राज्य और राष्ट्र निर्माण (State & Nation Building)
रियासतों का एकीकरण एवं राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन
🔴 राज्य और राष्ट्र निर्माण (State & Nation Building) का परिचय
भारत एक अलग और अद्भुत (अनोखा) देश था। लेकिन ब्रिटिश लोग भारत में आए और यहां शासन किया, उन्होंने व्यापार के लिए भारत को अपने अधीन कर लिया।ब्रिटिश लोगों ने अपनी सेना और शक्ति का इस्तेमाल करके अपनी सत्ता (दबदबा) जमाई। अंतः ब्रिटिश शासन के दौरान, भारतीय लोग बहुत परेशान थे, वे अपनी आज़ादी और अधिकारों (rights) की खोज में थे।
परंतु उन्हें अपनी आवाज़ उठाने की अनुमति नहीं थी वर्ष 1857 में एक महान आंदोलन हुआ जिसे "1857 का विद्रोह" कहा जाता है। भारतीय सिपाहियों और दूसरे लोग मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े हुए, यह विद्रोह असफल रहा लेकिन इससे भारतीय लोगों में आज़ादी के प्रति जागरूकता बढ़ी।
इसके बाद वर्ष 1885 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, यह एक राजनीतिक संगठन (संघ) था जिसने भारत को आज़ाद करने का निर्णय लिया।
कांग्रेस ने अलग-अलग मुद्दों (विषय) पर आंदोलन किए और लोगों को इकठ्ठा करने की कोशिश की। अंतः इस तरह आज़ादी की लड़ाई शुरू हुई, जो बाद में 1947 में सफल हुई और भारत को आजादी मिली।
🔴 स्वतंत्रता के पश्चात् देशी रियासतों का विलय (Merger of Princely States After Independence)
भारत में अंग्रेजी शासन काल में दो तरह के अधिकारी थे एक देशी रियासत और दूसरा ब्रिटिश प्रांत (अधिकारी)। इसलिए स्वतंत्रता के बाद भारत में 565 देशी रियासतें (रजवाड़े) थीं जो अलग-अलग शासकों द्वारा चलाई जा रही थीं।उस समय भारत में लगभग 600 प्रांत (क्षेत्र) थे जिन्हें एक प्रशासन के तहत लाना राष्ट्रीय अखंडता के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।
3 जून 1947 को माउंटबेटन ने घोषणा की, कि भारत और पाकिस्तान 2 अलग देशो का निर्माण होगा और जो रजवाड़े इन दोनों में से किसी में शामिल नहीं होना चाहते वह स्वयं को एक अलग राष्ट्र (देश) घोषित कर सकते है।
मोहम्मद अली जिन्ना ने 18 जून 1947 को अपने भाषण में अंग्रेजी शासन की समाप्ति के बाद सभी रियासतों की आज़ादी का समर्थन (साथ) किया। और कांग्रेस 1920 से ही इन रियासतों में उत्तरदाई (उचित) सरकार की माँग कर रही थी।
मैसूर, हैदराबाद, इंदौर, काठियावाड़ और अन्य कई रियासतों में उत्तरदाई सरकार के गठन को लेकर कांग्रेस को प्रजा का सहयोग भी मिलने लगा था। क्योंकि कांग्रेस शासन पर राजाओं का नहीं बल्कि प्रजा का अधिकार (प्रजा का शासन) चाहती थी। दूसरी ओर रियासते ने प्रजा के नेतृत्व (under) में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना को लेकर विरोध कर रही थी।
भारत की अखंडता को देखते हुए “सरदार वल्लभ भाई पटेल” ने दबाव डाल कर रजवाड़े और रियासतों को भारत से अलग होने से रोका। कुछ रियासत अप्रैल 1947 में संविधान सभा में शामिल हुई। लेकिन ज्यादातर राजा इससे अलग रहे और कुछ राजा जैसे ट्रावनकोर, भोपाल और हैदराबाद के राजाओं ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।
अंतः 15 अगस्त 1947 तक सभी रजवाड़े भारत में शामिल हो गए लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू और कश्मीर को छोड़ कर। और बाद में इन तीनों को भी भारतीय संघ में शामिल होना पड़ा।
> जूनागढ़ का विलय
जूनागढ़ भारत के काठियावाड़ प्रायद्वीप में स्थित एक रियासत थी, जिसका शासक मुस्लिम था और जनसंख्या ज्यादातर हिंदू थी।जूनागढ़ की सीमा पाकिस्तान से नहीं मिलती थी, लेकिन रियासत के नवाब (शासक) ने दावा किया कि जूनागढ़ से पाकिस्तान समुद्र मार्ग के जरिए जाया जा सकता है।
14 अगस्त 1947 को जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में मिलने (विलय) की घोषणा की और पाकिस्तान ने 13 सितंबर 1947 को इस विलय को मंजूरी दे दी।
जूनागढ़ की अधीन रियासत मंगोल और बाबरियाबाद ने इस निर्णय के खिलाफ होकर जूनागढ़ से आजादी की घोषणा करके भारत में मिलने की इच्छा जताई।
भारत सरकार ने जूनागढ़ को भारत में शामिल करने के लिए वहा के नवाब से मुलाकात की और उस पर विलय के लिए दबाव बनाया। अंतः दीवान “शाहनवाज भुट्टो” ने भारत सरकार को शासन सौंपने की बात मान ली और जूनागढ़ की रियासत को भारत में शामिल किया गया।
इस तरह, जूनागढ़ भारत में शामिल हुआ और भारत का अभिन्न अंग बन गया।
> हैदराबाद का विलय
हैदराबाद का क्षेत्रफल लगभग 82,000 वर्ग मील था, यह मध्य के उत्तर में स्थित था और पश्चिम में बम्बई और दक्षिण-पूर्व में मद्रास से घिरा हुआ था।हैदराबाद की आबादी लगभग 1.7 करोड़ थी और 87% आबादी हिंदू थी। और शासन “निजाम उस्मान अली” के हाथों में था तथा उसे इत्तेहाद-उल-मुसलमीन संगठन का समर्थन मिलता था।
नवाब ने 1940 में एक फरमान जारी किया, जिसमें उसने ब्रिटेन से स्वतंत्रत के बाद हैदराबाद को स्वतंत्र राज्य (देश) बनाने की मांग की थी। और निजाम ने विलय के लिए माउंटबेटन की सहायता भी प्राप्त कर ली थी
लेकिन ये प्रयास असफल रहे। और उसने अंतर्राष्ट्रीय मंचों में भी हैदराबाद मुद्दे को उठाने की कोशिश की, लेकिन यह भी असफल रहा।
13 दिसंबर 1948 को भारतीय सेना ने "ऑपरेशन पोलो" के तहत सेना हैदराबाद भेज दी ताकि वह अप्रशासनिक कानून व्यवस्था को संभाल सके। अंतः निजाम ने जल्द ही हार मान ली और नवंबर 1948 में हैदराबाद को भारत संघ में विलय कर लिया।
भारत सरकार ने निजाम को सजा नहीं दी और उसे राज्य प्रमुख बनाया, जिसके साथ 50 लाख रुपये की पेंशन और संपत्ति की अनुमति भी दी गई।
> कश्मीर का विलय
कश्मीर 84,741 वर्ग मील क्षेत्रफल और 40,000,00 जनसंख्या वाली एक महत्त्वपूर्ण रियासत थी' जिसकी सीमा अफगानिस्तान, चीन, व तिब्बत से मिलने के साथ-साथ भारत - पाकिस्तान से भी मिलती है।इस रियासत के राजा “हरिसिंह” हिंदू थे जबकि जनसंख्या का लगभग तीन-चौथाई आबादी मुस्लिम थी। महाराजा हरिसिंह कश्मीर को स्वतंत्रता देश बनाने आशा रखते थे। परंतु उनके शासन को कश्मीर के प्रमुख दल “नेशनल कांफ्रेंस” के नेता “शेख अब्दुल्ला” द्वारा चुनौती दी जाती थी। “शेख अब्दुल्ला” नेहरू के मित्र व सहयोगी भी थे।
अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए महाराजा हरिसिंह ने माउंटबेटन व गाँधी जी की सलाह के विपरीत भारत या पाकिस्तान किसी में भी विलय नहीं किया। और पाकिस्तान ने उससे एक समझौता कर लिया था परंतु भारत ने “wait and watch” की नीति अपनाई।
इस बीच शेख अब्दुल्ला को, जो राजद्रोह के अपराध में जेल में बंद थे, को रिहा कर दिया गया। रिहा होने के बाद शेख अब्दुल्ला शासन मे पूर्ण लोकतांत्रिकरण की माँग की। जिसके अनुसार जनता ही यह निणय ले कि कश्मीर को भारत में मिलाना है या पाकिस्तान में । परंतु महाराजा हरिसिंह अभी भी अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के पक्षधर थे।
भारत सरकार ने संयम बनाए रखते हुए जनमत संग्रह द्वारा ही कश्मीर के फैसले कि बात की थी परंतु 22 अक्टूबर, 1947 को हजारों पठानों द्वारा पाकिस्तानी सीमा पार करके कश्मीर पर आक्रमण कर दिया गया, जिन्हें पाकिस्तानी सेना का समर्थन था।
जब यह सेना भयंकर लूट व दमन करते हुए श्रीनगर की तरफ बढ़ी तो महाराजा हरिसिंह इन्हें रोकने में असमर्थ रहे। 24 अक्टूबर, 1947 को हरिसिंह ने भारत से सैन्य सहायता मांगी। परंतु माउंटबेटन ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत अपनी सेना कश्मीर तभी भेज सकता है जब कश्मीर का औपचारिक विलय भारत में हो।
जिसके बाद हरिसिंह ने विलय पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर कर दिए व शेख अब्दुल्ला को रियासत के प्रशासन का प्रमुख बनाने को सहमत हो गए। इस प्रकार कश्मीर रियासत का औपचारिक विलय भारत में हो गया।
अंतः 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान कश्मीर पर भी लागू हुआ। और अनुच्छेद- 370 के तहत 26 जनवरी, 1957 से कश्मीर का अलग संविधान भी लागू किया गया।
अनुच्छेद 370 को भारत सरकार ने 9 अगस्त, 2019 में “जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम” के द्वारा समाप्त कर दिया। अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम से दो नए केंद्रशासित प्रदेश का गठन कर दिया गया।
🔴 राज्यों के गठन का संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provision for Formation of States)
संविधान निर्माताओं ने विविधता को देखते हुए, एकता एवं अखंडता के लिए भारत के संविधान के भाग एक मे निम्नलिखित प्रावधान किए है:-अनुच्छेद-1:- के अनुसार भारत “राज्यों का संघ” होगा, के रूप में उल्लेखित किया गया है।
अनुच्छेद-2:- के अनुसार संसद विधि (कानून) द्वारा, जिन्हें वह ठीक समझे भारत संघ में नए राज्यों का प्रवेश तथा उनकी स्थापना कर सकेगी।
अनुच्छेद-3 में संसद विधि द्वारा:-
- संसद किसी भी राज्य के भीतर एक नये राज्य का निर्माण कर सकेगी अथवा दो या उनसे भी अधिक राज्यों को मिलाकर एक नये राज्य का निर्माण कर सकेगी।
- संसद किसी भी राज्य की सीमा को बड़ा सकेगी।
- संसद किसी भी राज्य की सीमा को घटा सकेगी।
- संसद किसी भी राज्य के नाम को परिवर्तित कर सकेगी।
राज्यों के पुनर्गठन में, संसद की प्रभावी शक्ति होती है, लेकिन राज्यों को भी अपने क्षेत्र में बदलाव की बात रखने का अधिकार होता है। (अनुच्छेद 3 के अनुसार) इसके लिए संविधान में अलग भाग (खंड) है, जो राज्यों के इस अधिकार की रक्षा करता है।
संसद को बिना राष्ट्रपति की सिफारिश के किसी भी सदन में राज्यों के बदलाव को लेकर विधेयक प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं है।
ब्रिटिश काल से ही देश के कई स्थानों मे भाषा आधारित नए राज्य की माँग की जाने लगी थी। जिसके बारे में 1917 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन में विचार किया गया।
मांटेग्यू चेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स (1918) द्वारा भी भारत में नए राज्यों को भाषा के आधार पर बनाने की सिफारिश की गई थी। 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में इस विषय पर पुन: विचार हुआ।
भारत को आज़ादी मिलने के बाद अस्थायी रूप से संघवाद को अपनाया गया जहाँ चार प्रकार के राज्यों का सीमांकन किया गया:-
श्रेणी A - इस वर्ग में असम, बिहार, मुंबई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, यूनाइटेड प्रोविंस और पश्चिमी बंगाल शामिल थे।
श्रेणी B - इसमें ब्रिटिश काल की शाही रियासतों को शामिल किया जैसे हैदराबाद, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, मैसूर, मध्य भारत, पटियाला और पूर्वी पंजाब आदि।
श्रेणी C - इसमें मध्यम आकार की रियासतें थी जैसे अजमेर, भोपाल, बिलासपुर, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर, त्रिपुरा, और बिहार शामिल थे।
श्रेणी D - इसमें विशेष दर्जे वाले राज्य शामिल हैं जैसे अंडमान-निकोबार के दीप समूह।
लेकिन राज्यों का ये बंटवारा जनता को संतुष्ट नहीं कर पा रहा था विशेष तौर पर दक्षिण भारत में, इसलिए पहले की तरह मांग उठती रही।
एक जाने-माने सैनिक “पोट्टी श्रीरामुलु” ने 19 अक्टूबर 1952 को एक अनशन शुरू कर दिया। और अनशन के 56वें दिन (16 दिसंबर 1952) उनकी मृत्यु हो गई, जिससे मद्रास के लोग "तेलुगु भाषी" सीमा में हिंसा करने लगे।
पूरे आंध्र क्षेत्र में 3 दिनों तक लगातार दंगे, फ़साद, हिंसा और हड़ताल जारी रही। और पुलिस फायरिंग में कई लोगों की मृत्यु भी हो गई, जिसके कारण सरकार ने आंध्र प्रदेश का गठन किया।
अंतः 1 अक्टूबर 1953 को नये राज्य आंध्र प्रदेश का गठन किया गया और यह भाषा पर आधारित पहला राज्य था। इन घटनाओं के बाद भाषा के आधार पर नए राज्य के निर्माण की मांगे ओर तेज़ी से फैली। जिसके कारण सरकार ने दिसंबर 1953 में “फजल अली” के साथ मिल कर "राज्य पुनर्गठन आयोग" का गठन किया।
इस रिपोर्ट ने भारत को 14 राज्यों में बांटने की सिफारिश की, जिसमें अवध, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, और पश्चिम बंगाल शामिल थे। अंतः इस आयोग ने असम को बिहार से अलग करके एक आदिवासी राज्य बनाने की माँग का विरोध किया।
सविधान मे संशोधन करके इस आयोग के सुझावों को लागू किया गया और अंतः संसद ने नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित (pass) कर दिया और 6 केंद्र शासित प्रदेश व 14 राज्यों का निर्माण किया गया।
संसद को बिना राष्ट्रपति की सिफारिश के किसी भी सदन में राज्यों के बदलाव को लेकर विधेयक प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं है।
🔴 भाषा के आधार पर नए राज्यों के गठन की माँग (Demand for Formation of New States on the Basis of Language)
स्वतंत्रता आंदोलन के साथ भाषा के आधार पर नए राज्यों के गठन से जुड़ी माँगों का उठना स्वाभाविक (natural) था। इसलिए स्वतंत्रता के बाद देश के कई हिस्सों में भाषा के आधार पर नए राज्य बनाने की माँग उठने लगी।ब्रिटिश काल से ही देश के कई स्थानों मे भाषा आधारित नए राज्य की माँग की जाने लगी थी। जिसके बारे में 1917 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन में विचार किया गया।
मांटेग्यू चेम्सफोर्ड रिफॉर्म्स (1918) द्वारा भी भारत में नए राज्यों को भाषा के आधार पर बनाने की सिफारिश की गई थी। 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में इस विषय पर पुन: विचार हुआ।
भारत को आज़ादी मिलने के बाद अस्थायी रूप से संघवाद को अपनाया गया जहाँ चार प्रकार के राज्यों का सीमांकन किया गया:-
श्रेणी A - इस वर्ग में असम, बिहार, मुंबई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, यूनाइटेड प्रोविंस और पश्चिमी बंगाल शामिल थे।
श्रेणी B - इसमें ब्रिटिश काल की शाही रियासतों को शामिल किया जैसे हैदराबाद, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, मैसूर, मध्य भारत, पटियाला और पूर्वी पंजाब आदि।
श्रेणी C - इसमें मध्यम आकार की रियासतें थी जैसे अजमेर, भोपाल, बिलासपुर, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर, त्रिपुरा, और बिहार शामिल थे।
श्रेणी D - इसमें विशेष दर्जे वाले राज्य शामिल हैं जैसे अंडमान-निकोबार के दीप समूह।
लेकिन राज्यों का ये बंटवारा जनता को संतुष्ट नहीं कर पा रहा था विशेष तौर पर दक्षिण भारत में, इसलिए पहले की तरह मांग उठती रही।
एक जाने-माने सैनिक “पोट्टी श्रीरामुलु” ने 19 अक्टूबर 1952 को एक अनशन शुरू कर दिया। और अनशन के 56वें दिन (16 दिसंबर 1952) उनकी मृत्यु हो गई, जिससे मद्रास के लोग "तेलुगु भाषी" सीमा में हिंसा करने लगे।
पूरे आंध्र क्षेत्र में 3 दिनों तक लगातार दंगे, फ़साद, हिंसा और हड़ताल जारी रही। और पुलिस फायरिंग में कई लोगों की मृत्यु भी हो गई, जिसके कारण सरकार ने आंध्र प्रदेश का गठन किया।
अंतः 1 अक्टूबर 1953 को नये राज्य आंध्र प्रदेश का गठन किया गया और यह भाषा पर आधारित पहला राज्य था। इन घटनाओं के बाद भाषा के आधार पर नए राज्य के निर्माण की मांगे ओर तेज़ी से फैली। जिसके कारण सरकार ने दिसंबर 1953 में “फजल अली” के साथ मिल कर "राज्य पुनर्गठन आयोग" का गठन किया।
राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट (अक्टूबर 1955)
राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारत के राज्यों के गठन के लिए कई अहम सुझाव दिए थे। और इस रिपोर्ट ने इन राज्यों के नामों, सीमाओं और मुख्य शहरों के बारे में जानकारी भी प्रदान (प्रस्तुत) की।इस रिपोर्ट ने भारत को 14 राज्यों में बांटने की सिफारिश की, जिसमें अवध, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, और पश्चिम बंगाल शामिल थे। अंतः इस आयोग ने असम को बिहार से अलग करके एक आदिवासी राज्य बनाने की माँग का विरोध किया।
सविधान मे संशोधन करके इस आयोग के सुझावों को लागू किया गया और अंतः संसद ने नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित (pass) कर दिया और 6 केंद्र शासित प्रदेश व 14 राज्यों का निर्माण किया गया।
इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे:-
- हैदराबाद रियासतों का तेलंगाना क्षेत्र आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया।
- एक नए राज्य केरल का निर्माण किया गया जो त्रावणकोर कोचीन क्षेत्र में पुराना मद्रास प्रेसीडेंसी के मालाबार जिले को मिला कर बनाया गया।
- मुंबई, मद्रास, हैदराबाद व कुर्ग के कुछ कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मैसूर रियासत को मिला दिया गया।
- मुंबई का फैलाव करके उसमे कच्छ व सौराष्ट्र की रियासतों के साथ- साथ हैदराबाद रियासत के मराठी भाषी क्षेत्रों को शामिल कर लिया गया। अंतः मराठी भाषी नागपुर डिवीजन भी इसमें शामिल किया गया था।
1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम द्वारा निम्न राज्यों का गठन किया गया :-
- आंध्र प्रदेश
- असम
- बिहार: के कुछ क्षेत्रों को पश्चिम बंगाल में शामिल किया गया।
- मुंबई को 2 भागों में 1960 में विभाजित करके महाराष्ट्र व गुजरात में विभाजन किया गया।
- जम्मू व कश्मीर
- केरल
- मध्य प्रदेश, मध्य भारत और विंध्य प्रदेश व भोपाल राज्य को मिलाकर बना जबकि मराठी भाषी लोगों को नागपुर डिविजन मुंबई में शामिल किया गया।
- मैसूर - इसमें कुर्ग जिले के अलावा दक्षिण मुंबई के कन्नड़ भाषी क्षेत्र व पश्चिमी हैदराबाद के कन्नड़ भाषी क्षेत्र भी शामिल किया गया अंतः 1973 में मैसूर का नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया।
- ओडिशा
- मद्रास - मद्रास रियासत से मालाबार क्षेत्र अलग कर केरल में शामिल कर दिया, 1964 में मद्रास का नाम बदल कर तमिलनाडु कर दिया गया।
- पंजाब
- राजस्थान
- पश्चिमी बंगाल
- उत्तर प्रदेश
🔴 वर्तमान में नए राज्यों के गठन की माँगें (Presently Demands for Formation of New States)
राज्य पुनर्गठन अधिनियम के बाद भी भाषाई अथवा क्षेत्रीय आधार पर राज्यों के गठन की क्रिया समाप्त नहीं हुई। क्योंकि 1956 के बाद अभी तक 15 नए राज्यों का गठन किया जा चुका है।गुजरात (1968), नागालैंड (1963), हरियाणा (1966) हिमाचल प्रदेश (1971), मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा (1972), सिक्किम (1975), मिजो (1986), अरुणाचल प्रदेश (1987), उत्तरांचल, झारखंड, छत्तीसगढ़ (2000) तेलंगाना (2014)।
इससे भी ज्यादा ज़रूरी बात है कि अभी भी देश के कई हिस्से में नए राज्यों के गठन की माँगें समय-समय पर उठती रहती हैं। ऐसी आवाज़ें हर एक नए राज्य के गठन के बाद और तेज़ हो जाती हैं।
आज के समय में निम्नलिखित नए राज्यों के गठन की माँग मुख्यत: इनसे आ रही है:-
हरित प्रदेश - 22 जिले जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थे उनको मिलाकर अलग प्रदेश बनाने की माँग बहुत पुरानी है। कभी गंगा प्रदेश, कभी दोआब तो कभी हरित प्रदेश के नाम से यह माँग अनेक राजनीतिक दलों में जनता द्वारा ही उठाई जाती रही है।
कुर्ग प्रदेश - कर्नाटक का यह क्षेत्र 1956 तक राज्यों के वर्ग-C में शामिल था जिसका शासन मुख्य आयुक्त के द्वारा किया जाता था और “मिरकारा” इसकी राजधानी थी। जिसे "राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956” द्वारा मैसूर राज्य में शामिल कर दिया गया।
मिथिलांचल - बिहार के एक हिस्से में मैथिली भाषा बोलने वालों की संख्या 4 करोड़ बताई जाती है। इस हिस्से को भाषायी आधार पर अलग पहचान दिलाने के लिए अलग मिथिलांचल राज्य के गठन की माँग चल रही है, जिसके समर्थक बिहार के मुख्यमंत्री “जगन्नाथ मिश्रा” थे।
सौराष्ट्र - गुजरात के एक क्षेत्र को अलग करके सौराष्ट्र के गठन की माँग की जा रही है, लेकिन अब राज्य के कई राजनीतक दलों जैसे “सौराष्ट्रा संकलन समिति” ने इसे महत्व देना शुरू कर दिया है।
सौराष्ट्र की माँग करने वालों का कहना है कि गुजरात से अलग इस क्षेत्र की अपनी संस्कृति और परंपराएँ हैं, इसे अलग राज्य का दर्जा मिलना चाहिए।
बुंदेलखंड - उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई जिलों को अलग कर बुंदेलखंड बनाने की माँग भी काफ़ी पुरानी है। यह इलाका इतना पिछड़ा हुआ है कि जब राहुल गाँधी इस इलाके के दौरे पर गए तो उन्हें भी कहना पड़ा कि बुंदेलखंड का विकास अलग राज्य बनाकर ही हो सकता है।
तुलुनाडू - केरल और कर्नाटक के जिन हिस्सों में तुलु भाषा बोली जाती है, उन्हें अलग कर नया राज्य बनाए जाने की माँग चल रही है। इस क्षेत्र के लोगों का कहना है कि तुलु भाषा कर्नाटक के दूसरे हिस्सों में नहीं बोली जाती, इसलिए केरल और कर्नाटक का यह हिस्सा अलग पहचान के लिए जाना जाता है।
कौशल राज्य - ओडिशा के पश्चिमी हिस्से के जिलों को अलग करके कौशल राज्य बनाए जाने की माँग चल रही है। संभलपुर, संदरगढ़, बलांगीर, सोनपुर, कालाहांडी, देवगढ़, झारसुगुड़ा आदि को कौशल राज्य में शामिल करने के लिए कौशल क्रांति दल नाम का क्षेत्रीय राजनीतिक दल लगातार संघर्ष कर रहा है।
ग्रेटर कूच बिहार - पश्चिमी बंगाल के कई हिस्सों को मिलाकर ग्रेटर कूच बिहार बनाए जाने की माँग भी देश में चल रही है। पश्चिम-बंगाल के इस क्षेत्र की भाषा व संस्कृति और रीति-रिवाज राज्य के दूसरे हिस्से से अलग हैं।
पूर्वांचल - पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस हिस्से में 35 जिलों को अलग करके पूर्वांचल राज्य बनाए जाने की माँग चल रही है। राजनीतिक दलों का कहना है कि आर्थिक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र बहुत पिछे है, जो सिर्फ पूर्वांचल राज्य के बनने पर ही विकास कर सकता है।
मरु प्रदेश - पश्चिम राजस्थान के 9 जिलों तक विकास की रोशनी नहीं पहुँच पाई है, लिहाजा जब तक मरु प्रदेश नहीं बनता, इस इलाके का विकास नहीं हो सकता। बीते 20 वर्षों से मरु प्रदेश के लिए आंदोलन चला रहे “जयवीर सिंह गोदारा” कहते हैं कि भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल के नेता भी उनके आंदोलन का समर्थन करते रहे हैं।
विंध्य प्रदेश - छत्तीसगढ़ के गठन के समय “सुन्दर लाल तिवारी” द्वारा अलग विंध्य प्रदेश की माँग लोकसभा में की गई और इस माँग को विधान सभा में भी उठाया गया था। नवम्बर 2017 में “बघेलखंड विंध्य आदर्श” समाज द्वारा अलग विंध्य प्रदेश की माँग को लेकर संघर्ष किया गया और विंध्य प्रदेश बनाने तक आन्दोलन की घोषणा हुई।
इससे भी ज्यादा ज़रूरी बात है कि अभी भी देश के कई हिस्से में नए राज्यों के गठन की माँगें समय-समय पर उठती रहती हैं। ऐसी आवाज़ें हर एक नए राज्य के गठन के बाद और तेज़ हो जाती हैं।
आज के समय में निम्नलिखित नए राज्यों के गठन की माँग मुख्यत: इनसे आ रही है:-
हरित प्रदेश - 22 जिले जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थे उनको मिलाकर अलग प्रदेश बनाने की माँग बहुत पुरानी है। कभी गंगा प्रदेश, कभी दोआब तो कभी हरित प्रदेश के नाम से यह माँग अनेक राजनीतिक दलों में जनता द्वारा ही उठाई जाती रही है।
कुर्ग प्रदेश - कर्नाटक का यह क्षेत्र 1956 तक राज्यों के वर्ग-C में शामिल था जिसका शासन मुख्य आयुक्त के द्वारा किया जाता था और “मिरकारा” इसकी राजधानी थी। जिसे "राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956” द्वारा मैसूर राज्य में शामिल कर दिया गया।
मिथिलांचल - बिहार के एक हिस्से में मैथिली भाषा बोलने वालों की संख्या 4 करोड़ बताई जाती है। इस हिस्से को भाषायी आधार पर अलग पहचान दिलाने के लिए अलग मिथिलांचल राज्य के गठन की माँग चल रही है, जिसके समर्थक बिहार के मुख्यमंत्री “जगन्नाथ मिश्रा” थे।
सौराष्ट्र - गुजरात के एक क्षेत्र को अलग करके सौराष्ट्र के गठन की माँग की जा रही है, लेकिन अब राज्य के कई राजनीतक दलों जैसे “सौराष्ट्रा संकलन समिति” ने इसे महत्व देना शुरू कर दिया है।
सौराष्ट्र की माँग करने वालों का कहना है कि गुजरात से अलग इस क्षेत्र की अपनी संस्कृति और परंपराएँ हैं, इसे अलग राज्य का दर्जा मिलना चाहिए।
बुंदेलखंड - उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई जिलों को अलग कर बुंदेलखंड बनाने की माँग भी काफ़ी पुरानी है। यह इलाका इतना पिछड़ा हुआ है कि जब राहुल गाँधी इस इलाके के दौरे पर गए तो उन्हें भी कहना पड़ा कि बुंदेलखंड का विकास अलग राज्य बनाकर ही हो सकता है।
तुलुनाडू - केरल और कर्नाटक के जिन हिस्सों में तुलु भाषा बोली जाती है, उन्हें अलग कर नया राज्य बनाए जाने की माँग चल रही है। इस क्षेत्र के लोगों का कहना है कि तुलु भाषा कर्नाटक के दूसरे हिस्सों में नहीं बोली जाती, इसलिए केरल और कर्नाटक का यह हिस्सा अलग पहचान के लिए जाना जाता है।
कौशल राज्य - ओडिशा के पश्चिमी हिस्से के जिलों को अलग करके कौशल राज्य बनाए जाने की माँग चल रही है। संभलपुर, संदरगढ़, बलांगीर, सोनपुर, कालाहांडी, देवगढ़, झारसुगुड़ा आदि को कौशल राज्य में शामिल करने के लिए कौशल क्रांति दल नाम का क्षेत्रीय राजनीतिक दल लगातार संघर्ष कर रहा है।
ग्रेटर कूच बिहार - पश्चिमी बंगाल के कई हिस्सों को मिलाकर ग्रेटर कूच बिहार बनाए जाने की माँग भी देश में चल रही है। पश्चिम-बंगाल के इस क्षेत्र की भाषा व संस्कृति और रीति-रिवाज राज्य के दूसरे हिस्से से अलग हैं।
पूर्वांचल - पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस हिस्से में 35 जिलों को अलग करके पूर्वांचल राज्य बनाए जाने की माँग चल रही है। राजनीतिक दलों का कहना है कि आर्थिक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र बहुत पिछे है, जो सिर्फ पूर्वांचल राज्य के बनने पर ही विकास कर सकता है।
मरु प्रदेश - पश्चिम राजस्थान के 9 जिलों तक विकास की रोशनी नहीं पहुँच पाई है, लिहाजा जब तक मरु प्रदेश नहीं बनता, इस इलाके का विकास नहीं हो सकता। बीते 20 वर्षों से मरु प्रदेश के लिए आंदोलन चला रहे “जयवीर सिंह गोदारा” कहते हैं कि भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल के नेता भी उनके आंदोलन का समर्थन करते रहे हैं।
विंध्य प्रदेश - छत्तीसगढ़ के गठन के समय “सुन्दर लाल तिवारी” द्वारा अलग विंध्य प्रदेश की माँग लोकसभा में की गई और इस माँग को विधान सभा में भी उठाया गया था। नवम्बर 2017 में “बघेलखंड विंध्य आदर्श” समाज द्वारा अलग विंध्य प्रदेश की माँग को लेकर संघर्ष किया गया और विंध्य प्रदेश बनाने तक आन्दोलन की घोषणा हुई।
