1949) में कहा कि,“ स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि उसे ऐसा बना दिया जाता है”(“ A woman is not born but made”)

सिमोन ने कहा कि पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को ‛द्वितीय लिंग’ का दर्जा दिया जाता है।

वर्जीनिया वूल्फ ने महिलाओं की निर्भर स्थिति को देखते हुए कहा कि,“महिला होने के नाते मेरा कोई देश नहीं है।”

फायरस्टोन ने अपनी रचना ‛डायलेक्टिक आफ सेक्स’(1970) मे नारीवाद की नई व्याख्या देकर इससे जुड़े आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की है।

उन्होंने तकनीक के विकास को स्त्री मुक्ति का साधन बताया।

केट मिलेट ने अपनी पुस्तक ‛सेक्सुअल पॉलिटिक्स’(1970) मे बताया कि नारीवाद को एक राजनीतिक आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि स्त्री-पुरुष का संबंध प्राकृतिक न होकर राजनीतिक है। और स्त्री पर पुरुष का जो नियंत्रण है वह जीव वैज्ञानिक अंतर की देन नहीं बल्कि सामाजिक संरचना का परिणाम है ।

केट मिलेट की पुस्तक अमेरिका में नारी मुक्ति आंदोलन को बढ़ावा देने में विशेष रूप से उपयोगी साबित हुई है।

4. उत्तर-आधुनिक नारीवादी

इन नारीवादियों द्वारा बायोमेडिकल साइंस की आलोचना की गई है, क्योंकि रुथ ब्लिर एवं एवलिन फॉक्स केलर मानती है कि सेक्स और जेंडर के बीच का विभाजन सिर्फ बायोमेडिकल साइंस तक सिमट कर रह गया है।

इनका यह मानना है कि सेक्स मानवीय व्यवहार से भी बनता है


भारत में नारीवादी (Feminism) आन्दोलन

पुरुष वर्चस्व हर एक समाज की सच्चाई है और भारतीय समाज भी इससे दूर नहीं रहा है। भारतीय समाज के लगभग सभी वर्गों में महिलाओं की स्थिति शुरू से ही निचले दर्जे की रही है।

समाज की आधी आबादी होने के बावजूद महिलाएँ हमेशा से मूलभूत अधिकारों से वंचित रही हैं। इसलिए भारत में भी नारीवाद पितृसत्ता के विरोध और समान अधिकारों की लड़ाई हुई है।

यदि हम भारत में नारीवादी आंदोलन को देखें तो इसको तीन काल में बाँटा जा सकता है:-

1.प्रथम चरण 1850-1915

भारत मे उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के नारीवादी आंदोलन पश्चिम से अलग है। क्योंकि भारत का नारीवादी आंदोलन 19वीं शताब्दी के सामाजिक सुधार आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा हुआ है।

भारत में पहला नारीवादी आंदोलन समाज में अंधविश्वासी परंपराओं (जैसे- सती प्रथा, बाल विवाह, देवदासी प्रथा आदि) को समाप्त करने पर केंद्रित था।

राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले , सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, ताराबाई शिंदे, स्वामी दयानंद सरस्वती, पंडिता रमाबाई, सर सैय्यद अहमद खान आदि विचारकों और समाज सुधारकों ने महिलाओं से जुड़े हुए प्रश्नों को महत्व दिया था।

इन विचारकों ने विभिन्न संगठनों और कानूनी सुधार के माध्यम से स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह और स्त्री अधिकार की दिशा में प्रयास किया था।

2.द्वितीय चरण 1915-1947

दूसरा चरण महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से जुड़ा हुआ है। इस दौर में महिलाएँ स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर श्रमिक आंदोलन में भी शामिल होने लगी थी।

इस चरण में भारतीय महिला संघ(1917) जैसे विभिन्न संगठनों की स्थापना हुई और शारदा एक्ट (1929) जैसे कानूनी सुधार हुए।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर ने जो महिला उत्थान के लिए जो प्रयास किए वो उल्लेखनीय हैं। क्योंकि जहाँ महात्मा गाँधी ने सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, छुआछूत व विधवाओं के शोषण का मुखर विरोध किया था

वहीं दूसरी तरफ डॉ. अंबेडकर ने कानूनी सुधार जैसे प्रसूति अवकाश (महिलाओं को बच्चे के जन्म के वक्त जो काम से अवकाश मिलता है) और मताधिकार तथा संवैधानिक प्रावधानों जैसे समानता का अधिकार और लैंगिक भेदभाव का अंत से महिलाओं के सशक्तिकरण (अपने जीवन पर नियंत्रण होना) की दिशा में प्रयास किया।

इस दौर में प्रमुख नारीवादियों में कामिनी राय, सरला देवी चौधरानी, दुर्गाबाई देशमुख की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

3.तृतीय चरण 1947 से वर्तमान तक

भारत में नारीवादी आंदोलन का तीसरा चरण आजादी के बाद सार्वजनिक और निजी जीवन में समानता से जुड़ा हुआ है।

यह मुख्य रूप से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समानता, शिक्षा तक पहुँच, संपत्ति में अधिकार तथा लैंगिक भेदभाव के अंत से जुड़ा हुआ है।

यदि हम वर्तमान में भारतीय नारीवादी विचारकों और आंदोलनकारियों की बात करें तो मेघना पंत, वृंदा करात, मधु किश्वर, मेधा पाटकर, गीता सहगल, वंदना शिवा, निवेदिता मेनन, नीरा देसाई, रूथ वनिता का नाम प्रमुख रूप से सामने आता है।


नारीवाद (Feminism) के सामने चुनौतियाँ

1. चूँकि प्रत्येक समाज की संस्कृतियाँ अलग हैं। इसलिये महिलाओं की पराधीनता और शोषण के कारण भी अलग-अलग हैं।

2. नारीवाद के समक्ष सबसे प्रमुख चुनौती स्त्रियों के प्रति बनी बनाई रूढ़ अवधारणाएं और पूर्वाग्रह हैं।

3. सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों के विरुद्ध की मानसिकता का निर्माण हजारों वर्षों का परिणाम है।

4. असंख्य सुधारों के बावजूद भी लैंगिक भेदभाव सार्वजनिक जीवन की एक हकीकत है।

5. नारीवाद की एक प्रमुख चुनौती समाज में विद्यमान असमानता और समाप्ति के विचार को लेकर नारीवादी आंदोलन से जुड़े विचारकों के मध्य असहमति भी है।

6. नारीवाद का प्रमुख उद्देश्य पितृसत्तात्मक समाज को समाप्त करना है लेकिन नारीवाद के अंतर्गत इसके तरीके पर सहमति नहीं है। जिस वजह से नारीवाद की गति धीमी रही है।


Related Questions

1.Feminist approach criticizes the mainstream of political theory. Please discuss.
नारीवादी दृष्टिकोण राजनीति सिद्धांत की मुख्यधारा का आलोचना करती है। विवचना काजिए।

OR/अथवा

2.Discuss the different thought groups of feminism.
नारीवाद के विभिन्न विचार समूहों की विवेचना कीजिए।

OR/अथवा

3.Discuss the main approaches to the study of feminism.
नारीवाद के अध्ययन के मुख्य उपागमों की विवेचना कीजिए।

OR/अथवा

4.Discuss the difference between sex and gender according to feminist ideology.
नारीवादी विचारधारा के अनुसार लिंग और जेंडर के अंतर की विवेचना कीजिए।

OR/अथवा

5.What are the challenges facing feminism?
नारीवाद के सामने क्या चुनौतियाँ हैं ?

OR/अथवा

6.What do you understand by Simone Di Bua's statement "A woman is not born, but becomes a woman"?
सिमोन दी बुआ के कथन "कोई औरत पैदा नहीं होती, बल्कि औरत बन जाती है" से आप क्या समझते है

OR/अथवा

7.What is feminism? Explain with its different types
नारीवाद क्या है? इसके विभिन्न प्रकारों सहित व्याख्या कीजिए।

OR/अथवा

8.What is Indian feminist discourse?
भारतीय नारीवादी विमर्श क्या है?


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