राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के उपागम (Approaches to Political Theory) : ऐतिहासिक, संस्थागत, आदर्शी और आनुभविक (Historical, Institutional, Normative & Empirical)

राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के उपागम (Approaches to Political Theory) : ऐतिहासिक, संस्थागत, आदर्शी और आनुभविक (Historical, Institutional, Normative & Empirical)

राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के उपागम

राजनीति एक बेहद पुराना विषय है लेकिन इसका सैद्धान्तिक तरीके से अध्ययन का काम 19वीं और 20वीं शताब्दी मे शुरू हुआ। विशेषकर यूरोपीय देशों व उत्तरी अमेरिका में जहाँ राज्य के अध्ययन को ही राजनीति समझा जाता था।

यहाँ राजनीति पर ज्यादा-से-ज्यादा अध्ययन किया जाने लगा और यही से राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के लिए उपागम का विकास भी हुआ

राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपागमों को दो भागों में बाँटा जाता है।:-

1 पारंपरिक राजनीतिक उपागम
  • ऐतिहासिक उपागम (राजनीति के ऐतिहासिक अध्ययन पर बल देता है)
  • संस्थागत उपागम (जो राज्य के अध्ययन पर जोर देता है।)
  • आदर्शी उपागम / निर्देशात्मक उपागम (जो नैतिक मूल्यों पर बल देता है)
2 आधुनिक राजनीतिक उपागम
  • आनुभविक वैज्ञानिक उपागम (इस प्रकार के उपागम में तथ्यों और वैज्ञानिक प्रयोग पर बल दिया जाता है।)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आनुभविक-वैज्ञानिक अर्थात् आधुनिक उपागम का राजनीतिक सिद्धान्त पर वर्चस्व हो गया और उसके बाद से तथ्यों और विज्ञान पर अधिक बल दिया जाने लगा।

1. ऐतिहासिक उपागम (Historical Approach)

सेवाइन, लिंडसे, मैक्यावली इसके प्रमुख समर्थक हैं |

इस उपागम के समर्थकों का मानना है कि राजनीतिक सिद्धांत को समझने के लिए उस देश, काल एवं परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है जहा उस राजनीतिक सिद्धांत का विकास हुआ है | क्योंकि बिना उन परिस्थितियों को समझे किसी भी राजनीतिक सिद्धांत को समझ पाना संभव नहीं है |

यह जरूरी नहीं है कि राजनीतिक सिद्धांतकारो ने इन घटनाओं, परिस्थितियों में प्रत्यक्ष भागीदारी की हो लेकिन यह इन परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं और साथ ही वह घटनाओं को प्रभावित भी करते हैं |

ऐतिहासिक उपागम की कुछ विशेषताएँ

1. इस उपागम में भूतकाल से वर्तमान को परिभाषित करने की कोशिश की जाती है इसलिए राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी के लिए इतिहास का अध्ययन करना बहुत उपयोगी है।

2. यह प्राचीन राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के ऐतिहासिक अध्ययन पर बल देता है क्योंकि इससे हम भविष्य के मार्गों का निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

3. सेवाइन और मैक्यावली जैसे विचारको का मानना है कि राजनीतिक और इतिहास आपस में जुड़े हुए है इसलिए राजनीति के अध्ययन के लिए एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (नजारिया) हमेशा होना चाहिए

4. यह उपागम इस बात पर बल देता है कि किसी भी विचारक के राजनीतिक विचार उसके आसपास के वातावरण से प्रभावित होकर बनते है।

5. प्रत्येक राजनीतिक संस्थाओं के वर्तमान स्वरूप जानने के लिए हमें उसके अतीत का अध्ययन करना आवश्यक है। क्योंकि राजनीतिक संस्थाओं का निर्माण नहीं किया जाता बल्कि उसका विकास होता हैं। अतः प्रत्येक राजनीतिक संस्था का एक अतीत होता है और उसके अतीत से परिचित होकर ही उसका ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

6. राज्य अपने वर्तमान रूप में लंबे ऐतिहासिक विकास से आया है। राज्य के इस विकास क्रम में कब-कब तथा किन परिस्थितियों में क्या-क्या घटनाएँ घटी तथा उनके क्या कारण थे। अंतः इन बातो से हमे राज्य के वर्तमान तथा भावी रूप को समझने में सहायता होती हैं।

7. संविधान बनाये नहीं जाते बल्कि विकसित होते हैं। यह बात राज्य के संविधानों के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाती है।

2. संस्थागत / संरचनात्मक उपागम (Institutional Approach)

इस उपागम का समर्थन वॉल्टर बेजहॉट, मुनरो और लॉर्ड ब्रॉइस जैसे विचारकों ने किया है, जिन्होंने राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन में राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन पर बल दिया है।

प्रारंभ से ही राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन का संबंध राज्य के अध्ययन से जुड़ा हुआ था। और राजनीतिक संस्थाओं को राज्य के रूप में भी देखा जाता था। इसलिए इसको “राज्य का सिद्धांत” भी कहा जाता है।

राज्य के सिद्धांत का मुख्य रूप से उदय हमें जर्मनी में देखने को मिलता है, इसलिए इसे जर्मन विचारधारा भी कहा गया। बाद में यह जर्मन विचारधारा अन्य देशों में भी विकसित होने लगी।

संस्थागत / संरचनात्मक उपागम की कुछ विशेषताएँ

1. विंसेंट मानते हैं कि इस उपागम का विकास मुख्यतः जर्मनी, ग्रेट ब्रिटेन और उत्तरी अमेरिका में इसलिए हुआ क्योंकि वहाँ पर संवैधानिक अध्ययन को बढ़ावा दिया गया। जो राजनीतिक संस्थाओं से सरोकार (संबंध) रखता था।

2. संस्थागत उपागम का केंद्र बिंदु मुख्यता राज्य व उसके संस्थाएं हैं क्योंकि इसमे सरकार की औपचारिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सम्मिलित है

3. इस उपागम का विकास राजनीति के अध्ययन के विकास के साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि जैसे-जैसे राजनीति के अध्ययन का विकास हुआ वैसे वैसे संस्थागत उपागम का विकास होता गया

4. विंसेंट मानते हैं कि यह उपागम राजनीतिक सिद्धांत के कार्य की पहचान, राज्य के कार्य रूप मे करता है जिसमें राज्य के संवैधानिक कार्य शामिल है

5. हीगेल (Hegel) और फ़िशे (Fische) का मानना है कि अगर राजनीति को जानना है, तो राज्य को जानो, और राज्य को जानने के लिए उसके भीतरी आदर्शों को भी जानना होगा।

यहाँ यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि इस उपागम में राज्य पर इतना ध्यान क्यों दिया गया? इसका मुख्य कारण राष्ट्रवाद में वृद्धि होना था। क्योंकि 19वीं 20वीं सदी में सभी का ध्यान राज्य के विचार पर था। और उस दौरान यूरोप में राज्य निर्माण चल रहा था। इन सभी देशों में अपने अपने राज्य को मजबूती देने का कार्य चल रहा था इसलिए राज्य के अध्ययन को विकसित करने की कोशिश हो रही थी।

उत्तरी अमेरिका, ब्रिटेन में राजनीति के अध्ययन के लिए राज्य पर ही ध्यान था। ऐसा इसलिए, क्योंकि यहाँ पर राज्य का संबंध सीधे-सीधे राजनीति से जुड़ा हुआ था। शुरुआत से ही यहाँ पर राजनीतिक अध्ययन की मुख्य क्षेत्र राज्य है। क्योंकि इनका मानना था कि राजनीति ग्रीक भाषा के शब्द Polis से आया जिसका मतलब ही नगर-राज्य (City - State) या मात्र राज्य है।

3. आदर्शी / दार्शनिक उपागम (Normative Approach)

राजनीति के अध्ययन में दार्शनिक उपागम सर्वाधिक प्राचीन है यह सिद्धान्त प्लेटो एवं अरस्तू से आरम्भ होकर 20वीं शताब्दी की उदारवादी एवं मार्क्सवादी विचारधारा तक चलती आ रही थी।

इस उपागम को नैतिक, मानकीय और तात्विक उपागम के नाम से भी जाना जाता है अंतः इसे काल्पनिक एवं दार्शनिक सिद्धांत भी कहा जाता है।

दार्शनिक उपागम को पुनर्जीवित करने का श्रेय 'लियोस्ट्रॉस' को दिया जाता है। जिनके अनुसार “मूल्य” राजनीतिक सिद्धांत के अभिन्न भाग हैं, इन्हें राजनीतिक सिद्धांत से पृथक् (अलग) नहीं किया जा सकता है।

आदर्शी राजनीतिक सिद्धान्त की कुछ विशेषताएँ

1. इस उपागम का संबंध राजनीति, राज्य, न्याय, स्वतंत्रता आदि के विचार से है क्योंकि यह उपागम मूल्यों और नैतिकता पर आधारित है।

2. आदर्शी राजनीतिक सिद्धान्त मे “क्या होना चाहिए” के आधार पर सैद्धान्तीकरण (सिद्धान्त देना) किया जाता है और इसमे “क्या है” पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

3. इनके अनुसार, ‘राजनीतिक वैज्ञानिक का कार्य केवल अपने मतों को व्यक्त करना ही नहीं है, बल्कि एक अच्छे समाज के निर्माण को प्रेरित करना है।

4. यह आदर्शी सिद्धान्त सवोत्तम अच्छाई की बात करता है तथा राजनीतिक अच्छाई को इसका एक भाग मानता है।

5. आदर्शी सिद्धान्त राजनीति को सम्पूर्ण मानता है क्योंकि राजनीति मे अधिकार, स्वतंत्रत, समानता, न्याय जैसी धारणाएं निहित होती है।

6. आदर्शी राजनीतिक सिद्धान्त एक “आदर्श राज्य" (ideal state) तथा सरकार का सर्वश्रेष्ठ रूप ढूँढता रहता है।(सबसे पहले प्लेटो ने आदर्श राज्य का सिद्धान्त दिया था)

7. आदर्शी राजनीतिक सिद्धान्त “आदेशात्मक” होते हैं क्योंकि यह आदेश देते है कि क्या करना चाहिए और ये मूल्यांकन (जांच) भी करते है जिनके माध्यम से हम किसी व्यवस्था की कमिया और उसके सुधार के उपाय जान सकते है।

आलोचना:- आदर्शी राजनीतिक सिद्धान्त की इस आधार पर आलोचना की जाती है कि ये सिद्धान्त काल्पनिक, अमूर्त, परिकल्पित, तथा स्वपनदर्शी है।

4. आनुभविक-वैज्ञानिक / व्यवहारवादी उपागम (Empirical-Scientific Approach)

20वीं शताब्दी में अमरीका में आनुभविक - वैज्ञानिक सिद्धांत नामक एक नए राजनीतिक सिद्धांत का विकास हुआ था जिसमे आदर्शी राजनीतिक सिद्धान्त की कमियों को दूर करते हुए तथ्यों और नैतिकता की बात की गई।

20वीं शताब्दी के आरम्भ में मैक्स वेबर, ग्राहम वालास तथा बैन्टले आदि ने राजनीतिक सिद्धान्तों के आनुभविक दृष्टिकोण का विकास किया और इस बात पर बल दिया कि राजनीति का अध्ययन तथ्य आधारित होना चाहिए।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका के शिकागो विश्वविद्यालय के कुछ राजनीति - वैज्ञानिको ने एक नये वैज्ञानिक सिद्धांत का विकास कर दिया।

इन नये सिद्धान्तों ने राजनीति के अध्ययन को आदर्शों मूल्यों और संस्थाओं से हटाकर इसे व्यक्ति और समूहों के व्यवहार को राजनीतिक अध्ययन के साथ जोड़ दिया।

आनुभविक-वैज्ञानिक सिद्धान्त की कुछ विशेषताएँ

1. इनका काम आदर्श राज्य की स्थापना करना नहीं होता है बल्कि ये समाज की घटनाओ का वर्णन करते है।

2. इस सिद्धान्त के अनुसार राजनीतिक सिद्धान्तों का अध्ययन मूल्यविहीन होना चाहिए। क्योंकि सिद्धान्त का सम्बन्ध केवल तथ्यों से है।

3. इस सिद्धान्त के अनुसार राजनीतिक सिद्धांतों का उद्देश्य राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या करना, उन्हें क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित करना और इसके आधार पर भविष्य का मार्ग दिखाना है।

4. आनुभविक-वैज्ञानिक सिद्धान्तों का सम्बन्ध केवल राज्य के अध्ययन से नही है बल्कि इनका सम्बन्ध राजनीतिक प्रक्रिया के अध्ययन से भी है।

5. इस सिद्धांत ने सामाजिक विज्ञान की कई धारणाओं को राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिये अपनाया है जैसे शक्ति, नीति निर्माण, राजनीतिक व्यवस्था आदि।

6. आनुभविक सिद्धान्त आलोचनात्मक कार्य में विश्वास नहीं करते है बल्कि ये “क्या हो रहा है” को देखकर समाधान देते है।

आदर्शी तथा आनुभविक उपागमो में सम्बन्ध

आदर्शी तथा आनुभविक सिद्धान्तों में अन्तर केवल 'क्या है और 'क्या होना चाहिए' का है

आदर्शी राजनीतिक सिद्धान्त में 'चाहिए' शब्द अधिक आता है तथा 'है' शब्द अपेक्षाक्रत कम है जबकि आनुभविक सिद्धान्त में 'है' शब्द अधिक आता है तथा “चाहिए” शब्द अपेक्षाक्रत कम है

आनुभविक सिद्धांत हमें राजनीतिक घटनाओं की केवल सूचना देता है। जबकि आदर्शी सिद्धांत राजनीतिक वास्तविकता के मूल को समझने में सहायता करता है

भीखू पीख के अनुसार दोनों में अन्तर केवल इस बात का है कि हम राजनीतिक घटनाओं का अध्ययन किस प्रकार करते है।

आदर्शी सिद्धांत मे घटनाओं की आलोचनात्मक, छानबीन तथा व्याख्या जाती है जबकि आनुभविक सिद्धान्त में केवल उस घटना का तथ्यात्मक वर्णन होता है

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1.Analyze the normative/ideal and empirical approaches to political theory.
राजनीतिक सिद्धांत के मानकीय/आदर्शी और अनुभवमूलक उपागमों का विश्लेषण कीजिए ।

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2.What are the approaches to the study of political theory?
राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के उपागम क्या है ?

OR/अथवा

3.What is the difference between ideal and empirical approach?
आदर्शी और आनुभविक उपागम में क्या अंतर है?

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