मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)
🔴 मौलिक अधिकारो (Fundamental Rights) का परिचय
मौलिक अधिकार नागरिकों के जीवन जीने के लिए बहुत आवश्यक हैं और यह लोगों के विकास के लिए भी जरूरी है। जिसका उल्लेख भारतीय संविधान भारतीय के भाग- III में 12 से 35 अनुच्छेद में मिलता है:-मौलिक अधिकार
- समता का अधिकार (समानता का अधिकार), (अनुच्छेद 14-18)
- स्वतंत्रता का अधिकार, (अनुच्छेद 19-22)
- शोषण के विरुद्ध अधिकार, (अनुच्छेद 23-24)
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, (अनुच्छेद 25-28)
- संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार, (अनुच्छेद 29-30)
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार, (अनुच्छेद 32)
- संपत्ति का अधिकार
1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
- कानून के समक्ष समानता
- कानूनों के समान संरक्षण
- धर्म, जाति, लिंग, या स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध (ban)
- दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सडक आदि में प्रवेश की समानता
- छुआछूत का अंत
- उपाधियों का अंत
2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- भाषण और अभिव्यक्ति का अधिकार
- शांतिपूर्ण ढंग से जमा होने और सभा करने का अधिकार
- संगठित होने का अधिकार
- भारत में कहीं भी आने जाने का अधिकार
- भारत के किसी भी हिस्से में रहने या बसने का का अधिकार
- कोई भी पेशा (काम) चुनने या व्यापार करने का अधिकार
- अपराधों के लिए दोष सिद्ध होने तक संरक्षण का अधिकार
- जीवन की रक्षा और दैहिक (शारीरिक) स्वतंत्रता का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- अभियुक्तों (अपराधी) और सजा पाए लोगों के अधिकार
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
- मानव के दुर्व्यापार और बंधुआ मज़दूरी पर रोक
- जोखिम वाले कामों में बच्चों से मज़दूरी करने पर रोक
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
- आस्था और प्रार्थना की आज़ादी
- धार्मिक मामलों के प्रबंधन
- किसी विशिष्ट धर्म की वृद्धि के लिए कर (tax) चुकाने की स्वतंत्रता
- कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या उपासना में उपस्थित होने की स्वतंत्रता
5. संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
- अल्पसंख्यकों की भाषा और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार
- अल्पसंख्यकों को शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार
6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
- मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिये न्यायालय में जाने का अधिकार
🔴 समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 और 18)
> विधि (कानून) के समक्ष समता: अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि भारत के किसी क्षेत्र मे व्यक्ति को विधि (कानून) मे समानता से वंचित नहीं किया जाएगा। वह देश का नागरिक हो या विदेशी सब पर यह अधिकार लागू होता है।
इसके अतिरिक्त इसमे संवैधानिक निगम, कंपनियाँ, पंजीकृत समितियाँ या किसी भी अन्य प्रकार का समूह सम्मिलित है।
अपवाद: अनुच्छेद 361 के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पद अवधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्यवाही चालू नहीं की जा सकती है।
अनुच्छेद 361-A के अनुसार, कोई भी व्यक्ति यदि संसद या राज्य विधानसभा दोनों की सत्य कार्यवाही से संबंधित प्रकाशन समाचार-पत्र में करता है तो उस पर किसी भी प्रकार का मुकदमा देश के किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकता है।
अनुच्छेद 105 के अनुसार, संसद या उसकी समिति में किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या मत के विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
अनुच्छेद 194 के अनुसार, विधानमंडल या उसकी समिति में किसी सदस्य द्वारा कही गई बात या मत के विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
विदेशी शासक, राजदूत एवं कूटनीतिज्ञ आदि मुकदमों से मुक्त होंगे।
> भेदभाव पर रोक: अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य द्वारा किसी नागरिक के प्रति धर्म, वंश, जाति, लिंग या स्थान को लेकर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
अपवाद: महिलाओं, बच्चों, पिछड़े लोगों या अनुसूचित जाति या जनजाति के विकास (जैसे- आरक्षण और मुफ्त शिक्षा तक पहुँच) के लिये कुछ प्रावधान किये जा सकते हैं।
> सार्वजनिक विषय में अवसर की समानता: अनुच्छेद 16 के अनुसार, राज्य के किसी पद के लिए सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।
अपवाद: राज्य आरक्षण का प्रावधान करता है या पद को पिछड़े वर्ग के लिए बना सकता है जिसका समान प्रतिनिधित्व नहीं है।
इसके अतिरिक्त किसी संस्था या इसके कार्यकारी परिषद के सदस्य या किसी भी धार्मिक आधार पर व्यवस्था की जा सकती है।
> अस्पृश्यता का अंत: अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता निषेध (ban) है। और अस्पृश्यता के अपराध मे व्यक्ति को संसद या विधानसभा के चुनाव के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है।
अपराध निम्नलिखित हैं:-
> उपाधियों का अंत: अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत करता है और इस संबंध में चार प्रावधान करता है:-
1. वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:- यह प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दर्शाने, मत देने, विश्वास एवं अभियोग लगाने की मौखिक, लिखित, छपे हुए मामलों पर स्वतंत्रता देता है।
2. शांतिपूर्वक सम्मेलन में भाग लेने की स्वतंत्रता:- किसी भी नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक संगठित होने का अधिकार है। इसमें बैठकों में भाग लेने एवं प्रदर्शन शामिल होने का अधिकार भी है। अंतः यह स्वतंत्रता हिंसा, अव्यवस्था, गलत संगठन एवं सार्वजनिक शांति भंग करने के लिये नहीं है।
3. संघ बनाने का अधिकार:- इसमें राजनीतिक दल बनाने का अधिकार, कंपनी, साझा फर्म, समितियाँ, क्लब, संगठन, व्यापार संगठन या लोगों की अन्य इकाई बनाने का अधिकार शामिल है।
4. संचरण की स्वतंत्रता का अधिकार:- संचरण की स्वतंत्रता के दो भाग हैं- आंतरिक (देश में संचरण, अनुच्छेद 19) और बाहरी (देश के बाहर घूमने का अधिकार तथा देश में वापस आने का अधिकार, अनुच्छेद 21)।
5. निवास का अधिकार:- नागरिकों को देश मे कही भी निवास करने की स्वतंत्रता है परंतु जनजातीय क्षेत्रों में उनकी संस्कृति एवं रिवाज के आधार पर बाहर के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है।
6. व्यवसाय की स्वतंत्रता का अधिकार:- नागरिकों को कोई भी कार्य करने का अधिकार है परंतु इसमें कोई अनैतिक कार्य शामिल नहीं है जैसे- महिलाओं या बच्चों का दुरुपयोग या खतरनाक व्यवसाय।
> अपराध के लिए दोषसिद्धि में संरक्षण: अनुच्छेद 20 दोषी व्यक्ति को अतिरिक्त दंड से संरक्षण प्रदान करता है। चाहे वह देश का नागरिक हो या विदेशी। इसमें तीन व्यवस्थाएँ की गई हैं:-
> प्राण एवं दैहिक (शारीरिक) स्वतंत्रता: अनुच्छेद 21 के अनुसार व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से कानून द्वारा प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिए है।
विदेशी शासक, राजदूत एवं कूटनीतिज्ञ आदि मुकदमों से मुक्त होंगे।
> भेदभाव पर रोक: अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य द्वारा किसी नागरिक के प्रति धर्म, वंश, जाति, लिंग या स्थान को लेकर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
अपवाद: महिलाओं, बच्चों, पिछड़े लोगों या अनुसूचित जाति या जनजाति के विकास (जैसे- आरक्षण और मुफ्त शिक्षा तक पहुँच) के लिये कुछ प्रावधान किये जा सकते हैं।
> सार्वजनिक विषय में अवसर की समानता: अनुच्छेद 16 के अनुसार, राज्य के किसी पद के लिए सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।
अपवाद: राज्य आरक्षण का प्रावधान करता है या पद को पिछड़े वर्ग के लिए बना सकता है जिसका समान प्रतिनिधित्व नहीं है।
इसके अतिरिक्त किसी संस्था या इसके कार्यकारी परिषद के सदस्य या किसी भी धार्मिक आधार पर व्यवस्था की जा सकती है।
> अस्पृश्यता का अंत: अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता निषेध (ban) है। और अस्पृश्यता के अपराध मे व्यक्ति को संसद या विधानसभा के चुनाव के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है।
अपराध निम्नलिखित हैं:-
- अस्पृश्यता का प्रचार करना।
- व्यक्ति को किसी भी दुकान, होटल, सार्वजनिक पूजा स्थल और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थान में प्रवेश करने से रोकना।
- अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों या छात्रावासों में प्रवेश से रोकना।
- अस्पृश्यता को उचित (सही) ठहराना।
- अनुसूचित जाति का अपमान करना।
> उपाधियों का अंत: अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत करता है और इस संबंध में चार प्रावधान करता है:-
- राज्य सेना या शिक्षा संबंधी सम्मान के अलावा और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
- भारत का कोई नागरिक विदेशी उपाधि प्राप्त नहीं करेगा।
- कोई विदेशी, राज्य के किसी पद को धारण करने वाला विदेशी राज्य से कोई भी उपाधि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता है।
- राज्य के पद धारण करने वाला व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से कोई भेंट, उपलब्धि या पद आदि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकता है।
🔴 स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19, 20, 21 और 22)
> 6 अधिकारों का संरक्षण: अनुच्छेद 19 सभी नागरिकों को स्वतंत्रता के छह अधिकारों की गारंटी देता है:-1. वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:- यह प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दर्शाने, मत देने, विश्वास एवं अभियोग लगाने की मौखिक, लिखित, छपे हुए मामलों पर स्वतंत्रता देता है।
2. शांतिपूर्वक सम्मेलन में भाग लेने की स्वतंत्रता:- किसी भी नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक संगठित होने का अधिकार है। इसमें बैठकों में भाग लेने एवं प्रदर्शन शामिल होने का अधिकार भी है। अंतः यह स्वतंत्रता हिंसा, अव्यवस्था, गलत संगठन एवं सार्वजनिक शांति भंग करने के लिये नहीं है।
3. संघ बनाने का अधिकार:- इसमें राजनीतिक दल बनाने का अधिकार, कंपनी, साझा फर्म, समितियाँ, क्लब, संगठन, व्यापार संगठन या लोगों की अन्य इकाई बनाने का अधिकार शामिल है।
4. संचरण की स्वतंत्रता का अधिकार:- संचरण की स्वतंत्रता के दो भाग हैं- आंतरिक (देश में संचरण, अनुच्छेद 19) और बाहरी (देश के बाहर घूमने का अधिकार तथा देश में वापस आने का अधिकार, अनुच्छेद 21)।
5. निवास का अधिकार:- नागरिकों को देश मे कही भी निवास करने की स्वतंत्रता है परंतु जनजातीय क्षेत्रों में उनकी संस्कृति एवं रिवाज के आधार पर बाहर के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है।
6. व्यवसाय की स्वतंत्रता का अधिकार:- नागरिकों को कोई भी कार्य करने का अधिकार है परंतु इसमें कोई अनैतिक कार्य शामिल नहीं है जैसे- महिलाओं या बच्चों का दुरुपयोग या खतरनाक व्यवसाय।
> अपराध के लिए दोषसिद्धि में संरक्षण: अनुच्छेद 20 दोषी व्यक्ति को अतिरिक्त दंड से संरक्षण प्रदान करता है। चाहे वह देश का नागरिक हो या विदेशी। इसमें तीन व्यवस्थाएँ की गई हैं:-
- व्यक्ति को अपराध तब तक दोषी नहीं ठहराया जाएगा, जब तक वह किसी कानून का उल्लंघन नही करता है।
- व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जाएगा।
- अपराध के लिए व्यक्ति को अपने विरुद्ध साक्षी (Witness) होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
> प्राण एवं दैहिक (शारीरिक) स्वतंत्रता: अनुच्छेद 21 के अनुसार व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से कानून द्वारा प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिए है।
> शिक्षा का अधिकार: अनुच्छेद 21(A) के अनुसार राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क (free) शिक्षा कराएगा।
यह प्रावधान 86वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत किया गया था। 86वें संशोधन से पहले भी संविधान में भाग IV के अनुच्छेद 45 के तहत बच्चों के लिये निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान था। अंतः यह प्रावधान केवल आवश्यक शिक्षा के मौलिक अधिकार मे आता है।
> गिरफ्तारी से संरक्षण: अनुच्छेद 22 किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान करता है। गिरफ्तारी दो तरह की होती है:-
1. दंड विषयक गिरफ्तारी, एक व्यक्ति, जिसने अपराध स्वीकार कर लिया है और न्यायालय में उसे दोषी ठहराया जा चुका है, को दंड देती है।
2. निवारक गिरफ्तारी वह है, जिसमें बिना सुनवाई के न्यायालय में दोषी ठहराया जाए।
अनुच्छेद 22 भाग 1 साधारण कानून से संबंधित है:-
- गिरफ्तार करने पर सूचना देने का अधिकार।
- विधि व्यवसायी से परामर्श और प्रतिरक्षा करने का अधिकार।
- दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) के सामने 24 घंटे के अंदर (यात्रा के समय को मिलाकर) पेश होने का अधिकार।
- दंडाधिकारी द्वारा बिना अतिरिक्त गिरफ्तारी के 24 घंटे में रिहा करने का अधिकार।
- किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की अवधि तीन महीने से अधिक नहीं बढ़ाई जा सकती, जब तक उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश इस बारे में कारण न बताएँ।
- गिरफ्तारी का आधार व्यक्ति को बताया जाना चाहिये।
- गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि गिरफ्तारी के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करें।
