सामंतवाद (feudalism) क्या है?
🔴 सामंतवाद (feudalism)
इतिहासकारों द्वारा 'सामंतवाद (feudalism) शब्द का प्रयोग मध्यकालीन (600 ई. से 1500 ई.) यूरोप के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संबंधों का वर्णन करने के लिए किया जाता है।“सामंतवाद” (feudalism) जर्मन शब्द “फ़्यूड” से बना है जिसका अर्थ है “भूमि का टुकड़ा”।
मध्यकालीन यूरोप मे राजा द्वारा धनी सरदार को जमीन दी जाती थी इस जमीन को "फ्यूड" अथवा "जागीर" कहा जाता था। और धनी सरदार को सामंत या जागीरदार या लॉर्ड कहते थे।
इस सामंत व्यवस्था मे सबसे ऊपर राजा होता था। और राजा नीचे विभिन्न प्रकार के सामंत होते थे तथा सबसे नीचे किसान या दास होते थे।
राजा सारी भूमि का स्वामी (मालिक) माना जाता था। इसलिए सामंत राजा की भक्ति करते थे और उसकी रक्षा के लिए सेना तैयार करते थे इसलिए बदले में राजा उन्हे भूमि देते थे। परंतु सामंत भूमि का क्रय-विक्रय (खरीद-बेच) नहीं कर सकते थे।
सामंत अपनी जागीर पर किसानों और दासो से काम करवाते थे अंतः मध्यकालीन यूरोप मे इस सामाजिक व्यवस्था को ही 'सामंतवाद' के नाम से जाना जाता था।
मध्यकालीन यूरोप मे राजा द्वारा धनी सरदार को जमीन दी जाती थी इस जमीन को "फ्यूड" अथवा "जागीर" कहा जाता था। और धनी सरदार को सामंत या जागीरदार या लॉर्ड कहते थे।
इस सामंत व्यवस्था मे सबसे ऊपर राजा होता था। और राजा नीचे विभिन्न प्रकार के सामंत होते थे तथा सबसे नीचे किसान या दास होते थे।
राजा सारी भूमि का स्वामी (मालिक) माना जाता था। इसलिए सामंत राजा की भक्ति करते थे और उसकी रक्षा के लिए सेना तैयार करते थे इसलिए बदले में राजा उन्हे भूमि देते थे। परंतु सामंत भूमि का क्रय-विक्रय (खरीद-बेच) नहीं कर सकते थे।
सामंत अपनी जागीर पर किसानों और दासो से काम करवाते थे अंतः मध्यकालीन यूरोप मे इस सामाजिक व्यवस्था को ही 'सामंतवाद' के नाम से जाना जाता था।
🔴 यूरोपीय सामंतवाद (feudalism) का विकास
यूरोप में सामंतवाद के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विकास को अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग तरीकों से समझाया है।:-
1887 में, जर्मन विद्वान ब्रेनर ने तर्क दिया कि फ्रांस के चार्ल्स मार्टेल बेहतर घुड़सवार सेना की कमी के कारण अरबों को हरा नहीं कर सके। इसलिए एक बेहतर घुड़सवार सेना बनाने के लिए शासक ने चर्च और अभिजात वर्ग (शक्तिशाली लोग) से भूमि को लेना करना शुरू कर दिया। सैन्य अधिकारियों को भुगतान मे भी जागीर (भूमि) के द्वारा किया जाता था और इस पूरी प्रक्रिया ने सामंतवाद को जन्म दिया।
1920 के दशक में, बेल्जियम के विद्वान हेनरी पिरेन ने सामंतवाद के उदय के बारे मे बताने के लिए आर्थिक पहलुओं पर ध्यान दिया। उनके अनुसार, इस्लाम के उदय के साथ, भूमध्यसागरीय क्षेत्र में लंबी दूरी के यूरोपीय व्यापार में गिरावट आई जिसके कारण एक ग्रामीण 'बंद अर्थव्यवस्था' विकसित हुई।
फ्रांसीसी विद्वान मार्क ब्लॉख ने सामंतवाद के बारे मे बताने के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सभी पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया। यूरोप में बार-बार हमले होने के कारण मध्य युग के दौरान सुरक्षा और जीविका जरूरत थी। इससे एक दूसरे पर निर्भरता का विकास हुआ। और यह तब तक जारी रहा जब तक कि हर कोई एक दूसरे पर निर्भर नहीं हो गया। इस प्रक्रिया मे शक्तियों का बंटवारा एक पिरामिड शैली में था। जिसमे राजा सबसे ऊपर था जो किसी के अधीन (नीचे) नहीं था और किसान सबसे नीचे था जो किसी का स्वामी (मालिक) नहीं था।
1887 में, जर्मन विद्वान ब्रेनर ने तर्क दिया कि फ्रांस के चार्ल्स मार्टेल बेहतर घुड़सवार सेना की कमी के कारण अरबों को हरा नहीं कर सके। इसलिए एक बेहतर घुड़सवार सेना बनाने के लिए शासक ने चर्च और अभिजात वर्ग (शक्तिशाली लोग) से भूमि को लेना करना शुरू कर दिया। सैन्य अधिकारियों को भुगतान मे भी जागीर (भूमि) के द्वारा किया जाता था और इस पूरी प्रक्रिया ने सामंतवाद को जन्म दिया।
1920 के दशक में, बेल्जियम के विद्वान हेनरी पिरेन ने सामंतवाद के उदय के बारे मे बताने के लिए आर्थिक पहलुओं पर ध्यान दिया। उनके अनुसार, इस्लाम के उदय के साथ, भूमध्यसागरीय क्षेत्र में लंबी दूरी के यूरोपीय व्यापार में गिरावट आई जिसके कारण एक ग्रामीण 'बंद अर्थव्यवस्था' विकसित हुई।
फ्रांसीसी विद्वान मार्क ब्लॉख ने सामंतवाद के बारे मे बताने के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सभी पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया। यूरोप में बार-बार हमले होने के कारण मध्य युग के दौरान सुरक्षा और जीविका जरूरत थी। इससे एक दूसरे पर निर्भरता का विकास हुआ। और यह तब तक जारी रहा जब तक कि हर कोई एक दूसरे पर निर्भर नहीं हो गया। इस प्रक्रिया मे शक्तियों का बंटवारा एक पिरामिड शैली में था। जिसमे राजा सबसे ऊपर था जो किसी के अधीन (नीचे) नहीं था और किसान सबसे नीचे था जो किसी का स्वामी (मालिक) नहीं था।
🔴 भारतीय सामंतवाद (feudalism) का विकास
भारतीय सामंतवाद के इतिहास के बारे में भी विद्वानों ने चर्चा की है।:-
आर.एस. शर्मा के अनुसार, भारतीय सामंतवाद की कुछ प्रमुख विशेषताएँ थीं जैसे:- व्यापार और शहरीकरण की गिरावट, मौद्रिक साक्ष्यों की कमी, किसानों की स्थिरता और संप्रभुता का ह्रास (कम होना)|
दिनेश चंद्र सरकार ने सामंतवाद के बजाय 'जमींदारवाद' ('लैंडलोर्डिज्म') शब्द का इस्तेमाल करना पसंद किया और यहाँ तक कि शुरुआती भारत में सामंतवाद को 'मिथ्या' (झुट) तक कहा।
भारत में भूमि-दान ब्राह्मण, मंदिर और मठ को दिया जाता था जिनसे यूरोप के अभिजात वर्ग की तरह राजाओं को सैन्य सेवाएँ देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। ज्यादा से ज्यादा, उन्होंने राजाओं के शासन के लिए लोकप्रिय समर्थन और सहमति देने के अलावा, प्रजा (जनता) पर सांस्कृतिक पकड़ को मजबूत बनाने में मदद की।
हरबंस मुखिया, बी.डी. चट्टोपाध्याय, हरमन कुलके और कई अन्य इतिहासकारों ने साबित किया कि भूमि-दान से राज्य के अधिकार कम नहीं हो रहे थे और राज्य के सम्प्रभुता के लिए भी हानिकारक नहीं थे।
अधिकतर सभी गांव में चर्च होते थे जहां पादरी का धर्म उपदेश सुनने के लिए लोग प्रत्येक रविवार को लोग आते थे
एक वर्ष के समय के बाद चर्च को कृषक की फसल का दसवां भाग लेने का अधिकार था जिसे “टीथ” कहते थे
पश्चिमी चर्च के अध्यक्ष को पोप कहा जाता था जो रोम में रहते थे और यूरोप में ईसाई समुदाय का मार्गदर्शन विशप या पादरी करते थे
दास या शारीरिक रूप से बाधित पादरी नहीं बन सकते थे और जो लोग पादरी बनते थे वह शादी नहीं कर सकते थे
पादरी अभिजात माने जाते थे क्योंकि इनके पास जागिरे और महल भी थे
आर.एस. शर्मा के अनुसार, भारतीय सामंतवाद की कुछ प्रमुख विशेषताएँ थीं जैसे:- व्यापार और शहरीकरण की गिरावट, मौद्रिक साक्ष्यों की कमी, किसानों की स्थिरता और संप्रभुता का ह्रास (कम होना)|
दिनेश चंद्र सरकार ने सामंतवाद के बजाय 'जमींदारवाद' ('लैंडलोर्डिज्म') शब्द का इस्तेमाल करना पसंद किया और यहाँ तक कि शुरुआती भारत में सामंतवाद को 'मिथ्या' (झुट) तक कहा।
भारत में भूमि-दान ब्राह्मण, मंदिर और मठ को दिया जाता था जिनसे यूरोप के अभिजात वर्ग की तरह राजाओं को सैन्य सेवाएँ देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। ज्यादा से ज्यादा, उन्होंने राजाओं के शासन के लिए लोकप्रिय समर्थन और सहमति देने के अलावा, प्रजा (जनता) पर सांस्कृतिक पकड़ को मजबूत बनाने में मदद की।
हरबंस मुखिया, बी.डी. चट्टोपाध्याय, हरमन कुलके और कई अन्य इतिहासकारों ने साबित किया कि भूमि-दान से राज्य के अधिकार कम नहीं हो रहे थे और राज्य के सम्प्रभुता के लिए भी हानिकारक नहीं थे।
🔴 पोप या पादरी (प्रथम वर्ग)
चर्च एक शक्तिशाली संस्था थी और राजा ने कैथोलिक चर्च को भूमि दे रखी थी जिस पर कैथोलिक चर्च कर लिया करते थे परंतु चर्च राजा पर निर्भर नहीं थेअधिकतर सभी गांव में चर्च होते थे जहां पादरी का धर्म उपदेश सुनने के लिए लोग प्रत्येक रविवार को लोग आते थे
एक वर्ष के समय के बाद चर्च को कृषक की फसल का दसवां भाग लेने का अधिकार था जिसे “टीथ” कहते थे
पश्चिमी चर्च के अध्यक्ष को पोप कहा जाता था जो रोम में रहते थे और यूरोप में ईसाई समुदाय का मार्गदर्शन विशप या पादरी करते थे
दास या शारीरिक रूप से बाधित पादरी नहीं बन सकते थे और जो लोग पादरी बनते थे वह शादी नहीं कर सकते थे
पादरी अभिजात माने जाते थे क्योंकि इनके पास जागिरे और महल भी थे
> भिक्षु और मठवाद
चर्च के अलावा भी ईसाइयों की एक दूसरी संस्था थी और इस संस्था के लोग अत्यधिक धार्मिक थे जिन्हें भिक्षु कहा जाता हैभिक्षु मनुष्य की आम आबादी से दूर एकांत जीवन में रहते थे और अपना सारा जीवन धार्मिक समुदायों मे गुजारा करते थे जिन्हें “एबी” या “मठ” बोला जाता है
7वीं शताब्दी के आसपास मठवाद का प्रमुख विकास हुआ। क्योंकि ईसाई धर्म को फैलाने के उद्देश्य से ग्रामीण क्षेत्रों में नए मठों की स्थापना की गई।
529 में इटली में “सेंट बेनिडिक्ट” और 910 में बरगंडी में “कलूनी” मठ बनाए गए जो सबसे प्रसिद्ध थे
भिक्षु मठ में प्रार्थना करते थे, अध्ययन करते थे, कृषि कार्य करते थे और शारीरिक श्रम भी करते थे
भिक्षु की जिंदगी स्त्री और पुरुष दोनों अपना सकते थे इसलिए पुरुष भिक्षु को “मोंक” कहा जाता था और स्त्री भिक्षु को “नन” कहा जाता था
कुछ मठ ऐसे भी थे जो भिक्षुओं और ननों दोनों को रहने की अनुमति (permission) देते थे जबकि कुछ मठ केवल नन या मोंक के लिए ही थे।
भिक्षु और भिक्षुणी विवाह नहीं कर सकते थे
13वीं सदी में कुछ भिक्षु मठों से बाहर रहने लगे जिन्हें “फ्रायर” कहा गया था
🔴 भूस्वामी और अभिजात / कुलीन वर्ग (दूसरा वर्ग)
वास्तव में सामाजिक प्रक्रिया में अभिजात वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी क्योंकि अभिजात वर्ग का भूमि पर नियंत्रण था और ये बड़े भूस्वामी और अभिजात वर्ग राजा के अधीन होते थेअभिजात वर्ग का अपनी संपदा पर स्थाई नियंत्रण होता था और यह अभिजात वर्ग अपनी भूमि पर बसे सभी व्यक्तियों के मालिक होते थे
अभिजात वर्ग अपनी खुद की सेना भी रखते थे जिसे नाईट कहा जाता था और यह इस सेना को बढ़ा भी सकते थे, खुद के न्यायालय लगा सकते थे और अपनी मुद्रा भी चला सकते थे
यह बड़े-बड़े खेतों के स्वामी होते थे तथा लॉर्ड (अभिजात वर्ग) गांव पर भी नियंत्रण रखते थे अंतः कुछ लॉर्ड अनेक गांव के भी मालिक थे
लॉर्ड की जमीनों पर चरागाह और चर्च भी होते थे और इनके घर को “मेनर” कहा जाता था
जागीरो में वन भी होते थे जहां लॉर्ड शिकार करते थे और इनकी व्यक्तिगत भूमि कृषकों द्वारा ज्योति जाती थी
जागीरो में सुरक्षा के लिए दुर्ग भी बनाए गए थे और 13 वी सदी तक दुर्गों को और बढा बनाया जाने लगा जिससे नाईट के परिवार का निवास बन सके
> शूरवीर या नाइट
9 वीं सदी में यूरोप में स्थानीय युद्ध होते रहते थे इसलिए युद्ध के लिए कुशल अश्वसेना की आवश्यकता पड़ने लगी थी जिससे एक नया वर्ग बना जिसे “शूरवीर या नाइट” कहा गया।शूरवीर या नाइट कुशल योद्धा होते थे और पूरी तरह प्रशिक्षित (trained) भी थे। परंतु 11वीं शताब्दी तक ये घुड़सवार सैनिक कुलीन वर्ग के हिस्से में नहीं आते थे।
12वीं सदी मे लगातार युद्ध के कारण हथियार वाले घुड़सवार सैनिक का महत्त्व बढ़ा गया। जिसके कारण शूरवीर या नाइट ने कुलीन वर्ग (नोबिलिटी) में अपनी जगह बनाई।
लॉर्ड शूरवीर या नाइट को भूमि का एक टुकड़ा देते थे जिसे “फीफ” कहा जाता था और इसके बदले नाइट लॉर्ड की रक्षा का वचन देते थे
यह फीफ 1000 से 2000 एकड़ तक हो सकती थी और नाइट इस “फीफ” को अपने उत्तराधिकारी को भी दे सकते थे
फीफ मे नाइट के लिए पवन चक्की, चर्च और रहने के घर आदि भी थे
नाइट अपनी सैन्य योग्यताओं को बनाए रखने के लिए रोजाना बाढ़ बनाना, घेराबंदी करना, रण कौशल का अभ्यास करना आदि कार्य करते थे
नाइट अपनी सेवा दूसरे लॉर्ड को भी दे सकते थे लेकिन सर्वप्रथम नाइट अपने लॉर्ड के प्रति निष्ठा रखते थे
शुरुआत में ईसाई चर्च ने शूरवीर का समर्थन (support) नहीं किया क्योंकि यह हिंसा और युद्ध से जुड़े थे लेकिन बदलती हुई राजनीति ने चर्च को अपनी सुरक्षा के लिए मजबूर किया।
युद्ध के नए विचारों की शुरुआत की गई। और हराए गए योद्धाओ का नरसंहार और गुलाम बनाने जैसी प्रथाओं को अब छोड़ दिया गया।
🔴 किसान और गुलाम (तीसरा वर्ग)
किसान और गुलाम भू स्वामियों के अधीन होते थे और यह दोनों वर्गों के भरण-पोषण का काम करते थेकिसान दो प्रकार के होते थे स्वतंत्र किसान और कृषि दास (सर्प)
कृषक के परिवार को सप्ताह में 3 या उससे अधिक दिन लार्ड की जागीरो पर काम करना पड़ता था जिसके लिए इन्हें कोई मजदूरी नहीं दी जाती थी
यह गड्ढे खुदवाना, लकड़ी ईखट्टा करना, बाढ़ बनाना, सड़क बनाना, इमारत की मरम्मत करना आदि काम भी करते थे
स्त्रियां और बच्चे सूत कातना, कपड़े बुन्ना, मोमबत्ती बनाना, लोड के लिए अंगूर का रस निकालकर मदिरा तैयार करना आदि कार्य करते थे
किसानों को कभी कभी राजा को एक कर देना होता था जिसे “टैली” कहा जाता है और यह कर अभिजात और पादरी वर्ग नहीं देते थे
कृषि दास लॉर्ड की भूमि पर खेती करते थे इसलिए उपज का अधिकतर भाग लॉर्ड को दिया जाता था और कृषि दासो को लॉर्ड की भूमि पर खेती करने के लिए कोई मजदूरी भी नहीं मिलती थी
कृषि दास अपने लॉर्ड की आज्ञा के बिना जागीर को नहीं छोड़ सकते थे तथा कृषि दास केवल लॉर्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे और उनके तंदूर में ही रोटी सेक सकते थे
कृषि दास मदिरा संपीडक में मदिरा और बीयर तैयार करते थे
कृषि दास को विवाह करने के लिए लॉर्ड से आज्ञा लेनी होती थी और अपने पसंदीदा विवाह करने के लिए लॉर्ड को शुल्क भी देना पड़ता था
पेरी एंडरसन का तर्क है कि उस समय किसान उत्पादन के साधनों (भूमि) से एक ऐसे सामाजिक संबंध से जुड़ा हुआ था जिसे भू-दासता के रूप में जाना जाता है। ग्रामीण कृषि संपत्ति स्वामियों के नियंत्रण में थी और यह मजबूर किसानों से अधिशेष वसूला करते थे।
> स्वतंत्र किसान
जरूरत पड़ने पर पुरुष को युद्ध के समय पैदल सैनिकों के रूप में कार्य करना पड़ता था (वर्ष में कम से कम 40 दिन)कृषक के परिवार को सप्ताह में 3 या उससे अधिक दिन लार्ड की जागीरो पर काम करना पड़ता था जिसके लिए इन्हें कोई मजदूरी नहीं दी जाती थी
यह गड्ढे खुदवाना, लकड़ी ईखट्टा करना, बाढ़ बनाना, सड़क बनाना, इमारत की मरम्मत करना आदि काम भी करते थे
स्त्रियां और बच्चे सूत कातना, कपड़े बुन्ना, मोमबत्ती बनाना, लोड के लिए अंगूर का रस निकालकर मदिरा तैयार करना आदि कार्य करते थे
किसानों को कभी कभी राजा को एक कर देना होता था जिसे “टैली” कहा जाता है और यह कर अभिजात और पादरी वर्ग नहीं देते थे
> कृषि दास (सर्प)
मूल रूप से भूमि का मालिक स्वामी था लेकिन उस पर किसान द्वारा खेती की जाती थी। जिन्हे कृषि दास कहा जाता थाकृषि दास लॉर्ड की भूमि पर खेती करते थे इसलिए उपज का अधिकतर भाग लॉर्ड को दिया जाता था और कृषि दासो को लॉर्ड की भूमि पर खेती करने के लिए कोई मजदूरी भी नहीं मिलती थी
कृषि दास अपने लॉर्ड की आज्ञा के बिना जागीर को नहीं छोड़ सकते थे तथा कृषि दास केवल लॉर्ड की चक्की में ही आटा पीस सकते थे और उनके तंदूर में ही रोटी सेक सकते थे
कृषि दास मदिरा संपीडक में मदिरा और बीयर तैयार करते थे
कृषि दास को विवाह करने के लिए लॉर्ड से आज्ञा लेनी होती थी और अपने पसंदीदा विवाह करने के लिए लॉर्ड को शुल्क भी देना पड़ता था
पेरी एंडरसन का तर्क है कि उस समय किसान उत्पादन के साधनों (भूमि) से एक ऐसे सामाजिक संबंध से जुड़ा हुआ था जिसे भू-दासता के रूप में जाना जाता है। ग्रामीण कृषि संपत्ति स्वामियों के नियंत्रण में थी और यह मजबूर किसानों से अधिशेष वसूला करते थे।
🔴 ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि उत्पादन
5वी से 10वीं सदी तक यूरोप का अधिकांश भाग वनों से घिरा हुआ था और कृषि योग्य भूमि बहुत कम थी।यह तीव्र ठंड का दौर चल रहा था और इस समय सर्दिया बहुत लंबी थी इसलिए फसलों का उपज काल छोटा हो गया था जिससे पैदावार भी कम हो गई थी।
प्रारंभ में कृषि प्रौद्योगिकी (technology) आदिम (पुरानी) थी और कृषि मे बैलों और हल का प्रयोग होता था जिससे भूमि की उपज नहीं बढ़ रही थी।
भूमि को 4 सालों में एक बार खोदा जाता था और कृषि के लिए भूमि को दो भागों में बाटा जाता था ताकि पहले बाग में शरद ऋतु में गेहूं बोया जाए और दूसरे भाग को परती (खाली) जाए।
अगले वर्ष परती भूमि पर राई बोई जाती थी और दूसरी भूमि को खाली छोड़ दिया जाता था इससे मिट्टी की उर्वरता में कमी आई और अकाल पड़ने लगे।
परंतु लॉर्ड अपनी आय बढ़ाने में लगे रहे और किसानों को लॉर्ड की जागीरो पर भी काम करना पड़ता था। इसलिए अब किसान कृषि करने के लिए अधिक समय लगाने लगे।
11 वीं सदी से यूरोप में गर्माहट का दौर शुरू हुआ जिसका कृषि पर अच्छा प्रभाव पड़ा और किसानों को खेती की लंबी अवधि मिलने लगी।
अब कृषि प्रौद्योगिकी में भी बदलाव आया और लकड़ी के हल के स्थान पर लोहे की भारी नोक वाले हल और साचेदार पटरे का प्रयोग होने लगा क्योंकि ये हल गहरा खोद सकते थे।
अब हल को पशुओं के गले के स्थान पर कंधे पर बांदा जाने लगा जिससे पशुओं को अधिक शक्ति मिलती थी।
घोड़े के खुर पर लोहे की नाल लगाई जाने लगी थी और अब यूरोप में अनाज पीसने और अंगूर का रस निचोड़ में जल और वायु शक्ति का प्रयोग होने लगा।
भूमि उपयोग के तरीके भी बदले क्योंकि अब 2 खेत वाली व्यवस्था खत्म करके तीन खेत वाली व्यवस्था का उपयोग होने लगा था
अब खेतों को तीन भागों में बाँटा गया, एक शरद ऋतु की फसलों के लिए (जिसमे गेहूँ, जौ और राई उगाई जाती थी), दूसरा वसंत ऋतु की फसलों के लिए (जिसमे जई, सेम और मटर उगाई जाती थी) और तीसरा परती छोड़ने के लिए थी।
इससे उत्पादन में वृद्धि हुईऔर भोजन की उपलब्धता दुगनी हो गई इसलिए अब कृषकों को बेहतर अवसर मिलने लगे
अब किसानों ने खेती योग्य भूमि का विस्तार किया और गांव में लोहार की दुकान स्थापित की गई
अंतः 11 वीं सदी में सामंतवाद कमजोर हुआ और आर्थिक लेनदेन अब मुद्रा पर आधारित हो गया इसलिए अब लॉर्ड भी नगदी लेने लगे जिससे अब कृषक अपनी फसल व्यापारियों को बेच सकते थे
🔴 व्यापार का विकास
11वीं शताब्दी के बाद से व्यापार का पुनरुत्थान हुआ। और स्थानीय बाजार अक्सर मछली, नमक तथा वस्त्रों से सम्बंधित थे।हर एक वस्तु का उत्पादन स्थानीय स्तर पर नहीं होता था। और कुछ क्षेत्रों में रेशम और मसालों का व्यापार होता था।
अभिजात वर्ग पहले से ही शानदार वस्तुओं के सबसे बड़े उपभोक्ता थे।
इस समय के दौरान कॉन्स्टेंटिनोपल ( कुस्तुंतुनिया, बाइजेंटाइन साम्राज्य राजधानी) को जर्मनिक या अरब हमलों का ज्यादा सामना नहीं करना पड़ा और इसलिए यह एक प्रमुख नगरीय व्यापारिक केंद्र बना रहा।
समुद्री मार्गों के साथ-साथ स्थलीय और नदी मार्गों में भी सुधार हुआ। और इंग्लैंड के राजा हेनरी प्रथम ने 1135 ई0 में एक आदेश दिया कि सभी राजमार्ग इतने चौड़े होने चाहिए कि दो वैगन-गाड़ियाँ आसानी से गुजर सकें।
जनसंख्या में वृद्धि से खाद्यान्न, इमारती लकड़ी, जलावन की लकड़ी और बड़े पैमाने पर उपभोग के लिए अलग-अलग तरह की वस्तुओं की माँग में वृद्धि हुई।
दूर देशों के व्यापारियों को आकर्षित करने के लिए वार्षिक मेले आयोजित किए जाते थे। लोम्बार्डी, फ़्लैंडर्स, इंग्लैंड और जर्मनी में ऐसे मेलों के कई केंद्र थे। सबसे प्रसिद्ध केंद्र उत्तरी फ्रांस में “शैम्पेन” में था।
🔴शहरी केंद्रों का उदय
कृषि में विकास से जनसंख्या और व्यापार में वृद्धि हुई जिससे नगरों का विस्तार हुआरोमन साम्राज्य के पतन के बाद जो नगर तबाह हो गए थे अब वह नगर कृषि की उन्नति के कारण फिर से बसने लगे थे
जिन किसानों के पास ज्यादा खाद्यान्न था उन्हें ऐसे स्थान की जरूरत महसूस हुई जहां वह उसे बेच सकें इससे छोटे विपणन केंद्र (बाजार) का विकास हुआ
धीरे-धीरे नगर विकसित होने लगे और अब एक नगर में चर्च, सड़क, व्यापारियों का घर और दुकान बनने लगे थे
नगरों में लोग सेवा के स्थान पर उन लॉर्ड को कर (tax) देने लगे जिन लॉर्ड की भूमि पर नगर बसे हुए थे
स्वतंत्र होने की इच्छा रखने वाले अनेक कृषक भागकर नगरों में छिप जाते थे और कृषकों के परिवार के लोग भी लॉर्ड के नियंत्रण से मुक्ति लिए नगर मे आने लगे थे
नगरों में दुकानदार और व्यापारी की बहुत जनसंख्या थी बाद में विशिष्ट कौशल वाले व्यक्तियों जैसे साहूकार, वकीलों की आवश्यकता हुई
बड़े नगरों की जनसंख्या लगभग 30,000 होती थी
आर्थिक संस्था का आधार “श्रेणी” था और यह श्रेणी एक ऐसी संस्था थी जो उत्पाद की गुणवत्ता, मूल्य और बिक्री पर नियंत्रण रखती थी
लोहा, चमड़ा, जूता बनाना, कपड़ा रंगना, ऊनी कपड़े आदि से संबंधित उद्योग बड़े पैमाने पर विकसित हुए। हालाँकि, पूरे यूरोप में शहरी केंद्रों का विकास एक बराबर नहीं था। शहरीकरण के इस असमान फ़ैलाव के लिए जनसंख्या फ़ैलाव भी जिम्मेदार थी।
🔴 सामंती संकट / सामंतवाद (feudalism) के पतन के कारण
14 वी शताब्दी में यूरोप का आर्थिक विकास बहुत धीमा हो गया था और मोसम ग्रीष्म ऋतु से ठंडी ऋतु मे परिवर्तित हो गया जिससे खेती की पैदावार मे भी कमी आईतूफान और बाढ़ के कारण भी बहुत नुकसान होने लगा था और प्राकृतिक आपदाओं के अलावा भी कुछ मानव निर्मित आपदाएँ भी यूरोप की परेशानियों के लिए जिम्मेदार थीं।
भूमि का उचित संरक्षण नहीं हो पाया था और चारागाह की कमी के कारण पशुओं की संख्या भी कम होने लगी थी
लोगों की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी और संसाधनों की कमी होने लगी जिससे 1315 से 1317 के बीच अकाल पड़ गया था
1320 में बहुत सारे पशुओं की मृत्यु हुई और ऑस्ट्रिया तथा सर्बिया में चांदी का उत्पादन कम होने से धातु की मुद्रा में भी गिरावट आई
व्यापार बढ़ने के कारण दूर देशों से लोग यूरोप आने लगे जिससे उन लोगों के साथ चूहे भी आ जाते थे जिससे प्लेग की बीमारी फैल गई
1347 से 1350 मे पूरी तरह से महामारी फैल गई इससे 20% से 40% लोगों की मौत हुई परंतु व्यापार केंद्र इससे ज्यादा प्रभावित थे क्योंकि एक व्यक्ति को अगर प्लेग होता था तो वह सब मे फैल जाता था
प्लेग से शिशु, युवा और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुए थे जिससे 1400 में जनसंख्या घटकर 450 लाख हो गई क्योंकि सामाजिक विस्थापन भी बड़ी मात्रा मे हुआ था
मजदूरों की संख्या में भी कमी आई जिससे कृषि और उत्पादन के बीच असंतुलन हो गया
भूमि का टुकड़े, भूमि की उपजाऊ क्षमता मे कमी, खाद की कमी, खाद्य फसलों की जगह पर नकदी फसलों पर जोर देना आदि कारणों से उत्पादकता में गिरावट हुई।
इंग्लैंड और फ्रांस के बीच 100 के युद्ध ('दी हंड्रेड इयर्स वॉर') के साथ-साथ सामंतों के बीच लगातार झगड़ों ने कहर ढाया।
