मध्यकालीन यूरोप मे सांस्कृतिक पैटर्न, क्रिस्टिलिकरण: जीवन और विचार
🔴सांस्कृतिक पैटर्न का परिचय
यूरोपीय इतिहास में 600 से 1500 ई. तक की अवधि को ‘मध्य युग' के रूप में जाना जाता है।9वी शताब्दी तक पश्चिमी रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। और ईसाई परंपराएँ इतनी प्रमुख हो गई थीं कि यूरोप शब्द के स्थान पर 'ईसाईजगत' शब्द का प्रयोग किया जाने लगा था।
इस अवधि के दौरान इस्लाम और लंबी दूरी के व्यापार ने भी यूरोप की सांस्कृती को प्रभावित किया। और लोगों के प्रवास के कारण विविध स्थानों की सांस्कृती को समझने भी मदद मिली।
मध्यकालीन युग साहित्यिक और बौद्धिक गतिविधियों, कला तथा वास्तुकला में उन्नति का काल था। और इसी समय पश्चिमी यूरोप में अरस्तू और अन्य शास्त्रीय लेखन के आने से इस काल को 'बारहवीं शताब्दी के पुनर्जागरण' के रूप में भी जाना जाता है।
🔴 साहित्यिक और बौद्धिक विकास
ईसाई पादरियों ने ग्रीक और लैटिन लिपियों को लोकप्रिय बनाया था। और इसी दोरन कई प्रकार की भाषाएँ और बोलियाँ विकसित हुई। अंतः लैटिन व्यापार, आनंद और बातचीत का एकमात्र माध्यम बन गई थी, जबकि देशी भाषाओं ने साहित्यिक संस्कृतियों को दूर-दूर तक फैलाया।फ्रेंच, स्पेनिश, इटालियन और जर्मन जैसी देशी भाषाओं में भी साहित्यिक विकास हुआ। इसका प्रमुख कारण साहित्य को अपनी मातृभाषा में व्यक्त करने की इच्छा थी।
कैरोलिंगियन, शारलेमेन आदि शासको ने शास्त्रीय कविता और शिक्षा को संरक्षण दिया। क्योंकि शास्त्रीय शिक्षा को ईसाई ज्ञान का आधार भी माना जाता था तथा यह मोक्ष के लिए बहुत आवश्यक था।
औपचारिक शिक्षा मठों और उनसे जुड़े स्कूलों तक ही सीमित थी। लेकिन 12 वीं शताब्दी के अंत तक फ्रांस, इटली और इंग्लैंड में कई स्थानों पर कैथेड्रल स्कूल और विश्वविद्यालय स्थापित किए गए।
शारलेमेन शासक ने पादरियों को शिक्षित करने के लिए स्कूलों को विकसित किया ताकि वे ईसाई आदर्शों को जनता तक पहुँचा सकें इसलिए उसने दूर-दूर से विद्वानों को भी बुलाया था। अंतः इन विद्वानों ने शास्त्रीय ग्रंथों को एकत्र किया, मिलान किया, सुधार किया और उनकी बहुत सी नक़ल भी तैयार की।
शारलेमेन शासक ने व्याकरण, आख्यान (कहानी लेखन), खगोल विज्ञान (astronomy) और धर्मशास्त्र में विशेष रुचि ली थी। और जर्मनिक और रोमांस भाषाओं की प्राचीन कविताओं का लेखन भी शुरू करवाया था।
अभिजात वर्ग ने विद्वानों को संरक्षण देने में शासकों का अनुकरण (नकल) किया। इसलिए “दर्पण ग्रंथ” भिक्षुओं, शासकों तथा अभिजात वर्ग द्वारा संरक्षण प्राप्त पुजारियों द्वारा लिखे गए थे।
बहुत सी राजकुमारियों ने भी साहित्यिक संस्कृति में भाग लिया था। उदाहरण के लिए “राजकुमा अन्ना कॉमनेना” ने अपने पिता राजा “एलेक्सियस” की जीवनी लिखी थी।
सैनिकों को प्रेरित करने के लिए लैटिन और देशी दोनों भाषाओं में धर्मयुद्ध गीतों की रचना की गई।
संरक्षण प्राप्त करने के लिए कवियों और लेखकों के बीच प्रतिस्पर्धा (मुकाबला) भी होने लगी थी। जिसमे अभिजात वर्ग शीर्ष पर था, उसके बाद पुजारियों और कम रईसों का स्थान था। महिला कवियित्री बहुत कम थीं और शूरवीर कुलीनों का इस क्षेत्र में बहुत कम योगदान था।
🔴 कला और वास्तुकला (architecture)
कैरोलिंगियन काल मे स्मारकीय वास्तुकला का विकास हुआ। क्योंकि लगभग 100 शाही आवासों का निर्माण या परिवर्तन किया गया, 27 कैथेड्रल बनाए गए और कई मठों का विस्तार किया गया था।कैरोलिंगियन वास्तुकला में रोमन बेसिलिका (महल), विजयी मेहराब (गुंबद) और पैलेटाइन चैपल का प्रभाव देखा जा सकता है।
रोमन बेसिलिका (महल) विजयी मेहराब (गुंबद) पैलेटाइन चैपल
कैरोलिंगियन चर्चों में बड़ी अर्ध गोलाकार आवृत्तियाँ थी, जो गुंबददार थी और बड़े पैमाने पर संगमरमर तथा प्लास्टर से सजाए गई थी। और कैरोलिंगियन शासकों ने ईसाई चर्च से जुड़े अनुष्ठानो में संगीत को भी बढ़ावा दिया था।
पूर्वी यूरोप में बड़ी संख्या में छोटे आकार के चर्चों का निर्माण किया गया था। और इन्हें फ्रेस्को पेंटिंग और मोज़ाइक से सजाया गया था।
फ्रेस्को पेंटिंग मोज़ाइक रोमनस्क्यू शैली
कला और वास्तुकला चर्च के इर्द-गिर्द घूमती थी। इसलिए चर्च के प्रभुत्व और अधिकार का दिखावा करने के लिए कला को और लोकप्रिय बनाया गया।
कला ने ईसाई धर्म के दार्शनिक पहलुओं को समझाने का काम किया। और इसने ईसाई जीवन की दिव्य, अनदेखी और पिछली घटनाओं को दर्शाया। क्योंकि ये आम लोगों को समझाने के लिए अधिक बेहतर थी
वास्तुशिल्प को दो अलग-अलग शैलियों (तरीकों) में विभाजित किया गया है: रोमनस्क्यू और गोथिक। रोमनस्क्यू शैली एक बदली हुई रोमन वास्तुकला है। जबकि गोथिक शैली को 12 वीं शताब्दी के बदलावो का परिणाम माना जाता है।
वास्तुकला की रोमनस्क्यू शैली की प्रमुख विशेषताओं में गोल मेहराब, विशाल दीवारें और बड़े सहायक स्तंभ, छोटी खिड़कियाँ और क्षैतिज रेखाएँ शामिल हैं। आंतरिक भाग या तो सादे थे या चमकीले रंगों में मोज़ाइक और भित्तिचित्रों से सजाए गए थे। और रचना के बाहरी और आंतरिक दोनों में सजावटी मूर्तियाँ स्थापित की गईं।
गॉथिक शैली का उदय 12 वीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस में हुआ। इसमें नुकीले मेहराब, रिब्ड वॉल्टिंग और फ्लाइंग बट्रेस शामिल हैं। और रोमनस्क्यू शैली की तुलना में, गोथिक शैली ने ऊँची और हल्की इमारतों के निर्माण को संभव बनाया।

गॉथिक शैली की संरचनाओ मे बड़े पैमाने पर खिड़कियों होती हैं। और खिड़कियों के रंगीन शीशों से सूरज की रोशनी संरचनाओं में प्रवेश करती है। तथा संरचनाओ के आगे के भाग मूर्तियों और आदिकालीन साहित्य की आकृतियों से सजे होते थे।
गॉथिक शैली ने धार्मिक संरचनाओं में भी धर्मनिरपेक्ष विषयों को शामिल किया। क्योंकि इसमे क्राइस्ट, वर्जिन मैरी, वनस्पतियों और प्राकृतिक जीवों का शामिल किया गया है।
अधिकांश गॉथिक संरचनाएँ शहरी केंद्रों में स्थित हैं। यह इंगित करता है कि यह शहरी जीवन के प्रतीक थे और शहर का गौरव थे।
कृषि के क्षेत्र में भी तकनीकी नवाचार हुए। जैसे बैलों या घोड़ों की एक जोड़ी द्वारा खींचे जाने वाले भारी पहियों के हल (जिसमे लोहे की फाल होती थी) से उत्तरी यूरोप की गीली मिट्टी में जुताई संभव हो गई।
900 ई. मे घोड़े के खुरों की रक्षा के लिए लोहे की नाल लोकप्रिय (famous) हो गई और 1050 ई. के आसपास विकसित नए टेंडेम हार्नेस को घोड़ों की गर्दन के चारों ओर रखा जा सकता था। इन दोनों नवाचारों ने घोड़ों की भारी वस्तुओं को खींचने की शक्ति में सुधार किया।
हाथ से चलने वाले औजारों में सुधार लौह के साथ आया। अब लोहे के फावड़े, लकड़ी के फावड़े की तुलना में अधिक प्रभावी थे। और लोहे की दराँती ने कटाई को ओर आसान बना दिया था।
व्हीलब्रो (ठेला) ने वस्तुओं को ले जाने में सुविधा प्रदान की। और हल जोतने के बाद हैरो ने जमीन को समतल करने में मदद की।

खाद्य प्रसंस्करण (Food processing) और पेपर पल्प (कागज का ज्ञान चीन से इस्लामिक दुनिया और वहाँ से यूरोप तक पहुँचा) के उत्पादन के लिए पनचक्कियों में सुधार किया गया था। अंतः 1170ई मे हॉलैंड में पवन चक्कियों का विकास हुआ।
13 वीं शताब्दी के अंत तक लंबवत पेडल चरखा लोकप्रिय हो गया। और 14 वीं शताब्दी के अंत तक बड़े पैमाने पर ढलवाँ लोहे का उत्पादन होने लगा। क्योंकि युद्ध तकनीक में बदलाव और कृषि उपकरणों की माँग ने धातुकर्म उद्योग में सुधार किया।
यांत्रिक घड़ियाँ 13 वीं शताब्दी के बाद में विकसित हुईं और 14 वीं शताब्दी तक लोकप्रिय हो गईं।



तकलंबवत पेडल चरखा गियरिंग तंत्र घोड़े की रकाब

8 वीं शताब्दी से पहले कैरोलिंगियन राजा “चार्ल्स मार्टेल” के शासन के दौरान रकाब का उपयोग शुरू हुआ। जिससे घोड़े की रकाब ने यूरोपीय सवार को मजबूत पकड़ प्रदान की। और रकाब ने सवार और घोड़े को एक लड़ने वाली सेना बना दिया| इस सेना को ‘माउंटेड शॉक कॉम्बैट' के रूप में जाना जाता था।
गनपाउडर ने इस्लामी दुनिया के माध्यम से चीन से यूरोप तक यात्रा की। 11 वीं शताब्दी के मध्य में एक “क्रॉसबो” द्वारा तोप का उपयोग किया गया था।
“ट्रेबुचेट पत्थरों” का उत्पादन इंग्लैंड में किया गया था और तोप मे बारूद के गोले के उपयोग से पहले “ट्रेबुचेट पत्थरों” को ही तोप के गोले के रूप में उपयोग किया जाता था।
समुद्री जहाज़ उद्योग में मजबूत पतवारों ने पुराने पतवारों को बदल दिया जिससे जहाजों के आकार और वहन क्षमता में वृद्धि हुई । और चौकोर आकार के पाल के बजाय त्रिकोणीय पाल का उपयोग करके जहाज को आगे बढ़ाने के लिए हवा के बल का बेहतर उपयोग किया गया।
एस्ट्रोलैब और कम्पास के बेहतर उपयोग से समुद्री यात्रा और मानचित्रकला में भी सुधार हुआ।
धर्मयुद्ध मुसलमानों के खिलाफ ईसाइयों को एकजुट करते थे, लेकिन पश्चिमी और पूर्वी यूरोप के बीच घर्षण भी बढ़ाते थे। और इस प्रकार गैर-ईसाइयों का उत्पीड़न शुरू हो गया था।
सर्वोच्च सत्ता के प्रश्न को लेकर चर्च और राज्य के बीच बहुत प्रतिद्वंद्विता (competition) भी थी। और सामंतों ने चर्च की संपत्ति पर अपना नियंत्रण बढ़ाना शुरू कर दिया।
मठ, शूरवीर योद्धा “नाइट” की गतिविधि के केंद्र बन गए। परंतु राजाओं के बिना सामंती कुलीन वर्ग को पोप या बिशप चुनौती नहीं दे सकते थे।
पोप जॉन XII अपने परिवार के प्रभाव के कारण 18 साल की उम्र में पोप (पादरी) बन गए थे। और उन्होंने 50 से ज्यादा सालों तक रोम पर शासन किया।
चर्च दौलत बटोरने का जरिया बन गया था। इसलिए कई बिशप सामंत बन गए, जिनकी अपनी जागीरें थीं।
मदरहाउस के मार्गदर्शन में बड़ी संख्या में ऐसे मठों का गठन हुआ जो सिर्फ ननों के लिए थे।और मठाधीशों, पुरोहितों आदि के पदों को खरीदना और बेचना मना था।
फ्रांस और इटली में धार्मिक रईसों द्वारा सुधार पेश किए गए क्योंकि मजबूत राजशाही न होने से राजा के माध्यम से सुधारों को पेश करना संभव नहीं था।
जर्मनी और इंग्लैंड में ईसाई राजाओं ने अपने कर्तव्य के रूप में मठों की संरचना और संगठन में सुधार किए। सुधारों में मठ में गरीबी, आज्ञाकारिता और शुद्धता का सख्त पालन शामिल था। इन सुधारों से स्थिति में काफी सुधार हुआ।
राजाओं ने सीधे मठाधीश को बिशप की तरह नियुक्त किया और मठ के आदेश पर सभी बाहरी प्रभावों पर रोक लगाई। इसने मठों की अच्छी छवि को बढ़ाया और लोगों ने आध्यात्मिक शांति, चमत्कारी उपचार आदि की तलाश के लिए संतों के तीर्थों की यात्रा शुरू कर दी।
शाही समर्थन से बिशप चर्चों को फैलाने में कामयाब रहे। पोप लियो Ⅳ (1049-54 ई.) द्वारा शुरू किए गए सुधारों ने चर्च को एक संगठन के रूप में विकसित किया।
पोप को पूरे ईसाई चर्च के कानूनी और न्यायिक शासक के साथ-साथ पश्चिमी ईसाईजगत के आध्यात्मिक और सैद्धांतिक नेता के रूप में माना जाना था।
चर्च ने किसी भी धर्मनिरपेक्ष राजा द्वारा बिशप की नियुक्ति पर रोक लगा दी। इसे पोप और राजा के बीच 'अलंकरण संघर्ष' (इंवेस्टीट्यूर कॉनफ्लिक्ट) के रूप में जाना जाता है।
12वीं और 13वीं शताब्दियों के पोपों ने चर्च पर पोपतंत्र के अधिकार को स्थापित करने के लिए बहुत कोशिशे करी। पोप इनोसेंट Ⅲ (तृतीय) ने 'दुनिया में सही व्यवस्था लाने के लिए पूरे ईसाई जगत को एकजुट करने का लक्ष्य रखा था।
पोप के अधिकार को बढ़ाने के लिए, मध्य इटली में ज्यादा भूमि को उसके सीधे नियंत्रण में लाया गया। पोप इनोसेंट Ⅲ को अक्सर पापल स्टेट्स के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। पोप इनोसेंट Ⅲ ने कई मौकों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया।
जर्मनी में उन्होंने अपने उम्मीदवार फ्रेडरिक द्वितीय को सम्राट बनाने में सफलता पाई। इंग्लैंड में, उन्होंने किंग जॉन को कैंटरबरी के बिशप के रूप में अपनी पसंद के व्यक्ति को चुनने करने के लिए मजबूर किया।
13वीं शताब्दी के बाद के पोप, पोप इनोसेंट Ⅲ की तरह अधिकारों का आनंद नहीं ले पाए और पोप तथा राजा के लगातार संघर्ष ने चर्च के अधिकार पर उलटा प्रभाव डाला।
3. धर्मयुद्ध (क्रूसेड) और उनका प्रभाव
7वीं और 8वीं शताब्दी की शुरुआत में अरब फैलाव से पूर्वी और पश्चिमी यूरोप दोनों के लिए राजनीतिक खतरे पैदा हो गए। क्योंकि 650 ई. में अरबों ने यरूशलेम पर कब्जा कर लिया और 717 ई. में कॉन्स्टेंटिनोपल को धमकी दी थी।
पश्चिम में उन्होंने स्पेन पर विजय हासिल कर ली थी। जिससे ईसाई जगत और इस्लामी दुनिया के बीच हथियारबंद संघर्ष हुआ। क्योंकि मामला एक धार्मिक स्थान पर जीत का था, इसने धार्मिक रंग ग्रहण कर लिया और ईसाइयों ने इसे धर्मयुद्ध (क्रूसेड) कहा और मुसलमानों ने इसे “जिहाद” कहा।
लगभग 7 धर्मयुद्ध 1095 से 1270 ई0 के बीच लड़े गए। 1095 ई. का पहला धर्मयुद्ध पोप अर्बन Ⅱ और जर्मन राजा हेनरी Ⅳ के बीच सत्ता का संघर्ष था। पोप पश्चिमी ईसाई जगत पर अपना ज्यादा अधिकार स्थापित करना चाहते थे। धर्मयुद्ध का यूरोपीय समाज पर भी प्रतिकूल (बुरा) प्रभाव पड़ा। इसने ईसाई राज्यों को कमजोर कर दिया और राष्ट्रीय शत्रुता को भी कुछ हद तक बढ़ावा दिया।
जर्मनी और फ्रांसीसी एक-दूसरे के विरोधी हो गए। लैटिन और ग्रीक दुनिया के बीच एक रुकावट पैदा हो गई। पश्चिम ने विश्वास करना शुरू कर दिया कि बाइजेंटाइन साम्राज्य धर्मयुद्ध की सफलता के रास्ते में एक रुकावट था। क्योंकि इसने ईसाइयों और मुसलमानों के बीच संघर्ष को गहरा करने के अलावा पूर्वी यूरोप को काफी हद तक नष्ट कर दिया था।
कुछ मठ आंदोलन जैसे कार्थुसियन और सिस्टरसियन को चर्च द्वारा स्वीकृत किया गया था। कैथारिज्म और वाल्डेनसियनवाद जैसे अन्य आंदोलन जिन्होंने खुले तौर पर चर्च की आलोचना (बुराई) की थी, उन्हें अस्वीकार कर दिया गया।
डोमिनिकन और फ्रांसिस्कन जैसे आंदोलन फले-फूले क्योंकि वे चर्च के प्रति आज्ञाकारी बने रहे। कार्थुसियन के भिक्षु अलग-अलग कोठरियों में रहते थे, माँस से दूर रहते थे और रोटी, नमक और पानी पर हर हफ्ते तीन दिन उपवास करते थे।
उन्होंने जीसस और वर्जिन मैरी की पूजा पर जोर दिया। इस आंदोलन की लोकप्रियता इसलिए थी क्योंकि पहली बार एक महिला को पश्चिमी यूरोप की धार्मिक योजना में सम्मान का स्थान दिया गया था।
फ्रांस में कई जगहों पर ‘नोट्रे डेम’ या 'आवर लेडी' के नाम से चर्च बनाए गए। उनका मानना था कि ईसाई धर्म के सच्चे मूल्यों को एकांत में खोजा जा सकता है। वे शारीरिक श्रम में भी विश्वास करते थे और आर्थिक उत्पादन में भाग लेते थे।
कैथारिज्म उत्तरी इटली और दक्षिणी फ्रांस में लोकप्रिय था और ज्यादातर तपस्वी प्रथाओं में विश्वास करता था। वे सीधे ईसाई धर्म से नहीं जुड़े थे। उन्होंने अपने खुदके धर्मशास्त्र, पादरियों और कर्मकांडों को विकसित किया।
वाल्डेनसियनवाद दक्षिणी फ्रांस, उत्तरी इटली और जर्मनी में लोकप्रिय था। उन्होंने ईसाई अच्छे समाचारों का अनुवाद (Translation) और अध्ययन किया, उनका प्रचार किया और गरीबी का जीवन बिताया। उन्होंने चर्च की आज्ञा के बिना प्रचार किया। इस वजह से उन्हें चर्च की आज्ञा का उल्लंघन करने के लिए धर्म विरोधी घोषित किया गया।
वास्तुकला की रोमनस्क्यू शैली की प्रमुख विशेषताओं में गोल मेहराब, विशाल दीवारें और बड़े सहायक स्तंभ, छोटी खिड़कियाँ और क्षैतिज रेखाएँ शामिल हैं। आंतरिक भाग या तो सादे थे या चमकीले रंगों में मोज़ाइक और भित्तिचित्रों से सजाए गए थे। और रचना के बाहरी और आंतरिक दोनों में सजावटी मूर्तियाँ स्थापित की गईं।
गॉथिक शैली का उदय 12 वीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस में हुआ। इसमें नुकीले मेहराब, रिब्ड वॉल्टिंग और फ्लाइंग बट्रेस शामिल हैं। और रोमनस्क्यू शैली की तुलना में, गोथिक शैली ने ऊँची और हल्की इमारतों के निर्माण को संभव बनाया।
गॉथिक शैली की संरचनाओ मे बड़े पैमाने पर खिड़कियों होती हैं। और खिड़कियों के रंगीन शीशों से सूरज की रोशनी संरचनाओं में प्रवेश करती है। तथा संरचनाओ के आगे के भाग मूर्तियों और आदिकालीन साहित्य की आकृतियों से सजे होते थे।
गॉथिक शैली ने धार्मिक संरचनाओं में भी धर्मनिरपेक्ष विषयों को शामिल किया। क्योंकि इसमे क्राइस्ट, वर्जिन मैरी, वनस्पतियों और प्राकृतिक जीवों का शामिल किया गया है।
अधिकांश गॉथिक संरचनाएँ शहरी केंद्रों में स्थित हैं। यह इंगित करता है कि यह शहरी जीवन के प्रतीक थे और शहर का गौरव थे।
🔴 तकनीकी नवाचार (इनोवेशन / नई खोजों)
7 वीं से 14 वीं शताब्दी के मध्य यूरोपीय इतिहास मे कई तकनीकी नवाचारों (नई खोज) को देखा गया है। कुछ नवाचार दुनिया के अन्य हिस्सों से यूरोप मे पहुँचे थे जबकि अधिकतर स्थानीय स्तर पर विकसित हुए थे।कृषि के क्षेत्र में भी तकनीकी नवाचार हुए। जैसे बैलों या घोड़ों की एक जोड़ी द्वारा खींचे जाने वाले भारी पहियों के हल (जिसमे लोहे की फाल होती थी) से उत्तरी यूरोप की गीली मिट्टी में जुताई संभव हो गई।
900 ई. मे घोड़े के खुरों की रक्षा के लिए लोहे की नाल लोकप्रिय (famous) हो गई और 1050 ई. के आसपास विकसित नए टेंडेम हार्नेस को घोड़ों की गर्दन के चारों ओर रखा जा सकता था। इन दोनों नवाचारों ने घोड़ों की भारी वस्तुओं को खींचने की शक्ति में सुधार किया।
हाथ से चलने वाले औजारों में सुधार लौह के साथ आया। अब लोहे के फावड़े, लकड़ी के फावड़े की तुलना में अधिक प्रभावी थे। और लोहे की दराँती ने कटाई को ओर आसान बना दिया था।
व्हीलब्रो (ठेला) ने वस्तुओं को ले जाने में सुविधा प्रदान की। और हल जोतने के बाद हैरो ने जमीन को समतल करने में मदद की।
खाद्य प्रसंस्करण (Food processing) और पेपर पल्प (कागज का ज्ञान चीन से इस्लामिक दुनिया और वहाँ से यूरोप तक पहुँचा) के उत्पादन के लिए पनचक्कियों में सुधार किया गया था। अंतः 1170ई मे हॉलैंड में पवन चक्कियों का विकास हुआ।
13 वीं शताब्दी के अंत तक लंबवत पेडल चरखा लोकप्रिय हो गया। और 14 वीं शताब्दी के अंत तक बड़े पैमाने पर ढलवाँ लोहे का उत्पादन होने लगा। क्योंकि युद्ध तकनीक में बदलाव और कृषि उपकरणों की माँग ने धातुकर्म उद्योग में सुधार किया।
यांत्रिक घड़ियाँ 13 वीं शताब्दी के बाद में विकसित हुईं और 14 वीं शताब्दी तक लोकप्रिय हो गईं।
तकलंबवत पेडल चरखा गियरिंग तंत्र घोड़े की रकाब
8 वीं शताब्दी से पहले कैरोलिंगियन राजा “चार्ल्स मार्टेल” के शासन के दौरान रकाब का उपयोग शुरू हुआ। जिससे घोड़े की रकाब ने यूरोपीय सवार को मजबूत पकड़ प्रदान की। और रकाब ने सवार और घोड़े को एक लड़ने वाली सेना बना दिया| इस सेना को ‘माउंटेड शॉक कॉम्बैट' के रूप में जाना जाता था।
गनपाउडर ने इस्लामी दुनिया के माध्यम से चीन से यूरोप तक यात्रा की। 11 वीं शताब्दी के मध्य में एक “क्रॉसबो” द्वारा तोप का उपयोग किया गया था।
“ट्रेबुचेट पत्थरों” का उत्पादन इंग्लैंड में किया गया था और तोप मे बारूद के गोले के उपयोग से पहले “ट्रेबुचेट पत्थरों” को ही तोप के गोले के रूप में उपयोग किया जाता था।
समुद्री जहाज़ उद्योग में मजबूत पतवारों ने पुराने पतवारों को बदल दिया जिससे जहाजों के आकार और वहन क्षमता में वृद्धि हुई । और चौकोर आकार के पाल के बजाय त्रिकोणीय पाल का उपयोग करके जहाज को आगे बढ़ाने के लिए हवा के बल का बेहतर उपयोग किया गया।
एस्ट्रोलैब और कम्पास के बेहतर उपयोग से समुद्री यात्रा और मानचित्रकला में भी सुधार हुआ।
🔴 मध्यकालीन यूरोप में धर्म
11 वीं से 15 वीं शताब्दी के बीच पश्चिमी यूरोप में पोपतंत्र का प्रमुख शक्ति के रूप में उदय हुआ।धर्मयुद्ध मुसलमानों के खिलाफ ईसाइयों को एकजुट करते थे, लेकिन पश्चिमी और पूर्वी यूरोप के बीच घर्षण भी बढ़ाते थे। और इस प्रकार गैर-ईसाइयों का उत्पीड़न शुरू हो गया था।
सर्वोच्च सत्ता के प्रश्न को लेकर चर्च और राज्य के बीच बहुत प्रतिद्वंद्विता (competition) भी थी। और सामंतों ने चर्च की संपत्ति पर अपना नियंत्रण बढ़ाना शुरू कर दिया।
मठ, शूरवीर योद्धा “नाइट” की गतिविधि के केंद्र बन गए। परंतु राजाओं के बिना सामंती कुलीन वर्ग को पोप या बिशप चुनौती नहीं दे सकते थे।
पोप जॉन XII अपने परिवार के प्रभाव के कारण 18 साल की उम्र में पोप (पादरी) बन गए थे। और उन्होंने 50 से ज्यादा सालों तक रोम पर शासन किया।
चर्च दौलत बटोरने का जरिया बन गया था। इसलिए कई बिशप सामंत बन गए, जिनकी अपनी जागीरें थीं।
1. ईसाई चर्च के सुधार
चर्च में कमी के कारण 10वीं शताब्दी में कई सुधार शुरू हुए। इन सुधारों का उद्देश्य मठों को स्थानीय रईसों और बिशपों के प्रभाव से मुक्त रखना था।मदरहाउस के मार्गदर्शन में बड़ी संख्या में ऐसे मठों का गठन हुआ जो सिर्फ ननों के लिए थे।और मठाधीशों, पुरोहितों आदि के पदों को खरीदना और बेचना मना था।
फ्रांस और इटली में धार्मिक रईसों द्वारा सुधार पेश किए गए क्योंकि मजबूत राजशाही न होने से राजा के माध्यम से सुधारों को पेश करना संभव नहीं था।
जर्मनी और इंग्लैंड में ईसाई राजाओं ने अपने कर्तव्य के रूप में मठों की संरचना और संगठन में सुधार किए। सुधारों में मठ में गरीबी, आज्ञाकारिता और शुद्धता का सख्त पालन शामिल था। इन सुधारों से स्थिति में काफी सुधार हुआ।
राजाओं ने सीधे मठाधीश को बिशप की तरह नियुक्त किया और मठ के आदेश पर सभी बाहरी प्रभावों पर रोक लगाई। इसने मठों की अच्छी छवि को बढ़ाया और लोगों ने आध्यात्मिक शांति, चमत्कारी उपचार आदि की तलाश के लिए संतों के तीर्थों की यात्रा शुरू कर दी।
शाही समर्थन से बिशप चर्चों को फैलाने में कामयाब रहे। पोप लियो Ⅳ (1049-54 ई.) द्वारा शुरू किए गए सुधारों ने चर्च को एक संगठन के रूप में विकसित किया।
पोप को पूरे ईसाई चर्च के कानूनी और न्यायिक शासक के साथ-साथ पश्चिमी ईसाईजगत के आध्यात्मिक और सैद्धांतिक नेता के रूप में माना जाना था।
चर्च ने किसी भी धर्मनिरपेक्ष राजा द्वारा बिशप की नियुक्ति पर रोक लगा दी। इसे पोप और राजा के बीच 'अलंकरण संघर्ष' (इंवेस्टीट्यूर कॉनफ्लिक्ट) के रूप में जाना जाता है।
2. अलंकरण संघर्ष और पोप का अधिकार
अलंकरण संघर्ष को 1122 ई. में एक समझौते से हल किया गया था इस समझौते को वर्म्स (जर्मनी का शहर) के कॉनकॉर्डेट के रूप में जाना जाता है। इसके समझौते के अनुसार, जर्मन शासक को बिशप की नियुक्ति या संस्कार करने की मनाही थी। लेकिन उन्हें शासकों के अधिकारों की अनुमति थी। जैसे चर्च के पास आध्यात्मिक अधिकार (पवित्रता) था और राज्य के पास राजनीतिक अधिकार था।12वीं और 13वीं शताब्दियों के पोपों ने चर्च पर पोपतंत्र के अधिकार को स्थापित करने के लिए बहुत कोशिशे करी। पोप इनोसेंट Ⅲ (तृतीय) ने 'दुनिया में सही व्यवस्था लाने के लिए पूरे ईसाई जगत को एकजुट करने का लक्ष्य रखा था।
पोप के अधिकार को बढ़ाने के लिए, मध्य इटली में ज्यादा भूमि को उसके सीधे नियंत्रण में लाया गया। पोप इनोसेंट Ⅲ को अक्सर पापल स्टेट्स के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। पोप इनोसेंट Ⅲ ने कई मौकों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया।
जर्मनी में उन्होंने अपने उम्मीदवार फ्रेडरिक द्वितीय को सम्राट बनाने में सफलता पाई। इंग्लैंड में, उन्होंने किंग जॉन को कैंटरबरी के बिशप के रूप में अपनी पसंद के व्यक्ति को चुनने करने के लिए मजबूर किया।
13वीं शताब्दी के बाद के पोप, पोप इनोसेंट Ⅲ की तरह अधिकारों का आनंद नहीं ले पाए और पोप तथा राजा के लगातार संघर्ष ने चर्च के अधिकार पर उलटा प्रभाव डाला।
3. धर्मयुद्ध (क्रूसेड) और उनका प्रभाव
7वीं और 8वीं शताब्दी की शुरुआत में अरब फैलाव से पूर्वी और पश्चिमी यूरोप दोनों के लिए राजनीतिक खतरे पैदा हो गए। क्योंकि 650 ई. में अरबों ने यरूशलेम पर कब्जा कर लिया और 717 ई. में कॉन्स्टेंटिनोपल को धमकी दी थी।
पश्चिम में उन्होंने स्पेन पर विजय हासिल कर ली थी। जिससे ईसाई जगत और इस्लामी दुनिया के बीच हथियारबंद संघर्ष हुआ। क्योंकि मामला एक धार्मिक स्थान पर जीत का था, इसने धार्मिक रंग ग्रहण कर लिया और ईसाइयों ने इसे धर्मयुद्ध (क्रूसेड) कहा और मुसलमानों ने इसे “जिहाद” कहा।
लगभग 7 धर्मयुद्ध 1095 से 1270 ई0 के बीच लड़े गए। 1095 ई. का पहला धर्मयुद्ध पोप अर्बन Ⅱ और जर्मन राजा हेनरी Ⅳ के बीच सत्ता का संघर्ष था। पोप पश्चिमी ईसाई जगत पर अपना ज्यादा अधिकार स्थापित करना चाहते थे। धर्मयुद्ध का यूरोपीय समाज पर भी प्रतिकूल (बुरा) प्रभाव पड़ा। इसने ईसाई राज्यों को कमजोर कर दिया और राष्ट्रीय शत्रुता को भी कुछ हद तक बढ़ावा दिया।
जर्मनी और फ्रांसीसी एक-दूसरे के विरोधी हो गए। लैटिन और ग्रीक दुनिया के बीच एक रुकावट पैदा हो गई। पश्चिम ने विश्वास करना शुरू कर दिया कि बाइजेंटाइन साम्राज्य धर्मयुद्ध की सफलता के रास्ते में एक रुकावट था। क्योंकि इसने ईसाइयों और मुसलमानों के बीच संघर्ष को गहरा करने के अलावा पूर्वी यूरोप को काफी हद तक नष्ट कर दिया था।
4. विधर्मी धार्मिक आंदोलन
पोप ग्रेगरी Ⅶ के नेतृत्व में चर्च सुधारों से 11वीं शताब्दी में कई धार्मिक आंदोलन हुए। कुछ को चर्च द्वारा स्वीकृत किया गया था, अन्य को चर्च के अधिकार का उल्लंघन करने के लिए अपमान किया गया।कुछ मठ आंदोलन जैसे कार्थुसियन और सिस्टरसियन को चर्च द्वारा स्वीकृत किया गया था। कैथारिज्म और वाल्डेनसियनवाद जैसे अन्य आंदोलन जिन्होंने खुले तौर पर चर्च की आलोचना (बुराई) की थी, उन्हें अस्वीकार कर दिया गया।
डोमिनिकन और फ्रांसिस्कन जैसे आंदोलन फले-फूले क्योंकि वे चर्च के प्रति आज्ञाकारी बने रहे। कार्थुसियन के भिक्षु अलग-अलग कोठरियों में रहते थे, माँस से दूर रहते थे और रोटी, नमक और पानी पर हर हफ्ते तीन दिन उपवास करते थे।
उन्होंने जीसस और वर्जिन मैरी की पूजा पर जोर दिया। इस आंदोलन की लोकप्रियता इसलिए थी क्योंकि पहली बार एक महिला को पश्चिमी यूरोप की धार्मिक योजना में सम्मान का स्थान दिया गया था।
फ्रांस में कई जगहों पर ‘नोट्रे डेम’ या 'आवर लेडी' के नाम से चर्च बनाए गए। उनका मानना था कि ईसाई धर्म के सच्चे मूल्यों को एकांत में खोजा जा सकता है। वे शारीरिक श्रम में भी विश्वास करते थे और आर्थिक उत्पादन में भाग लेते थे।
कैथारिज्म उत्तरी इटली और दक्षिणी फ्रांस में लोकप्रिय था और ज्यादातर तपस्वी प्रथाओं में विश्वास करता था। वे सीधे ईसाई धर्म से नहीं जुड़े थे। उन्होंने अपने खुदके धर्मशास्त्र, पादरियों और कर्मकांडों को विकसित किया।
वाल्डेनसियनवाद दक्षिणी फ्रांस, उत्तरी इटली और जर्मनी में लोकप्रिय था। उन्होंने ईसाई अच्छे समाचारों का अनुवाद (Translation) और अध्ययन किया, उनका प्रचार किया और गरीबी का जीवन बिताया। उन्होंने चर्च की आज्ञा के बिना प्रचार किया। इस वजह से उन्हें चर्च की आज्ञा का उल्लंघन करने के लिए धर्म विरोधी घोषित किया गया।