वैश्वीकरण क्या है - अर्थ, परिभाषा, विकास, कारण, विशेषताएं, महत्व, परिणाम और आलोचना

वैश्वीकरण का अर्थ क्या है?

वैश्वीकरण दो शब्दों से मिलकर बना है विश्व + एकीकरण

अंग्रेजी शब्द 'Globalization' काे हिंदी मे रूपांतरित (Translate) करके वैश्वीकरण कहा जाता है

वैश्वीकरण को ओर भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसे :- वैश्वायान, पृथ्वीकरण भूमंडलीकरण और जगतीकरण आदि |

वैश्वीकरण एक प्रक्रिया है जिसमे वस्तुओं और सेवाओं के एक देश से दूसरे देशों में आने - जाने के अवरोधों (रुकावटाे) को समाप्त कर दिया जाता है

वैश्वीकरण का आशय (मतलब) :- पूरे विश्व का सहयोग एवं समन्वय (तालमेल) से एक बाजार के रूप में काम करना है

एक अवधारणा के अनुसार वैश्वीकरण में निम्न प्रकार के प्रवाह होते हैं :-
  • विश्व के एक हिस्से से विचारों का दूसरे हिस्से में पहुंचना
  • वस्तुओं का कई देशों में बिना रुकावट के पहुंचना
  • व्यापार और बेहतर आजीविका (income) की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों के सुगम (easy) आवाजाही (आना-जाना)
  • पूंजी (money) का कई देशों में बिना रुकावट पहुंचना

वैश्वीकरण क्या है - अर्थ, परिभाषा, विकास, कारण, विशेषताएं, महत्व, परिणाम और आलोचना
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वैश्वीकरण की परिभाषा

1 राघवन के अनुसार:- विश्व के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं का समाधान जब विश्व के एक मंच पर होता है तब वैश्वीकरण का संकेत मिलता है

2 एस.के. दुबे के अनुसार:- वैश्वीकरण के मे सभी शैक्षिक, आर्थिक एवं सामाजिक क्रिया होती हैं जो मानव कल्याण से संबंधित होती हैं

3 राजकुमारी शर्मा के अनुसार:- वैज्ञानिक प्रगति (progress), आर्थिक समानता एवं मानव कल्याण के लिए किए गए विश्वस्तरीय (विश्व के level पर) प्रयास वैश्वीकरण में आते हैं

4 गिडेन्स के अनुसार:- विभिन्न लोगों और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के बीच में बढ़ती हुई पारस्परिकता (संबंध) ही वैश्वीकरण हैं

5 एंथनी गिडिन्स के अनुसार:- वैश्वीकरण विश्वव्यापी (विश्व level पर) सामाजिक संबंधों ही वैश्विकरण है

वैश्विकरण मे प्रत्येक राष्ट्र अपनी सीमाओं के बाहर जाकर दूसरे राष्ट्रों के साथ अपने संबंधों को स्थापित करता है

अंतः घरेलू बाजार की शक्तियों का उपयोग करके राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर अपना काम करना ही वैश्वीकरण कहलाता है


वैश्वीकरण : ऐतिहासिक विकास


वैश्वीकरण की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों के बीच काफी मतभेद (विरोध) है

कई विद्वानों का मानना है कि वैश्वीकरण 20वी शताब्दी की देन है वहीं कुछ का कहना है कि वैश्वीकरण एकदम से तो 20वी शताब्दी में उत्पन्न नहीं हुआ बल्कि यह प्राचीन काल से ही चलता आ रहा है

इतिहासकार, साधु, महात्मा तथा राजा आदि सब धन, शक्ति एवं ज्ञान की खोज में नए-नए रास्तों की तलाश करते थे और इसी तरह से वैश्वीकरण का विकास हुआ था

उदाहरण:- रेशम मार्ग जो चीन से लेकर यूरोप तक फैला हुआ था | विश्व के एक बड़े भूभाग को आपस में जोड़ता था तथा आर्थिक रूप से लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा था अंतः इसे वैश्वीकरण का प्रारंभिक चरण (step) माना जा सकता है

मध्यकाल में भी चंगेज खान और तैमूर के साम्राज्य ने विश्व के एक बड़े भूभाग को जोड़ा जिसे आधुनिक (आज का) वैश्वीकरण का अल्पविकसित रूप माना जाता है

वास्तविक (real) वैश्वीकरण की शुरुआत आधुनिक काल (modern time) में औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप और अफ्रीकी देशों के बीच व्यापारिक संपर्क के विस्तार में देखी जा सकती है

19वीं सदी में वैश्वीकरण मुख्यतः औद्योगिकरण की प्रक्रियाओं से संबंधित था | इसके अंतर्गत कई घरेलू वस्तुओं का उत्पादन कम कीमतों पर होता था

कुछ विद्वानों का मत है कि प्रथम विश्व युद्ध से पहले वैश्वीकरण का नेतृत्व (leadership) ब्रिटेन ने किया था तथा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उसका नेतृत्व अमेरिका ने किया

20वीं शताब्दी के बीच में जिस वैश्वीकरण की बात की जाती है उसमे यूरोप एवं अमेरिका में स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार है

अंतर्राष्ट्रीय यातायात और जनसंचार के माध्यमों की भूमिका वैश्वीकरण के प्रसार (फैलाव) में निर्णायक (महत्वपूर्ण) सिद्ध हुई

विद्वानों का मानना है कि वैश्वीकरण शब्द का प्रचलन दो दशकों यानी 1980 एवं 1990 के दशक में (जब शीत युद्ध का अंत और सोवियत संघ के बिखराव हुआ) आम हो गया

वैश्वीकरण : वैकल्पिक दृष्टिकोण

वैश्वीकरण ने पूँजीपतियों के लिए धन की सुविधा प्रदान की है। क्योंकि अब विश्व की अर्थव्यस्था पर नव-उदारवादी वैश्वीकरण हावी है।

नव-उदारवादी वैश्वीकरण के प्रभाव निषेधात्मक (Negative) हैं। क्योंकि इससे असमानता व गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता व जलवायु परिवर्तन में वृद्धि हुई हैं।

इसने राष्ट्र व विश्व के प्रत्येक नागरिक के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

विचारक कहते हैं कि वैश्वीकरण के कई विकल्प है। इनके अनुसार वैश्वीकरण के कुछ वैकल्पिक विकल्प निम्नलिखित हैं-

1. स्थानीय अर्थव्यवस्था (The Local Economy): इस अर्थव्यवस्था मे वैश्वीकरण के वजाय अपने साधनों से प्राथमिक उत्पाद, वस्तुओं एवं सेवाओं का अधिक-से-अधिक उत्पादन होता है।

जिसका उत्पादन वे स्वयं नहीं कर सकते हैं उसे पड़ोसी अर्थव्यवस्था से हासिल किया जाता है।

लंबी दूरी का व्यापार अंतिम उपाय के रूप में ही होता है।

2. पूँजी और निवेश (Capital and Investment): हमे वैश्वीकरण के विकल्प मे स्थानीय स्तरों पर पूँजी का निवेश उद्योगों, सामाजिक व पर्यावरण की स्थिति को बेहतर करने तथा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने मे करना चाहिए।

स्थानीय गतिविधियों को प्रोत्साहन एवं व्यापक करने के लिए पूँजी प्रवाह का लोकतांत्रिक नियंत्रण अनिवार्य है।

स्थानीय व क्षेत्रीय वित्तीय संस्थाओं को प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है और इसके लिए बड़े संस्थानों को बाँटना चाहिए।

खरीदो यहाँ बेचो यहाँ’ की नीतियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

3. अनुमान व्यवस्था (सट्टेबाजी) पर नियंत्रण (Controlling the Speculators): विचारको के अनुसार निवेश केन्द्रित होना चाहिए न कि अनुमान आधारित हो।

वित्तीय व्यापार को उत्साहित करना चाहिए एवं उसे सख्ती से विनियमित ( लेना देना ) करना चाहिए।

4. अंतर्राष्ट्रीय निगम (संस्था) (Transnational Corporations): मुक्त बाजार को प्रोत्साहित करने का प्रभाव यह हुआ है कि ये निगमें जिस बाजार में व्यापार करते हैं उन पर प्रभुत्व बना लेते हैं।

इन निगमों ने उस सीमा को भी पार कर लिया है जिसमें यह स्थानीय समुदाय व क्षेत्र पर प्रभुत्व जमा लेते हैं।

इनमें से कई उन राष्ट्रों से बड़े हैं जो इन पर नाममात्र का नियंत्रण रखते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय निगमों का प्रयोग निगमित हितों के बजाय सामान्य हित के लिए होना चाहिए

इसका उद्देश्य निश्चित रूप से वस्तुओं एवं सेवाओं में निवेश को प्रोत्साहित करना होना चाहिए।

बाजार तक पहुँच 'यहाँ बैठो, यहाँ बेचो' नियम पर आधारित हो चाहिए।

5. सीमित बाजार पहुँच (Limiting Market Access): क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कंपनी की बाजार में भागीदारी की सीमा होनी चाहिए।

ऐसे बाजार में जहाँ पर एक कंपनी का प्रभुत्व होता है, वहाँ नए उद्योगों को अनुदान, ऋण व सब्सिडी के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

स्थानीय उद्योगों में वृद्धि हेतु संचार व प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को प्रोत्साहित करना चाहिए।

नियमों के द्वारा कंपनी के लाभों को देश के बाहर भेजे जाने पर उचित नियंत्रण होना चाहिए।

निगमों की कर चोरी पर रोक लगाने के लिए सतत् प्रयास किये जाने चाहिए

6 बहुराष्ट्रीय संधियाँ (Multinational Agreements): यह सतत् एवं न्यायोचित विकास के लिए बाधक है

इन संधियों मे बड़ी कंपनी व पूँजीवादियों के हितों को ही ध्यान में रखते हैं जिनमें वे क्षेत्र और समुदाय भी शामिल हैं जहाँ पर वे स्थित हैं।

ऐसी व्यवस्थाओं का सहयोग आधारित प्रोत्साहित कर हटाया जाना चाहिए।

वित्तीय नीतियाँ, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को निष्पक्षता पर आधारित होना चाहिए न कि मुक्त व्यापार पर।

इन कार्यों का लक्ष्य सतत् औद्योगिक विकास के माध्यम से स्थानीय आत्मनिर्भरता के साथ-साथ संवृद्धि को भी प्राप्त करना है।

वैश्वीकरण के कारण

1 संचार एवं सूचना क्रांति:- वैश्वीकरण का मुख्य कारण संचार एवं सूचना क्रांति का तीव्र (तेज) होना है

1990 के बाद के सालों में सूचना क्रांति ने उपग्रह (satellite), टेलीविजन, इंटरनेट आदि के द्वारा पूरे विश्व को एक साथ जोड़ दिया

2 शीत युद्ध का अंत:- द्वितीय युद्ध के बाद सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीत युद्ध शुरू हुआ | दिसंबर 1991 में सोवियत संघ के पतन के साथ शीत युद्ध भी खत्म हो गया

अब अमेरिका महाशक्ति के रूप में अस्तित्व में आया और अमेरिका वैश्वीकरण एवं पूंजीवाद का समर्थक था इसलिए विश्व के ज्यादातर देशों में पूंजीवादी लोकतंत्र को स्वीकार किया गया जिससे वैश्वीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला

3 पूंजीवाद का प्रभाव:- पूंजीवाद के प्रभाव ने राष्ट्राे को पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाने के लिए प्रेरित किया जिसके परिणामस्वरुप वैश्वीकरण का उदय हुआ

4 नवीन विश्व व्यवस्था की आवश्यकता:- शीतयुद्ध के बाद पुरानी विश्व व्यवस्था भी खत्म हो गई लेकिन समस्याएं वैसी ही बनी रही

समस्याओं के हल के लिए एक ऐसे मॉडल की आवश्यकता थी जो युद्ध को रोक सके, शांति की स्थापना कर सके, राष्ट्राे के विवादों को शांति से हल कर सके, गरीबी को दूर करें, पर्यावरण को संतुलित बनाए, आदि

इन सब समस्याओं को दूर करने के लिए 'नए विश्व संरचना के मॉडल' को माना गया और इसे वैश्वीकरण का नाम दिया गया

5 उन्नत प्रौद्योगिकी (technology):- उन्नत प्रौद्योगिकी को वैश्वीकरण का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है प्रौद्योगिकी के माध्यम से विश्व भर में पारस्परिक जुड़ाव की भावना को बढ़ावा मिला है

नए नए अविष्कारों ने विश्व के विभिन्न देशों के बीच संचार की प्रणाली को बढ़ावा देने का कार्य किया है जिससे विश्व भर में विचार, वस्तुओं, पूंजी एवं व्यक्तियों का प्रवाह प्रौद्योगिकी के कारण बड़ा है

वैश्वीकरण की विशेषताएं

1 भौगोलिक दूरियों का सिमटना:- वैश्वीकरण की प्रक्रिया में यातायात एवं संचार के साधनों में क्रांतिकारी विकास से भौगोलीक दूरियां सिमट गई हैं

2 एक नई संस्कृति का उभरना:- वैश्वीकरण की प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की दूर-दराज तक पहुंच ने एक नई विश्व संस्कृति को उभारा है

जींस, टी-शर्ट, फास्ट फूड, पॉप संगीत, नेट पर चैटिंग आदि तत्वों से बनी एक ऐसी संस्कृति का विकास हुआ है जिससे विश्व के हर देश का युवा प्रभावित हुआ है

3 श्रम बाजार का विश्वव्यापीकरण:- वैश्वीकरण की एक विशेषता श्रम बाजार का विश्वव्यापीकरण (विश्व के level पर होना) भी है

सन 1965 में लगभग 7.5 करोड़ लोग एक देश से दूसरे देश में रोजगार के लिए गए थे वर्तमान में इसमें और भी वृद्धि हुई है

4 शिक्षा का विश्वव्यापीकरण:- वैश्वीकरण में शिक्षा का भी विश्वव्यापीकरण हो गया है इसमें विकासशील देशों में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी दुनिया में किसी भी देश में रोजगार प्राप्त कर सकते हैं

5 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाजाही में लचीलापन:- वैश्वीकरण की प्रक्रिया के द्वारा आज कोई भी जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, बैंकर आदि का विदेश में आना-जाना भी सरल व लचीला हो गया है

6 बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सक्रियता (Active होना):- इस प्रक्रिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सक्रियता बढ़ गई है यह कंपनियां पहले सिर्फ वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी आदि की आवाजाही में मदद करती थी लेकिन अब विशेषज्ञों (Specialist), कुशल तथा अर्ध कुशल श्रमिक आदि की नियुक्तियों (Selection) में भी अहम भूमिका को निभाती है

7 रोजगार में बढ़ोतरी:- वैश्वीकरण के कारण श्रम बाजार की मांगों को पूरा करने के लिए श्रम बाजार को अंतराष्ट्रीय स्तर पर लाया गया जिससे करोड़ों व्यक्तियों को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए

8 प्रौद्योगिकी (technology) में बढ़ोतरी:- वैश्वीकरण के कारण जिन देशों में पहले निम्न स्तर की प्रौद्योगिकी हुआ करती थी अब वह भी विकसित देशों की सहायता से उच्च स्तर के प्रौद्योगिकी का विकास कर रहे हैं

वैश्वीकरण के गुण / लाभ / महत्व

1 जीवन स्तर में वृद्धि:- वैश्वीकरण से जीवन स्तर में वृद्धि होती है क्योंकि उपभोक्ता (customer) को उत्तम किस्म (quality) की चीजें कम मूल्य (दाम) पर मिल जाती हैं जिससे जीवन स्तर बेहतर होता है

2 विदेशों में रोजगार के अवसर:- वैश्वीकरण से एक देश के लोग दूसरे देश में रोजगार प्राप्त करने में सक्षम होते हैं जिससे रोजगार के अवसर में वृद्धि होती है

3 विदेशी विनियोजन:- वैश्वीकरण के विकसित राष्ट्र अपनी अतिरिक्त (extra) पूंजी (money) अर्धविकसित या विकासशील राष्ट्रों में लगाते हैं जिसके कारण विदेशी पूंजी के आने से इन देशों का विकास बड़ी मात्रा में हुआ है

4 तीव्र आर्थिक विकास:- वैश्वीकरण से हर राष्ट्र को दूसरे राष्ट्राे से तकनीक, ज्ञान के आदान-प्रदान का अवसर मिलता है तथा विदेशी पूंजी का विनियोजन (Spending) बढ़ता है जिससे अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास होता है

5 नवीन (new) तकनीकों का आना:- वैश्वीकरण की प्रक्रिया के द्वारा विदेशी पूंजी का निवेश बढ़ता है एवं एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्रों में नवीन तकनीकों का आवागमन (आना-जाना) होता है जिससे विकासशील राष्ट्रों का विकास होता है

6 विदेशी व्यापार में वृद्धि:- आयात-निर्यात पर लगे अनावश्यक प्रतिबंध (tax आदि) वैश्वीकरण की प्रक्रिया में खत्म या कम हो जाते हैं जिससे विदेशी व्यापार में वृद्धि होती है

7 विदेशी मुद्रा कोष में वृद्धि:- जिस राष्ट्र का उत्पादन श्रेष्ठ किस्म का, पर्याप्त मात्रा में होता है उसका निर्यात (export) व्यापार तेजी से बढ़ता है परिणामस्वरूप (जिसके कारण) विदेशी मुद्रा कोष (bank) में वृद्धि होती है

वैश्वीकरण के दोष / दुष्परिणाम

1 देशी उद्योगों का पतन (नष्ट होना):- वैश्वीकरण के कारण स्थानीय उद्योग धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं विदेशी माल की प्रतियोगिता के सामने देशी उद्योग टिक नहीं पाते हैं उनका माल बिक नहीं पाता है यही कारण है कि देश में कई उद्योग बंद हो गए हैं या बंद होने की कगार पर है

2 बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभुत्व:- वैश्वीकरण के कारण विदेशी कंपनियों के आगे देश के कंपनियां टिक नहीं पाती हैं

3 बेरोजगारी में वृद्धि:- वैश्वीकरण के कारण स्थानीय उद्योग बंद होते जा रहे हैं जिससे बेरोजगारी बढ़ रही है

4 राष्ट्र प्रेम की भावना को आघात (चोट):- वैश्वीकरण के बाद लोगाे को विदेशी चीजों का उपभोग ( उपयोग ) करना, शान बढ़ाना लगता है और देसी चीजों को घटिया समझते हैं

5 आर्थिक परतंत्रता (गुलामी):- वैश्वीकरण के कारण पिछड़े हुए राष्ट्र को विकसित राष्ट्र अपना गुलाम बना रहे हैं इसके कारण पिछड़े हुए देश को उनकी हर बात मानने के लिए मजबूर होना पड़ता है

वैश्वीकरण की आलोचना : असहमति और विरोध

1 वैश्वीकरण विरोधी सभी आलोचकों (बुराई करने वाले) का मानना है कि 20वीं शताब्दी के आखरी वर्षों में विश्व के बड़े शासकों ने अपने मतलब के लिए विश्व बाजार का प्रसार (बढ़ाना) किया

2 ब्रेटेन वुड्स संस्थाओं, पश्चिम व पूर्व के विकसित देश और बहुराष्ट्रीय कंपनियां आदि ने मिलकर विश्व पर वैश्वीकरण थोपा है

3 आलोचकों का मानना है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में श्रमिकों की सुरक्षा, श्रमिकों को काम पर लगाने व मुआवजा (salary) देने के मानको (rule) और स्वतंत्रता की शर्तों का उल्लंघन (नहीं मानना) करती है

4 कई आलोचकों का मानना है कि पिछले 30 सालों में विकासशील देशों के बाजार की बनावट और उनका आकार बहुत तेजी से बदला है

5 वैश्विक स्तर पर 'पीपल्स ग्लोबल एक्शन नेटवर्क' और 'विश्व सामाजिक मंच' के द्वारा वैश्वीकरण के विरुद्ध कदम उठाए गए हैं

6 वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन का एक बड़ा माध्यम इंटरनेट और न्यूज़ मीडिया भी है और वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन कई नामों से जाने जाते हैं जैसे:- वैश्विक न्याय आंदोलन, वैकल्पिक वैश्वीकरण आंदोलन, कॉर्पोरेट विरोधी वैश्वीकरण आंदोलन आदि

7 राष्ट्रवादी समर्थकों का मानना है कि वैश्वीकरण के विकल्प मे राष्ट्रीय-राज्य की संस्था को खड़ा करना चाहिए

8 "नो लोगों" पुस्तक वैश्वीकरण के आलोचकों की घोषणा पत्र की तरह बन गई है

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